राजधानी एक्सप्रेस में आग: 'सब जलकर राख हो गया', यात्रियों का रेलवे पर लापरवाही का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
तिरुवनंतपुरम-हजरत निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस में 17 मई 2026 को कोटा के निकट भीषण आग लगने के बाद यात्रियों ने रेलवे के खिलाफ जमकर विरोध-प्रदर्शन किया। यात्रियों का आरोप है कि आग लगने के दौरान न तो फायर अलार्म समय पर बजा, न ही राहत-बचाव दल तत्काल पहुँचा, जिससे उनका सामान, नकदी, ज्वेलरी और जरूरी दस्तावेज़ जलकर नष्ट हो गए। रेलवे ने प्रत्येक प्रभावित यात्री को ₹5,000 की तत्काल सहायता राशि जारी की है, जबकि कई यात्री एफआईआर दर्ज कराने के लिए कोटा में ही रुके रहे।
कैसे लगी आग, क्या हुआ उस रात
यात्रियों के अनुसार, रात के समय एक महिला टॉयलेट जाने के लिए उठी तो उसने गेट के पास आग देखी। महिला के चिल्लाने पर अन्य यात्री जागे, लेकिन तब तक कोच के भीतर धुआँ भर चुका था। यात्रियों ने चेन खींची, परंतु फायर अलार्म नहीं बजा। कुछ ही मिनटों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि लोग जान बचाने के लिए चलती ट्रेन से कूदने पर मजबूर हो गए।
यात्री भूषण ने बताया कि चार-पाँच लोगों ने मिलकर बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने की कोशिश की। इसी दौरान बगल के ट्रैक से एक मालगाड़ी गुज़री, जिससे आग और भड़क गई। उन्होंने कहा, 'ट्रेन से कूदने पर पैर में चोट लगी। मेरे बैग में लैपटॉप, मार्कशीट, नकदी और जरूरी कागज़ात थे — सब जल गए। हम बच गए, यही बड़ी बात है।'
यात्रियों की आपबीती
गोवा से हरियाणा जा रही एक महिला यात्री ने कहा कि एक साल की मेहनत की कमाई, कागज़ात और कपड़े — सब कुछ जलकर राख हो गया। 'हमें आज मौत सामने दिखाई दे रही थी,' उन्होंने कहा। उनका आरोप था कि काफी देर बाद पानी मिला, वह भी ठंडा नहीं था, और दवाई माँगने पर कहा गया कि कोटा पहुँचने पर मिलेगी।
संजू मिश्रा नाम की एक अन्य यात्री, जो सूरत से दिल्ली जा रही थीं, ने बताया कि तीन घंटे तक उन्होंने अपना सामान जलते हुए देखा। उन्होंने आरोप लगाया कि राहत के लिए पहुँची फायर ब्रिगेड की गाड़ी में पानी तक नहीं था और गाँव वालों की मदद से पानी लाकर आग बुझाई गई। उनके नकदी, कपड़े और ज्वेलरी सब जल गए।
रेलवे की प्रतिक्रिया और राहत उपाय
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, ट्रेन में अतिरिक्त कोच जोड़कर उसे आगे रवाना किया गया। प्रत्येक प्रभावित यात्री को ₹5,000 की विशेष तत्काल राहत राशि दी गई है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि सभी यात्रियों के खाने-पीने की व्यवस्था की गई और जो यात्री क्षतिपूर्ति का दावा करना चाहते हैं, वे आधिकारिक प्रक्रिया के तहत कर सकते हैं।
हालाँकि, कई यात्रियों ने आगे की यात्रा करने से इनकार कर दिया और एफआईआर दर्ज होने तक कोटा में रुकने का फैसला किया। उनका कहना था कि ₹5,000 की राहत राशि उनके वास्तविक नुकसान की तुलना में नगण्य है।
सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब भारतीय रेलवे की ट्रेन सुरक्षा प्रणालियों पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। फायर अलार्म का न बजना और फायर ब्रिगेड का पानी रहित पहुँचना — ये दोनों तथ्य रेलवे की आपातकालीन तैयारियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। आलोचकों का कहना है कि प्रीमियम ट्रेनों में भी बुनियादी सुरक्षा मानकों की अनदेखी चिंताजनक है। आगे जाँच के नतीजे और रेलवे की जवाबदेही तय होना बाकी है।