प्रेमनाथ मल्होत्रा: हीरो से खलनायक तक का सफर, हिंदी सिनेमा को दी अमिट पहचान
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के इतिहास में प्रेमनाथ मल्होत्रा एक ऐसे कलाकार रहे, जिन्होंने रुपहले पर्दे पर नकारात्मक किरदारों को जिस गहराई और दमदारी से जिया, वह आज भी दर्शकों के ज़हन में ताज़ा है। उनकी गरजती आवाज़, रोबदार व्यक्तित्व और आँखों में घुली तीव्रता ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों की पहली पंक्ति में ला खड़ा किया। 3 नवंबर 1992 को 65 वर्ष की आयु में हार्ट अटैक से उनका निधन हुआ था — और आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके संघर्षपूर्ण व प्रेरक फिल्मी सफर को याद करना बनता है।
पेशावर से मुंबई तक का सफर
प्रेमनाथ का जन्म पेशावर में हुआ था। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार मध्य प्रदेश में आकर बस गया। पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे, इसलिए उन्होंने प्रेमनाथ का नामांकन भारतीय सेना में करा दिया। लेकिन अभिनय का जुनून इतना प्रबल था कि प्रेमनाथ फौज छोड़कर सपनों की नगरी मुंबई पहुँच गए। यहाँ उन्होंने प्रतिष्ठित पृथ्वी थिएटर से जुड़कर अपनी अभिनय-यात्रा की नींव रखी।
पहली फिल्म से ही उन्हें कुछ हद तक सफलता मिली और फिल्मों का सिलसिला बढ़ता गया। इसी दौरान उन्हें अभिनेत्री बीना राय से प्रेम हुआ और दोनों ने विवाह कर लिया। निजी ज़िंदगी में सब ठीक-ठाक था, लेकिन व्यावसायिक मोर्चे पर मुसीबतें सिर उठाने लगीं।
पी.एन. फिल्म्स और असफलता का दौर
फिल्मी पृष्ठभूमि से जुड़े होने के चलते बीना राय और प्रेमनाथ ने मिलकर प्रोडक्शन बैनर पी.एन. फिल्म्स की स्थापना की। इस बैनर तले कई फिल्में रिलीज़ हुईं, लेकिन अधिकतर बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रहीं। एक ओर बीना राय कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ रही थीं, तो दूसरी ओर प्रेमनाथ बतौर हीरो खुद को स्थापित करने में संघर्षरत थे।
यह दौर प्रेमनाथ के लिए मानसिक रूप से बेहद थका देने वाला था। निराशा इतनी गहरी हो गई कि उन्होंने कुछ वर्षों के लिए फिल्मी दुनिया से पूरी तरह किनारा कर लिया और संन्यासियों जैसा जीवन जीने लगे। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा में नायकों की भरमार थी और नया चेहरा स्थापित होना बेहद कठिन था।
विलेन के रूप में नई पहचान
कुछ वर्षों के विराम के बाद प्रेमनाथ ने फिल्मी करियर में वापसी की — इस बार नायक के रूप में नहीं, बल्कि खलनायक के रूप में। और यह निर्णय उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। 'जानी दुश्मन' जैसी फिल्मों में उनके खलनायक किरदार ने दर्शकों और आलोचकों, दोनों की तारीफ बटोरी। उनकी खलनायकी में एक नाटकीय गहराई थी जो तत्कालीन सिनेमा में दुर्लभ थी।
गौरतलब है कि प्रेमनाथ और राज कपूर शुरू से घनिष्ठ मित्र थे। राज कपूर की कई फिल्मों में वे नज़र आए। एक किस्से के अनुसार, राज कपूर एक बार प्रेमनाथ के साथ रीवा गए थे, जहाँ उनकी पहली नज़र कृष्णा पर पड़ी और दोनों ने विवाह कर लिया। प्रेमनाथ की एक अन्य बहन उमा का विवाह प्रसिद्ध अभिनेता प्रेम चोपड़ा से हुआ था।
अंतरराष्ट्रीय पर्दे पर भी छाप
प्रेमनाथ की प्रतिभा केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अमेरिकन फिल्म 'केनरे' में भी अभिनय किया, जो 1969 में रिलीज़ हुई थी। इसके अलावा, उन्होंने अमेरिकन टेलीविज़न शो 'माया' में 1967 से 1969 तक काम किया — जो किसी भारतीय अभिनेता के लिए उस युग में एक उल्लेखनीय उपलब्धि थी। हिंदी सिनेमा में उनकी आखिरी फिल्म 'हम दोनों' रही।
विरासत और अंतिम विदाई
3 नवंबर 1992 को 65 वर्ष की आयु में हार्ट अटैक के कारण प्रेमनाथ का निधन हो गया। वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने विफलता को स्वीकार कर उसे अपनी ताकत में बदला। उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि पर्दे पर किरदार चाहे नकारात्मक हो, लेकिन कलाकार की साधना सकारात्मक परिणाम देती है। हिंदी सिनेमा के खलनायकी के इतिहास में उनका नाम सदा अमर रहेगा।