15 जुलाई 2026
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गुप्त नवरात्र के पहले दिन बाबा महाकाल चंद्रमा-बिंदी श्रृंगार से सजे, उज्जैन में हजारों श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़

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गुप्त नवरात्र के पहले दिन बाबा महाकाल चंद्रमा-बिंदी श्रृंगार से सजे, उज्जैन में हजारों श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़

सारांश

गुप्त नवरात्र के पहले दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल को चंद्रमा और बिंदी से विशेष रूप से सजाया गया। आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा पर संपन्न भस्म आरती में हजारों श्रद्धालु रात से पंक्तिबद्ध रहे, और 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से पूरा परिसर गूँज उठा।

मुख्य बातें

15 जुलाई 2026 को गुप्त नवरात्र के पहले दिन उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती संपन्न हुई।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (सुबह 11:51 बजे तक) के अवसर पर बाबा महाकाल को चंद्रमा और बिंदी से विशेष श्रृंगार किया गया।
भस्म आरती से पूर्व जलाभिषेक और पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर, फलों का रस) से अभिषेक किया गया।
अब भस्म के लिए कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों का उपयोग होता है — पूर्व में शमशान की राख प्रयुक्त होती थी।
भस्म आरती में पुरुषों के लिए धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।
भारी भीड़ के मद्देनजर मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 15 जुलाई 2026 को गुप्त नवरात्र के पहले दिन — आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (सुबह 11:51 बजे तक) — बाबा महाकाल की भस्म आरती अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ संपन्न हुई। इस दिव्य दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु रात से ही मंदिर के बाहर पंक्तिबद्ध हो गए थे।

दिव्य श्रृंगार और भस्म आरती

बुधवार तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के बीच बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। गुप्त नवरात्र के इस विशेष अवसर पर भस्म अनुष्ठान से पूर्व बाबा महाकाल को चंद्रमा और बिंदी से विशेष रूप से सजाया गया, जिसने दर्शनार्थियों को अभिभूत कर दिया। जैसे ही श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हुए, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक

मंदिर के कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। मंदिर परिसर घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से पवित्र वातावरण में डूबा रहा। महाकाल मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई।

भस्म आरती की विशेष परंपरा

जानकारी के अनुसार, पूर्व में बाबा महाकाल को शमशान की राख अर्पित की जाती थी, किंतु अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष रूप से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। भस्म आरती के दौरान पुरुषों के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है — यह परंपरा इस आरती की पवित्रता और अनुशासन का प्रतीक है।

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और व्यवस्था

बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में अपनी अलौकिकता के लिए प्रसिद्ध है। इस दर्शन के लिए आम श्रद्धालुओं से लेकर著名 हस्तियाँ भी उज्जैन पहुँचती हैं। भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी, ताकि व्यवस्था सुचारु बनी रहे।

आगे क्या

गुप्त नवरात्र के शेष दिनों में भी श्री महाकालेश्वर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और श्रृंगार के आयोजन अपेक्षित हैं। श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए मंदिर प्रशासन द्वारा दर्शन व्यवस्था को और सुदृढ़ किए जाने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का केंद्रबिंदु है। गुप्त नवरात्र जैसे विशेष अवसरों पर यहाँ उमड़ने वाली हजारों की भीड़ यह दर्शाती है कि श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर की परंपराएँ आधुनिक दौर में भी अटूट हैं। हालाँकि, बढ़ती भीड़ के साथ मंदिर प्रशासन और स्थानीय प्रशासन के सामने दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा को संतुलित करने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी होती जा रही है।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुप्त नवरात्र क्या है और यह कब मनाया जाता है?
गुप्त नवरात्र हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में दो बार — माघ और आषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक — मनाया जाता है। इसे 'गुप्त' इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें तांत्रिक साधनाएँ और विशेष गुप्त उपासनाएँ की जाती हैं, जो सामान्य नवरात्र से भिन्न होती हैं।
महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती में किस भस्म का उपयोग होता है?
जानकारी के अनुसार, पहले शमशान की राख से भस्म तैयार होती थी, किंतु अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष भस्म बनाई जाती है। यह भस्म बाबा महाकाल को अर्पित की जाती है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
भस्म आरती में दर्शन के लिए क्या नियम हैं?
भस्म आरती के दौरान पुरुषों के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह नियम मंदिर की पवित्रता और परंपरा को बनाए रखने के लिए लागू किया गया है।
15 जुलाई 2026 को महाकाल का विशेष श्रृंगार कैसा था?
गुप्त नवरात्र के पहले दिन — आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा पर — बाबा महाकाल को भस्म आरती से पूर्व विशेष रूप से चंद्रमा और बिंदी से सजाया गया। इस अलौकिक श्रृंगार के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु रात से ही पंक्तिबद्ध रहे।
उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती कब होती है?
भस्म आरती प्रतिदिन तड़के सूर्योदय से पूर्व होती है। मंदिर के कपाट भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ खोले जाते हैं, जिसके बाद जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक और भस्म आरती का क्रम संपन्न होता है।
राष्ट्र प्रेस
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