गुजरात में कलेक्टरों की भूमि आवंटन शक्तियाँ बढ़ीं, ₹15 लाख से ₹1 करोड़ तक की सीमा
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात सरकार ने 28 जुलाई 2026 को जिला कलेक्टरों और जिला विकास अधिकारियों (डीडीओ) की वित्तीय शक्तियों में व्यापक विस्तार किया, जिससे वे सरकारी भूमि आवंटन के अधिक मामलों का निपटारा अब जिला स्तर पर ही कर सकेंगे। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस निर्णय की घोषणा करते हुए कहा कि यह कदम 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बेहतर बनाने और गांधीनगर पर प्रशासनिक निर्भरता घटाने की दिशा में उठाया गया है।
संशोधित वित्तीय सीमाएँ: क्या बदला
राज्य सरकार के बोर्डों और निगमों को दो हेक्टेयर तक भूमि आवंटित करने की सीमा ₹15 लाख से बढ़ाकर ₹1 करोड़ कर दी गई है। केंद्र सरकार के विभागों को सार्वजनिक उद्देश्यों हेतु एक हेक्टेयर तक भूमि देने की सीमा ₹15 लाख से ₹50 लाख हो गई है।
सरकारी कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों के लिए आवासीय भूमि आवंटन की सीमा ₹1 लाख से बढ़कर ₹20 लाख हो गई है। सहकारी आवास समितियों के लिए यह सीमा ₹6 लाख से ₹50 लाख कर दी गई है। नीलामी के माध्यम से व्यावसायिक भूमि आवंटन की सीमा ₹1 लाख से ₹5 लाख और सहकारी गोदामों व अन्य संस्थानों के लिए ₹3 लाख से ₹15 लाख कर दी गई है।
डीडीओ की गामताल शक्तियों में भी वृद्धि
गामताल (गांव आबादी क्षेत्र) के भूखंडों के आवंटन के लिए डीडीओ की सीमाएँ भी संशोधित की गई हैं। व्यक्तिगत आवासीय भूखंडों के लिए यह सीमा ₹20,000 से ₹1 लाख हो गई है। सहकारी आवास समितियों के लिए ₹1.5 लाख से ₹7.5 लाख और दुग्ध सहकारी समितियों, सहकारी गोदामों तथा ग्रामीण ग्रिड परियोजनाओं के लिए ₹20,000 से ₹1 लाख कर दी गई है।
प्रशासनिक प्रक्रिया में बदलाव
एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रक्रियागत संशोधन के तहत जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दिया गया है कि यदि राज्य या केंद्र सरकार के विभागों द्वारा मांग पत्र जारी होने के 90 दिनों के भीतर कब्जा मूल्य या प्रीमियम का भुगतान नहीं किया जाता, तो वे भुगतान की समय-सीमा जिला भूमि मूल्यांकन समिति के तीन वर्षीय कार्यकाल की समाप्ति तक बढ़ा सकेंगे। सरकार के अनुसार इससे बार-बार होने वाली प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उल्लेखनीय कमी आएगी।
सरकार की मंशा और अपेक्षित असर
राज्य सरकार का कहना है कि जिला स्तर पर भूमि अभिलेख और स्थल-संबंधी जानकारी पहले से उपलब्ध होती है, इसलिए अधिक मामलों का निपटारा वहीं होने से प्रशासनिक देरी घटेगी। अधिकारियों के अनुसार इन बदलावों से सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे, औद्योगिक विकास और सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए भूमि आवंटन त्वरित होगा और रोजगार सृजन को भी बल मिलेगा। इसके साथ ही भूमि के कब्जा शुल्क की शीघ्र वसूली से राजस्व भी जल्द राज्य कोष में जमा हो सकेगा।
यह ऐसे समय में आया है जब गुजरात सरकार औद्योगिक और ग्रामीण विकास परियोजनाओं की गति बढ़ाने पर ज़ोर दे रही है। गौरतलब है कि आवेदकों, संस्थानों और सरकारी विभागों को अब मंजूरी के लिए गांधीनगर के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।