वंदे भारत से पहली बार हार्ट ट्रांसप्लांट: सूरत से अहमदाबाद 217 मिनट में, मिथुन स्वैन के अंगों से 4 को नया जीवन
सारांश
मुख्य बातें
सूरत के न्यू सिविल हॉस्पिटल में 31 जुलाई 2026 को देश के इतिहास में पहली बार वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन के ज़रिए ट्रांसप्लांट के लिए हार्ट को एक शहर से दूसरे शहर पहुँचाया गया। ओडिशा के 36 वर्षीय मिथुन लक्ष्मणभाई स्वैन के अंगदान से 4 लोगों को नई ज़िंदगी मिलने की उम्मीद है — यह अस्पताल का 96वाँ सफल ऑर्गन डोनेशन भी है।
मिथुन स्वैन: एक जीवन, चार नई ज़िंदगियाँ
ओडिशा के गंजम जिले के सिद्धपुर, कलाखाड़ी के निवासी और सूरत के किम (पीपोदरा) में सांचा विभाग में कार्यरत मिथुन स्वैन 28 जुलाई को अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। कमरे में बैठे-बैठे उनका चेहरा लटक गया और बाएँ हाथ-पैर ने काम करना बंद कर दिया। उन्हें पहले स्थानीय प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया, फिर हालत बिगड़ने पर 108 एम्बुलेंस से सूरत सिविल हॉस्पिटल भेजा गया, जहाँ इमरजेंसी उपचार के बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया।
30 जुलाई को शाम 4:01 बजे आरएमओ डॉ. केतन नायक, प्लास्टिक सर्जन डॉ. नीलेश कछड़िया, न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रयाग मकवाना और न्यूरोसर्जन डॉ. केयूर प्रजापति की टीम ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया।
परिवार का निर्णय: भारी मन से दी सहमति
ब्रेन डेड घोषित होने के बाद अंगदान चैरिटेबल ट्रस्ट के स्वयंसेवक इकबाल कड़ीवाला और काउंसलर निर्मला कथुडे ने मिथुनभाई की पत्नी, भाई और परिवार के अन्य सदस्यों को अंगदान का महत्त्व समझाया। परिवार ने दूसरों को नया जीवन देने की भावना और गाँव के लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से भारी मन से सहमति दी। सुबह 5:00 बजे मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. पारुल वडगामा, मेडिकल ऑफिसर डॉ. सोलंकी, ट्रस्ट के सदस्य, काउंसलर, डॉक्टर और स्टाफ ने प्रार्थना सभा में शामिल होकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
वंदे भारत से हार्ट ट्रांसपोर्ट: देश में पहली बार
मिथुनभाई का लिवर और दोनों किडनी आईकेडीआरसी हॉस्पिटल भेजे गए, जबकि हृदय को सूरत रेलवे स्टेशन से वंदे भारत एक्सप्रेस के ज़रिए यूएन मेहता हॉस्पिटल, अहमदाबाद पहुँचाया गया। यह यात्रा लगभग 217 मिनट (करीब 3 घंटे 37 मिनट) में पूरी हुई। देश में यह पहला अवसर है जब किसी ट्रांसप्लांट के लिए हार्ट को वंदे भारत ट्रेन के माध्यम से स्थानांतरित किया गया।
गौरतलब है कि हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए अंग की व्यवहार्यता-अवधि अत्यंत सीमित होती है — आमतौर पर 4 से 6 घंटे — इसलिए समय पर और सुरक्षित परिवहन इस ऑपरेशन की सफलता की कुंजी था। वंदे भारत की गति और नियंत्रित वातावरण ने इसे संभव बनाया।
टीम का योगदान
अंगदान महादान अभियान के प्रणेता दिलीप दादा देशमुख ने भी इस सेवा कार्य में सहयोग दिया। डॉ. पारुल वडगामा के मार्गदर्शन में डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, सुरक्षाकर्मियों, रेलवे पुलिस, सोशल वर्कर्स और स्वयंसेवकों ने मिलकर इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाया।
आगे क्या
यह ऐतिहासिक कदम भविष्य में अंग परिवहन के लिए रेलवे को एक विश्वसनीय माध्यम के रूप में स्थापित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वंदे भारत जैसी तेज़ और नियमित ट्रेनें उन शहरों के बीच अंग-परिवहन को सुलभ बना सकती हैं जहाँ हवाई संपर्क सीमित है। सूरत न्यू सिविल हॉस्पिटल का यह 96वाँ सफल ऑर्गन डोनेशन राज्य में अंगदान जागरूकता की बढ़ती लहर का प्रमाण है।