मुंगेर बिहार स्कूल ऑफ योग में गुरु पूर्णिमा महोत्सव संपन्न, स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने 'चेतना के रूपांतरण' का दिया संदेश
सारांश
मुख्य बातें
बिहार स्कूल ऑफ योग, मुंगेर के सन्यास पीठ में 26 जुलाई से आरंभ हुआ गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, साधना और गुरु-शिष्य परंपरा के गहरे संदेश के साथ 29 जुलाई 2025 को संपन्न हुआ। देश के विभिन्न राज्यों के अलावा यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और एशिया से पहुँचे हज़ारों साधकों ने गुरु पादुका का दर्शन-पूजन कर आध्यात्मिक जीवन को आत्मसात करने का संकल्प लिया। पद्म भूषण से सम्मानित परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने इस वर्ष के आयोजन की थीम 'चेतना का रूपांतरण' घोषित करते हुए साधना और सेवा को जीवन का आधार बताया।
महोत्सव का स्वरूप और आयोजन
चार दिवसीय इस महोत्सव में वैदिक मंत्रोच्चार, हवन, रुद्राभिषेक, पूजन, भजन, आरती और ध्यान के कार्यक्रमों ने सन्यास पीठ परिसर को भक्तिमय वातावरण से आप्लावित कर दिया। काशी से आए विद्वान आचार्यों ने वैदिक परंपरा के अनुसार गुरु पूजन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। महामृत्युंजय मंत्र, गुरु स्तोत्र और शिव स्तुति के सामूहिक पाठ ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
श्रद्धालुओं ने स्वामी सत्यानंद सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की और गुरु पादुकाओं का विधिवत पूजन किया। भक्ति संगीत और सामूहिक आरती भी आकर्षण का केंद्र रहे। आयोजकों के अनुसार गुरु पादुका पूजन भारतीय परंपरा में ज्ञान, विनम्रता और आध्यात्मिक उत्तराधिकार का प्रतीक माना जाता है।
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का संदेश
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि सन्यास पीठ केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि गुरु के प्रति समर्पण, श्रद्धा और साधना का जीवंत केंद्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरु पूर्णिमा का वास्तविक उद्देश्य केवल गुरु की पूजा करना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों और शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में उतारना है। उनके शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन गुरु के एक उपदेश का भी ईमानदारी से पालन करे, तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित है।
उन्होंने आगे कहा कि गुरु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और सीमितता से अनंतता की ओर ले जाती है। थीम 'चेतना का रूपांतरण' की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से नहीं, अपितु भीतर मौजूद क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और नकारात्मक प्रवृत्तियों से होता है। योग और आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य इन्हीं विकारों का परिष्कार कर व्यक्ति को उसकी वास्तविक चेतना से जोड़ना है।
पद्म जयंती श्रृंखला और आध्यात्मिक विशेषता
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने बताया कि वर्ष 2023 से 2031 तक स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पद्म जयंती मनाई जा रही है। उनके अनुसार 'पद्म' जागृत चेतना का प्रतीक है और यह पूरी श्रृंखला योग एवं आध्यात्मिक चेतना के वैश्विक प्रसार को समर्पित है। इस वर्ष का आयोजन इस दृष्टि से भी विशेष रहा कि भगवान श्री तिरुपति बालाजी के मुंगेर आगमन तथा भगवान विश्वनाथ और भगवान जगन्नाथ की उपस्थिति से जुड़े आध्यात्मिक प्रसंगों ने श्रद्धालुओं की आस्था को और प्रगाढ़ किया।
वैश्विक भागीदारी और प्रासंगिकता
आयोजकों के अनुसार इस महोत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और एशिया के अनेक देशों से साधक सम्मिलित हुए। आयोजन के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा, योग और आत्मपरिवर्तन के संदेश को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया।
यह ऐसे समय में आया है जब मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक संतुलन को लेकर वैश्विक चेतना तेज़ी से बढ़ रही है। आयोजकों का कहना है कि भौतिक प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव के इस दौर में गुरु पूर्णिमा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में पुष्प अर्पित कर सेवा, संयम, सदाचार और साधना के मार्ग पर अग्रसर रहने का संकल्प लिया — एक ऐसा संकल्प जो बिहार स्कूल ऑफ योग की दशकों पुरानी विरासत को आगे ले जाता है।