गुरु पूर्णिमा 2025: 29 जुलाई को मनाया जाएगा पर्व, कालकाजी मंदिर के पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत ने दी जानकारी
सारांश
मुख्य बातें
कालकाजी मंदिर, नई दिल्ली के पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत ने स्पष्ट किया है कि इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। उनके अनुसार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा इस बार 29 जुलाई को पड़ रही है, इसलिए उसी दिन यह उत्सव संपन्न होगा। यह पर्व भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का सर्वोच्च अवसर माना जाता है।
गुरु पूर्णिमा का महत्व और तिथि
सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा अथवा गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा है। यह दिन महर्षि वेदव्यास को समर्पित है, जिन्होंने वेदों का वर्गीकरण कर भारतीय ज्ञान परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखा। गौरतलब है कि वेदव्यास को आदि गुरु की संज्ञा दी जाती है और इसी कारण इस पूर्णिमा को उनके नाम से भी जाना जाता है।
अध्यात्म में गुरु का स्थान
पीठाधीश्वर ने गुरु के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। उनके अनुसार, गुरु वह शक्ति हैं जो व्यक्ति के जीवन से अज्ञान का अंधकार हटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु की कृपा से ही मनुष्य को जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ में आता है और सही मार्ग का बोध होता है।
शास्त्र-सम्मत दोहे से संदेश
शास्त्रों में गुरु महिमा का उल्लेख करते हुए सुरेंद्रनाथ अवधूत ने एक प्रसिद्ध दोहा उद्धृत किया — 'बिनु गुरु पन्थ न पाइये, भूले सोई जो भेट। गोरख सिद्ध होइ योगी सिद्ध होइ, जब जब गोरख सो भेट॥' उन्होंने इसका भावार्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि गुरु की कृपा के अभाव में साधना के मार्ग पर सफलता प्राप्त नहीं होती और आध्यात्मिक उन्नति असंभव है।
पूजन विधि और अनुष्ठान
गुरु पूर्णिमा पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि जिन श्रद्धालुओं ने अपने गुरु से दीक्षा प्राप्त की है, वे इस दिन विशेष रूप से पंचोपचार अथवा षोडशोपचार विधि से गुरुदेव का विधिवत पूजन करते हैं। कालकाजी मंदिर के पीठ से जुड़े और दीक्षा प्राप्त श्रद्धालु भी 29 जुलाई को मंदिर पहुँचकर गुरुदेव का आशीर्वाद लेंगे।
गुरु-शिष्य परंपरा का उत्सव
पीठाधीश्वर ने अंत में कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह गुरु-शिष्य संबंध को और अधिक सुदृढ़ करने तथा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के सम्मान का उत्सव है। यह पर्व प्रत्येक शिष्य को अपने गुरु के प्रति समर्पण का संकल्प लेने का अवसर देता है।