गुजरात में टेंडर कोकोनट उत्पादन में 20% की उछाल, दो वर्षों में 26 करोड़ नारियल का रिकॉर्ड

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गुजरात में टेंडर कोकोनट उत्पादन में 20% की उछाल, दो वर्षों में 26 करोड़ नारियल का रिकॉर्ड

सारांश

गुजरात में सरकारी प्रोत्साहन और 75% सब्सिडी की बदौलत टेंडर कोकोनट उत्पादन दो साल में 20% उछला — अब सालाना 26 करोड़ नारियल। गिर सोमनाथ के एक युवा किसान ने देसी नुस्खे से आय ₹15 लाख तक पहुँचाई। अगला लक्ष्य: 70,000 हेक्टेयर और वैश्विक निर्यात बाज़ार।

मुख्य बातें

गुजरात में टेंडर कोकोनट का उत्पादन पिछले दो वर्षों में लगभग 20% बढ़ा।
राज्य में अब सालाना लगभग 26 करोड़ नारियल का उत्पादन होता है; खेती का क्षेत्रफल 28,000 हेक्टेयर ।
सरकार नारियल बुवाई पर 75% तक की सब्सिडी देती है; टपक सिंचाई और पेस्ट मैनेजमेंट में भी सहायता।
गिर सोमनाथ के किसान दिनेश सोलंकी ने देसी उपाय से उत्पादन 1,500 से बढ़ाकर 10,000 नारियल प्रति वर्ष किया; आय ₹12–15 लाख तक पहुँची।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल सरकार का लक्ष्य नारियल खेती क्षेत्र 70,000 हेक्टेयर तक विस्तारित करना।
वर्जिन कोकोनट ऑयल और कोकोनट पाउडर के ज़रिये निर्यात बाज़ार में प्रवेश की योजना।

गुजरात सरकार की बागवानी प्रोत्साहन नीतियों के चलते राज्य में टेंडर कोकोनट का उत्पादन पिछले दो वर्षों में लगभग 20 प्रतिशत बढ़ गया है। आज किसान सालाना लगभग 26 करोड़ नारियल का उत्पादन कर रहे हैं — एक ऐसा आँकड़ा जो गुजरात को बागवानी क्षेत्र में एक उभरती शक्ति के रूप में स्थापित करता है। राज्य के 28,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली नारियल की खेती और सरकारी सब्सिडी ने मिलकर किसानों की आय को नई ऊँचाई दी है।

उत्पादन के आँकड़े और प्रमुख ज़िले

वर्ष 2024-25 के आँकड़ों के अनुसार, गुजरात में टेंडर कोकोनट की औसत उत्पादकता लगभग 9,260 नारियल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। नारियल उत्पादन में गिर सोमनाथ, जूनागढ़, भावनगर, वलसाड, नवसारी, कच्छ और द्वारका जिलों का सबसे अधिक योगदान है। राज्य का विशाल समुद्री तट नारियल की खेती के लिए प्राकृतिक रूप से अनुकूल है, जो किसानों को सीधा लाभ देता है।

सरकारी प्रोत्साहन और सहायता योजनाएँ

गुजरात सरकार के बागवानी विभाग द्वारा किसानों को नारियल की बुवाई पर 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है। इसके साथ ही मल्चिंग और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट जैसी आधुनिक पद्धतियों के उपयोग के लिए भी सहायता प्रदान की जाती है। बागवानी विभाग की नर्सरी से किसानों को ऊँची किस्म, वामन किस्म और हाइब्रिड किस्मों के उच्च-गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं। गुजरात ग्रीन रिवॉल्यूशन कंपनी लिमिटेड द्वारा टपक सिंचाई पद्धति में भी सहायता दी जाती है।

व्हाइटफ्लाई संकट और देसी समाधान

चोरवाड से उना तक का समुद्र तटवर्ती क्षेत्र 'लीली नाघेर' (हरियाले क्षेत्र) के रूप में जाना जाता है। पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में रोगस व्हाइटफ्लाई (सफेद मक्खी) के प्रकोप ने किसानों को कठिनाई में डाल दिया था। हालाँकि, सरकार के मार्गदर्शन और किसानों के प्रयासों से स्थिति में सुधार देखा जा रहा है।

