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स्वामी निरंजनानंद सरस्वती: गुरबाणी में साधना और सेवा का संतुलन ही सच्चा शिष्यत्व

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स्वामी निरंजनानंद सरस्वती: गुरबाणी में साधना और सेवा का संतुलन ही सच्चा शिष्यत्व

सारांश

मुंगेर के संन्यास पीठ में चातुर्मास के अवसर पर गुरबाणी की स्वर-लहरियों के बीच स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने शिष्यत्व का सार समझाया — दीक्षा नहीं, गुरु-संदेश को जीवन में उतारना ही सच्चा शिष्यत्व है। राजनांदगांव के रागी जत्थे ने दो दिन शबद-कीर्तन से श्रद्धालुओं को भाव-विभोर किया।

मुख्य बातें

मुंगेर के संन्यास पीठ, पादुका दर्शन परिसर में 8 अगस्त को दो दिवसीय चातुर्मास कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा — सेवा और साधना का संतुलन ही शिष्य-तत्व का मूल आधार है।
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आए रागी जत्थे — सरदार भूपेंद्र सिंह , सरदार जसपाल सिंह और सरदार सतबीर सिंह — ने शबद-कीर्तन प्रस्तुत किया।
स्वामी जी ने गुरु नानक देव से गुरु गोविंद सिंह तक की परंपरा को सेवा, समता और मानवीय करुणा का स्रोत बताया।
स्वामी शिवध्यानम ने कहा कि शबद-कीर्तन चेतना, करुणा और आत्मबोध जगाने का माध्यम है।

मुंगेर के संन्यास पीठ स्थित पादुका दर्शन परिसर में आयोजित दो दिवसीय चातुर्मास कार्यक्रम शनिवार, 8 अगस्त को गुरबाणी की स्वर-लहरियों और आध्यात्मिक ऊर्जा के बीच सम्पन्न हुआ। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से पधारे सिख रागी जत्थे ने दो दिनों तक शबद-कीर्तन की अविरल प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को गुरु-वाणी, सिमरन और सेवा की सनातन परंपरा से जोड़ा।

मुख्य घटनाक्रम

पूरे आयोजन के दौरान परिसर 'वाहेगुरु' के जाप और गुरबाणी के मधुर स्वरों से गुंजायमान रहा। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने इस अवसर पर कहा कि गुरबाणी भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा और अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है। उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति में किसी सिद्धांत का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह साधना और सेवा के रूप में व्यक्ति के दैनिक जीवन में उतरता है।

शिष्यत्व पर स्वामी जी का संदेश

परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने स्पष्ट किया कि शिष्यत्व का अर्थ केवल गुरु से दीक्षा ग्रहण करना नहीं है — गुरु के संदेश को अपने आचरण और जीवन में उतारना ही वास्तविक शिष्यत्व है। उन्होंने कहा कि सेवा और साधना के बीच संतुलन स्थापित करना शिष्य-तत्व का मूल आधार है। गुरु के मार्ग पर चलने से जीवन में शांति और संतुलन आता है, जबकि गुरु-वाणी से विमुख होने पर व्यक्ति और समाज दोनों में असंतुलन उत्पन्न होता है।

गुरु-परंपरा और भारतीय चिंतन

स्वामी जी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा अनेक धाराओं और समुदायों के संगम से निर्मित है। उन्होंने रेखांकित किया कि पंजाब ने गुरु-परंपरा के संदेश को अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई से आत्मसात किया है। गुरु नानक देव से गुरु गोविंद सिंह तक की महान परंपरा ने भारतीय चिंतन को सेवा, समता, साहस और मानवीय करुणा का व्यापक संदेश दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब में निहित गुरु-वाणी मनुष्य को बाहरी आडंबर से परे अपने भीतर की यात्रा के लिए प्रेरित करती है।

