गुरु पूर्णिमा पर पतंजलि योगपीठ में उमड़े हजारों श्रद्धालु, रामदेव बोले— ज्ञान और संस्कार से बनेगा नया भारत
सारांश
मुख्य बातें
हरिद्वार स्थित पतंजलि योगपीठ में 29 जुलाई 2025 को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए। योग गुरु बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया, अपने गुरुओं का स्मरण किया और उपस्थित अनुयायियों को आशीर्वाद दिया। इस विशाल आयोजन में योग, भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक मूल्यों और सनातन परंपराओं को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया गया।
गुरु पूर्णिमा का संदेश और गुरु-शिष्य परंपरा
बाबा रामदेव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और ज्ञान के सम्मान का पवित्र अवसर है। उन्होंने बताया कि इस दिन हजारों लोग गुरु परंपरा में दीक्षित हो रहे हैं और समाज के सभी वर्गों एवं समुदायों के लोग इस परंपरा का हिस्सा बन रहे हैं।
रामदेव ने कहा कि भारत की ऋषि परंपरा सदा से ज्ञान, संस्कार और मानव कल्याण की वाहक रही है। उन्होंने यज्ञोपवीत संस्कार का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ऋषि संस्कृति और सनातन परंपरा का प्रतीक है, और आज सभी वर्गों के लोग इस संस्कार को धारण कर वेदों तथा भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन कर रहे हैं।
महिलाओं की भागीदारी और वैदिक शिक्षा
बाबा रामदेव ने कहा कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार सभी को समान रूप से प्राप्त है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि महिलाएं भी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का अध्ययन कर रही हैं और यज्ञोपवीत धारण कर रही हैं। उनके अनुसार, भारतीय शास्त्रों का अध्ययन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।
पतंजलि विश्वविद्यालय, आचार्यकुलम और पतंजलि सिविल सर्विसेज अकादमी के विद्यार्थियों के यज्ञोपवीत और विद्यारंभ संस्कार का भी इस अवसर पर उल्लेख किया गया। रामदेव ने विश्वास जताया कि ये विद्यार्थी आने वाले समय में देश को बेहतर प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व प्रदान करेंगे।
राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का आह्वान
रामदेव ने कहा कि नया भारत ऐसा होना चाहिए जहाँ किसी प्रकार का भेदभाव न हो और सभी लोग समान भाव से आगे बढ़ें। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक परमपिता की संतान हैं और समाज को एकता, अखंडता तथा आपसी सहयोग के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग धर्मों और मान्यताओं के बावजूद लोगों के पूर्वज एक हैं, इसलिए देश की एकता और मानवता के लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए।
जंतर-मंतर प्रदर्शन और लोकतंत्र पर टिप्पणी
बाबा रामदेव ने हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों का संदर्भ देते हुए कहा कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन विरोध का तरीका संवैधानिक और मर्यादित होना चाहिए। उन्होंने कहा, 'देश सड़कों से नहीं चलेगा, देश संसद से ही चलेगा। शिक्षा मंत्री कौन होगा या कौन नहीं होगा, यह सड़कों पर तय नहीं होगा, बल्कि देश के प्रधानमंत्री और संसद की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय होगा।'
उन्होंने प्रदर्शनों में लगाए गए कुछ नारों — जैसे 'ब्राह्मणवाद से आजादी' और 'आरएसएस से आजादी' — पर भी प्रतिक्रिया दी। रामदेव ने कहा, 'संविधान इस देश के हर नागरिक को समान अधिकार देता है। जो अधिकार दलित, शोषित और वंचित वर्गों को प्राप्त हैं, वही अधिकार ब्राह्मणों सहित सभी समुदायों को भी प्राप्त हैं। किसी भी जाति या समुदाय के विरुद्ध अपमानजनक भाषा का प्रयोग असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है।'
आगे की राह
इस आयोजन ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि पतंजलि योगपीठ केवल योग और आयुर्वेद का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का एक प्रमुख मंच बन चुका है। रामदेव ने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने पूर्वजों के संस्कारों और मूल्यों को अपनाएँ तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय योगदान दें। गौरतलब है कि इस प्रकार के वार्षिक आयोजन युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने के व्यापक सांस्कृतिक अभियान का हिस्सा हैं।