गुरु अमर दास साहिब के ज्योति जोत दिवस पर पांवटा साहिब में कीर्तन समागम और कवि दरबार आयोजित
सारांश
मुख्य बातें
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा पांवटा साहिब में 27 सितंबर 2026 को सिख धर्म के तीसरे गुरु, गुरु अमर दास साहिब महाराज के ज्योति जोत दिवस (पुण्यतिथि) के उपलक्ष्य में भव्य कीर्तन समागम और कवि दरबार का आयोजन किया गया। श्री अखंड पाठ साहिब के भोग के साथ शुरू हुए इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े।
आयोजन का विवरण
पांवटा साहिब गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के मैनेजर गुरमीत सिंह ने बताया, 'तीसरे सिख गुरु, गुरु अमर दास महाराज के ज्योति जोत दिवस के उपलक्ष्य में ऐतिहासिक गुरुद्वारा पांवटा साहिब में कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।' उन्होंने जानकारी दी कि देर रात एक विशेष कवि दरबार का आयोजन किया गया, जिसमें भारी तादाद में संगत ने शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत श्री अखंड पाठ साहिब के भोग से हुई।
गुरु अमर दास साहिब का जीवन परिचय
गुरु अमर दास साहिब का जन्म 5 मई 1479 (वैशाख शुक्ल 14) को अमृतसर के 'बासरके' (बसारके) गाँव में हुआ था। उनका विवाह मंसा देवी से हुआ था और उनकी चार संतानें — मोहरी, मोहन, दानी और भानी — थीं। 19 मार्च 1552 को खडूर साहिब में श्री गुरु अंगद देव द्वारा उन्हें तीसरी गुरू गद्दी पर सुशोभित किया गया।
सामाजिक सुधारों में ऐतिहासिक योगदान
गुरु अमर दास साहिब ने 22 वर्षों तक गुरु पद पर रहते हुए समाज-सुधार के अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने 'पहले पंगत फिर संगत' के नियम को कड़ाई से लागू किया, जिसके अंतर्गत छोटे-बड़े, ऊँचे-नीचे सभी वर्गों के लोग एक साथ ज़मीन पर बैठकर लंगर छकते थे। इस व्यवस्था ने छुआछूत और ऊँच-नीच के भेद को मिटाने में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने सती प्रथा और पर्दा प्रथा का कड़ा विरोध किया, विधवा विवाह को मान्यता दी और आनंद साहिब की पवित्र बाणी की रचना की। समानता, सेवा और मानवता के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। गौरतलब है कि उनका यह सुधारवादी दृष्टिकोण आज भी सिख धर्म की आधारशिला माना जाता है।
आम जनता पर असर
यह आयोजन सिरमौर जिले के श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है। गुरुद्वारा पांवटा साहिब हिमाचल प्रदेश के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में से एक है, और ऐसे ज्योति जोत दिवस आयोजन क्षेत्रीय सिख समुदाय को गुरु साहिबान के आदर्शों से पुनः जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। आने वाले समय में भी गुरु साहिबान से जुड़े पर्वों पर ऐसे धार्मिक आयोजन होते रहेंगे।