14 जुलाई 2026
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ज्ञानवापी विवाद: सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल का हिंदू पक्ष ने स्वागत किया, मुस्लिम पक्ष पर सहयोग न करने का आरोप

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ज्ञानवापी विवाद: सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल का हिंदू पक्ष ने स्वागत किया, मुस्लिम पक्ष पर सहयोग न करने का आरोप

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता पहल ने ज्ञानवापी विवाद को फिर गरमा दिया है। हिंदू पक्ष ने बैठक में शामिल होने की हामी भरी, जबकि मुस्लिम पक्ष और ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति पर इस पहल को ठुकराने का आरोप है — जो इस दशकों पुराने विवाद के समाधान की राह को और जटिल बना सकता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानवापी विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता की पहल की है।
हिंदू पक्ष के वादकारियों ने जिला न्यायालय में होने वाली मध्यस्थता बैठक में शामिल होने की पुष्टि की।
वादी सोहन लाल आर्य ने आरोप लगाया कि ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति सहित मुस्लिम पक्ष ने मध्यस्थता अस्वीकार कर दी।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट में मंदिर के अवशेष और प्राचीन मूर्तियाँ मिलने का दावा किया गया है।
मुस्लिम पक्ष प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का हवाला देते हुए स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव का विरोध कर रहा है।

वाराणसी में ज्ञानवापी विवाद एक बार फिर केंद्र में आ गया है, जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस दीर्घकालीन धार्मिक विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की पहल की। हिंदू पक्ष के वादकारियों ने 14 जुलाई को इस पहल का खुलकर स्वागत किया और कहा कि वे जिला न्यायालय में होने वाली मध्यस्थता बैठक में भाग लेंगे। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति सहित मुस्लिम पक्ष इस पहल को अस्वीकार कर रहा है।

हिंदू पक्ष का रुख

हिंदू पक्ष के प्रमुख वादी सोहन लाल आर्य ने कहा, 'यह पहल सुप्रीम कोर्ट ने की है और हम इसका स्वागत करते हैं। लेकिन मुस्लिम पक्ष, जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद प्रबंधन समिति भी शामिल है, ने इस मध्यस्थता को अस्वीकार कर दिया है। यह सामाजिक सद्भाव के लिहाज से उचित नहीं है।' उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष के मध्यस्थता से दूर रहने के कारण उन्हें ज्ञात हैं।

आर्य ने कई सवाल उठाए — 'क्या दुनिया में कोई ऐसी मस्जिद है जिसके नीचे पूजा-पाठ हो और ऊपर नमाज पढ़ी जाए? क्या किसी मस्जिद के सामने नंदी विराजमान हैं? ऐसा कहीं नहीं है — यही हमारे प्रमुख प्रमाण और साक्ष्य हैं।' उन्होंने यह भी दावा किया कि वाराणसी जिला न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वक्फ बोर्ड तथा प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 से जुड़े मामलों में मुस्लिम पक्ष पहले ही हार चुका है।

अन्य हिंदू वादियों के बयान

हिंदू पक्ष की वादी लक्ष्मी देवी ने आरोप लगाया कि मुस्लिम पक्ष शुरू से ही रुकावटें पैदा कर रहा है। उन्होंने कहा, 'उन्हें पता है कि ज्ञानवापी मंदिर है, मस्जिद नहीं। इसलिए वे मध्यस्थता में शामिल नहीं होना चाहते और मामले को जितना हो सके लंबा खींचना चाहते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि 1669 में औरंगजेब द्वारा मंदिर ध्वस्त किए जाने से पहले भी वहाँ मंदिर ही था।

एक अन्य वादी सीता साहू ने कहा कि अगर सर्वोच्च न्यायालय या दूसरा पक्ष इस स्थल को मंदिर मानकर उन्हें वापस कर दे, तो कोई विवाद शेष नहीं रहेगा। उन्होंने कहा, 'न्यायालय जो भी फैसला देता है, हम उसका सम्मान करते हैं और उसका पालन करते हैं। जिसे हम मंदिर मानते हैं, उसे मस्जिद कैसे कह सकते हैं?'

