ग्रैंड मुफ्ती के 'महिला-कैद' बयान पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का पलटवार, डॉ. शालिनी अली बोलीं- बेटियों को खुला आसमान चाहिए
सारांश
मुख्य बातें
केरल के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद द्वारा महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने की वकालत करने वाले बयान ने 31 अगस्त को देशभर में तीखी बहस छेड़ दी। कोच्चि में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन में दिए गए इस बयान के विरोध में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय संयोजक और महिला विंग प्रमुख डॉ. शालिनी अली ने कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया है।
ग्रैंड मुफ्ती ने क्या कहा
शेख अबूबकर अहमद ने अपने भाषण में कहा कि महिलाओं को घर में रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी 'बड़े विनाश' का कारण बन सकती है। उन्होंने इस तर्क को धार्मिक व्याख्या से जोड़ते हुए पर्दा व्यवस्था को महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का आधार बताया।
अपनी बात को समझाने के लिए उन्होंने सोने के हार का उदाहरण दिया — यह कहते हुए कि जिस तरह सोने के आभूषण को उसकी कीमत और सुंदरता बचाने के लिए डिब्बे में रखा जाता है, उसी तरह महिलाओं को भी घर में रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सुन्नी धार्मिक विद्वान लंबे समय से इस विचार को आगे बढ़ाते रहे हैं और वे इस मुद्दे पर बोलते रहेंगे।
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का पलटवार
डॉ. शालिनी अली ने इस बयान को 'तानाशाहीपूर्ण सोच' करार देते हुए कहा कि महिला कोई सोने का हार या सजावटी वस्तु नहीं है जिसे किसी डिब्बे में बंद करके रखा जाए। उनके अनुसार, महिला अपने सपनों, प्रतिभा और निर्णय लेने के अधिकार के साथ जीने वाली स्वतंत्र इंसान है।
उन्होंने कहा कि जिस भारत की बेटियाँ सेना के तीनों अंगों में देश की रक्षा कर रही हैं, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट और खिलाड़ी बनकर विश्व में देश का नाम रोशन कर रही हैं, उन्हें घर में कैद रहने की सलाह देना 'आज के भारत की वास्तविकता का अपमान' है।
विवाद का केंद्र: महिला की तुलना आभूषण से
आलोचकों के लिए इस पूरे प्रकरण में सबसे तीखा बिंदु यही है कि एक महिला की तुलना किसी निर्जीव आभूषण से की गई। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की ओर से स्पष्ट किया गया कि सोने का हार किसी दुकान की संपत्ति हो सकता है, लेकिन महिला अपने जीवन की स्वयं मालिक है — वह किसी की वस्तु नहीं, बल्कि अधिकारों वाली नागरिक है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय महिलाएँ फाइटर पायलट से लेकर अंतरिक्ष वैज्ञानिक तक, अदालतों से लेकर संसद तक हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं। आलोचकों का कहना है कि 'सुरक्षा' के नाम पर किसी की स्वतंत्रता छीन लेना वास्तव में सम्मान नहीं कहला सकता।
मंच का स्पष्ट रुख: चुनाव महिला का होना चाहिए
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने अपने बयान में कहा कि अगर कोई महिला घर संभालना चाहती है तो यह उसका अधिकार है, और अगर वह सेना में जाना, डॉक्टर बनना, पत्रकारिता करना या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना चाहती है तो यह भी उतना ही उसका अधिकार है। मंच का स्पष्ट मत है कि किसी महिला के जीवन का फैसला कोई दूसरा व्यक्ति उसके लिए नहीं कर सकता।
गौरतलब है कि ग्रैंड मुफ्ती के इस बयान को पूरे मुस्लिम समाज या सभी मुस्लिम विद्वानों की सर्वसम्मत राय नहीं माना जाना चाहिए — यह एक धार्मिक नेता की व्यक्तिगत व्याख्या है। इस बयान की आलोचना को किसी धर्म के विरुद्ध अभियान के रूप में नहीं, बल्कि महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के व्यापक प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए।
आगे क्या
यह विवाद अब महिला अधिकार, धार्मिक व्याख्या और आधुनिक भारत में महिलाओं की भूमिका पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस का रूप लेता दिख रहा है। डॉ. शालिनी अली ने संकेत दिया है कि मंच इस मुद्दे पर अपनी आवाज़ बुलंद करता रहेगा। मूल प्रश्न यही है — महिला को सम्मान चाहिए या नियंत्रण, सुरक्षा चाहिए या कैद, अवसर चाहिए या चारदीवारी।