गिर सोमनाथ जिले के सूत्रापाडा के युवा किसान दिनेश सोलंकी ने इस समस्या का देसी उपाय खोजा — 1,000 लीटर पानी में गुड़ और गिर गाय के दूध का मिश्रण तैयार कर व्हाइटफ्लाई को नष्ट करने में सफलता प्राप्त की। इस प्रयोग से पहले उनके खेत में सालाना मात्र 1,000 से 1,500 नारियल का उत्पादन होता था, जो अब बढ़कर 8,000 से 10,000 नारियल प्रति वर्ष हो गया है। उनकी वार्षिक आय अब ₹12 से ₹15 लाख तक पहुँच गई है, और उनकी सफलता से प्रेरित होकर अन्य किसान भी यह पद्धति अपना रहे हैं।

भविष्य की योजना और वैश्विक महत्वाकांक्षा

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार का लक्ष्य आगामी वर्षों में नारियल की खेती का क्षेत्रफल 70,000 हेक्टेयर तक बढ़ाना है। इसके अतिरिक्त, वर्जिन कोकोनट ऑयल और कोकोनट पाउडर जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों के ज़रिये निर्यात बाज़ारों में प्रवेश के लिए भी प्रयास जारी हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत का कृषि क्षेत्र परंपरागत खेती से निर्यातोन्मुखी और प्रौद्योगिकी-आधारित खेती की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। गौरतलब है कि यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो गुजरात नारियल-आधारित उद्योगों के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या यह वृद्धि टिकाऊ है या सब्सिडी-निर्भर। व्हाइटफ्लाई जैसे कीट-प्रकोप की पुनरावृत्ति की आशंका बनी रहती है, और 28,000 से 70,000 हेक्टेयर का विस्तार लक्ष्य महत्वाकांक्षी है — इसके लिए जल संसाधन, प्रशिक्षित जनशक्ति और प्रोसेसिंग अवसंरचना तीनों की एक साथ ज़रूरत होगी। दिनेश सोलंकी जैसे किसानों की सफलता प्रेरणादायक है, पर यह व्यक्तिगत नवाचार तब तक नीतिगत उपलब्धि नहीं बनती जब तक इसे व्यापक पैमाने पर दोहराने की व्यवस्था न हो। निर्यात महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वर्जिन कोकोनट ऑयल जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों की प्रोसेसिंग क्षमता अभी भी सीमित है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुजरात में टेंडर कोकोनट उत्पादन में कितनी वृद्धि हुई है?
पिछले दो वर्षों में गुजरात में टेंडर कोकोनट का उत्पादन लगभग 20 प्रतिशत बढ़ा है और अब सालाना लगभग 26 करोड़ नारियल का उत्पादन होता है। राज्य में 28,000 हेक्टेयर क्षेत्र में नारियल की खेती की जाती है।
गुजरात सरकार नारियल किसानों को क्या सहायता देती है?
गुजरात सरकार नारियल की बुवाई पर 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान करती है। इसके अलावा मल्चिंग, इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट और टपक सिंचाई में भी सहायता दी जाती है, और बागवानी विभाग की नर्सरी से उच्च-गुणवत्ता के पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं।
किसान दिनेश सोलंकी ने व्हाइटफ्लाई की समस्या कैसे हल की?
गिर सोमनाथ जिले के सूत्रापाडा के किसान दिनेश सोलंकी ने 1,000 लीटर पानी में गुड़ और गिर गाय के दूध का मिश्रण बनाकर व्हाइटफ्लाई को नष्ट किया। इस देसी उपाय से उनका उत्पादन 1,000–1,500 से बढ़कर 8,000–10,000 नारियल प्रति वर्ष हो गया और वार्षिक आय ₹12–15 लाख तक पहुँच गई।
गुजरात में नारियल खेती का भविष्य का लक्ष्य क्या है?
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार नारियल खेती का क्षेत्रफल मौजूदा 28,000 हेक्टेयर से बढ़ाकर 70,000 हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखती है। साथ ही वर्जिन कोकोनट ऑयल और कोकोनट पाउडर जैसे उत्पादों के ज़रिये निर्यात बाज़ार में प्रवेश की योजना भी है।
गुजरात के कौन-से जिले नारियल उत्पादन में प्रमुख हैं?
गुजरात में नारियल उत्पादन में गिर सोमनाथ, जूनागढ़, भावनगर, वलसाड, नवसारी, कच्छ और द्वारका जिलों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। चोरवाड से उना तक का समुद्र तटवर्ती क्षेत्र 'लीली नाघेर' के नाम से जाना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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