रागी जत्थे की प्रस्तुति

कार्यक्रम में राजनांदगांव से पधारे रागी जत्थे के सरदार भूपेंद्र सिंह, सरदार जसपाल सिंह और सरदार सतबीर सिंह ने शबद-कीर्तन की मनमोहक प्रस्तुति दी। श्रद्धालु राग और स्वर के साथ गुरबाणी के शब्दों को सुनकर आध्यात्मिक भाव में डूबे रहे। स्वामी शिवध्यानम ने कहा कि शबद-कीर्तन सिख आध्यात्मिक परंपरा का अभिन्न अंग है और श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र वाणी का संगीत के साथ गायन भक्ति की अभिव्यक्ति के साथ-साथ चेतना, करुणा और आत्मबोध जगाने का सशक्त माध्यम है।

आयोजन का समापन और संदेश

दो दिनों तक चले इस आयोजन में मुंगेर के श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का समापन साधना और सेवा के संदेश के साथ हुआ। इस आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और विभिन्न परंपराओं के बीच संवाद मानवीय एकता को और सुदृढ़ करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु इसका गहरा निहितार्थ यह है कि एक हिंदू मठ द्वारा सिख रागी जत्थे को आमंत्रित करना भारत की साझा आध्यात्मिक विरासत को व्यावहारिक धरातल पर जीने का प्रयास है। स्वामी निरंजनानंद का यह कथन कि 'दीक्षा नहीं, आचरण ही शिष्यत्व है' — वस्तुतः धर्म के कर्मकांडीकरण पर एक सूक्ष्म लेकिन तीखी टिप्पणी है। ऐसे समय में जब धार्मिक पहचान अक्सर विभाजन का माध्यम बनती है, यह आयोजन एक भिन्न और विचारणीय नज़ीर प्रस्तुत करता है।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चातुर्मास कार्यक्रम मुंगेर में कब और कहाँ आयोजित हुआ?
यह दो दिवसीय चातुर्मास कार्यक्रम बिहार के मुंगेर स्थित संन्यास पीठ के पादुका दर्शन परिसर में आयोजित हुआ और 8 अगस्त को सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में गुरबाणी शबद-कीर्तन और आध्यात्मिक प्रवचन शामिल थे।
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने शिष्यत्व के बारे में क्या कहा?
परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि शिष्यत्व का अर्थ केवल गुरु से दीक्षा लेना नहीं है, बल्कि गुरु के संदेश को अपने जीवन और आचरण में उतारना ही वास्तविक शिष्यत्व है। उन्होंने सेवा और साधना के बीच संतुलन को शिष्य-तत्व का मूल बताया।
कार्यक्रम में शबद-कीर्तन किसने प्रस्तुत किया?
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आए रागी जत्थे के सरदार भूपेंद्र सिंह, सरदार जसपाल सिंह और सरदार सतबीर सिंह ने दो दिनों तक शबद-कीर्तन की प्रस्तुति दी। उनके कीर्तन ने श्रद्धालुओं को गुरु-वाणी, सिमरन और सेवा की परंपरा से जोड़ा।
गुरबाणी और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के बारे में स्वामी जी ने क्या संदेश दिया?
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गुरबाणी भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा है और गुरु नानक देव से गुरु गोविंद सिंह तक की परंपरा ने सेवा, समता, साहस और मानवीय करुणा का संदेश दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की शक्ति उसकी विविधता में है।
सिमरन और सेवा को इस आयोजन में क्यों महत्वपूर्ण बताया गया?
स्वामी शिवध्यानम ने बताया कि शबद-कीर्तन और सिमरन सिख आध्यात्मिक परंपरा के प्रमुख आधार हैं, जो भक्ति की अभिव्यक्ति के साथ-साथ चेतना, करुणा और आत्मबोध जगाने का माध्यम हैं। स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि इन दोनों को जीवन में अपनाने वाला व्यक्ति आत्मिक शांति और सच्चे धर्म के करीब पहुँचता है।
राष्ट्र प्रेस
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