विवाद की पृष्ठभूमि

ज्ञानवापी विवाद उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा दशकों पुराना मामला है। हिंदू पक्ष का दावा है कि 1669 में औरंगजेब ने प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर वहाँ मस्जिद का निर्माण कराया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट में भी मंदिर के अवशेष और प्राचीन मूर्तियाँ मिलने का दावा किया गया है।

यह ऐसे समय में आया है जब मुस्लिम पक्ष प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का हवाला देते हुए इस स्थल के धार्मिक स्वरूप में किसी भी बदलाव का विरोध कर रहा है। गौरतलब है कि यह मामला निचली अदालतों से होते हुए अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच चुका है।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय की मध्यस्थता पहल के तहत जिला न्यायालय में बैठक प्रस्तावित है, जिसमें हिंदू पक्ष की भागीदारी सुनिश्चित बताई जा रही है। मुस्लिम पक्ष की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस मामले का अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय में ही होना है, और मध्यस्थता की सफलता दोनों पक्षों की सहमति पर निर्भर करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी सफलता दोनों पक्षों की वास्तविक इच्छाशक्ति पर टिकी है — और फिलहाल वह एकतरफा दिखती है। हिंदू पक्ष के आरोप कि मुस्लिम पक्ष जानबूझकर प्रक्रिया से दूर है, इस विवाद की उस पुरानी प्रवृत्ति की याद दिलाते हैं जहाँ दोनों ओर से कानूनी दाँव-पेंच संवाद से ऊपर रहे हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 की संवैधानिक वैधता स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है — ऐसे में मध्यस्थता का परिणाम उस व्यापक कानूनी प्रश्न से अलग नहीं किया जा सकता। बिना दोनों पक्षों की सहभागिता के, यह पहल एक और अधूरे प्रयास की सूची में जुड़ने का जोखिम उठाती है।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ज्ञानवापी विवाद में सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल क्या है?
सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानवापी विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने के लिए मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत जिला न्यायालय में दोनों पक्षों की बैठक प्रस्तावित है। हिंदू पक्ष ने इसमें शामिल होने की सहमति दी है, जबकि मुस्लिम पक्ष ने कथित तौर पर इसे अस्वीकार कर दिया है।
ज्ञानवापी विवाद की मूल पृष्ठभूमि क्या है?
यह वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा दशकों पुराना विवाद है। हिंदू पक्ष का दावा है कि 1669 में औरंगजेब ने प्राचीन मंदिर ध्वस्त कर वहाँ मस्जिद बनवाई थी, जबकि ASI रिपोर्ट में भी मंदिर के अवशेष मिलने का उल्लेख है।
मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता से क्यों दूर है?
मुस्लिम पक्ष ने अभी तक अपनी आधिकारिक स्थिति सार्वजनिक नहीं की है। हिंदू पक्ष के वादकारियों का आरोप है कि मुस्लिम पक्ष प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 की आड़ में मामले को लंबा खींचना चाहता है और निचली अदालतों में हार के बाद मध्यस्थता से बच रहा है।
प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का इस मामले में क्या महत्व है?
यह कानून 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार धार्मिक स्थलों के स्वरूप को अपरिवर्तित रखने का प्रावधान करता है। मुस्लिम पक्ष इसी कानून का हवाला देते हुए ज्ञानवापी मस्जिद के धार्मिक स्वरूप में किसी भी बदलाव का विरोध कर रहा है, हालाँकि इस कानून की संवैधानिक वैधता स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
ASI की रिपोर्ट में ज्ञानवापी को लेकर क्या कहा गया है?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट में ज्ञानवापी परिसर में मंदिर के अवशेष और प्राचीन मूर्तियाँ मिलने का दावा किया गया है। हिंदू पक्ष इस रिपोर्ट को अपने दावे के प्रमुख साक्ष्यों में से एक मानता है।
राष्ट्र प्रेस
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