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विकसित भारत के लिए बैंकिंग सुधार: केंद्र ने उच्च स्तरीय समिति बनाई, सुरेश एन. पटेल करेंगे अध्यक्षता

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विकसित भारत के लिए बैंकिंग सुधार: केंद्र ने उच्च स्तरीय समिति बनाई, सुरेश एन. पटेल करेंगे अध्यक्षता

सारांश

केंद्र ने 2047 के 'विकसित भारत' लक्ष्य के लिए बैंकिंग क्षेत्र में बड़े सुधारों की तैयारी शुरू कर दी है। पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सुरेश एन. पटेल की अध्यक्षता में गठित यह उच्च स्तरीय समिति नियामक ढाँचे से लेकर AI एकीकरण तक हर पहलू पर सिफारिशें देगी।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने 30 अक्टूबर 2026 को 'विकसित भारत के लिए बैंकिंग' पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया।
समिति की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सुरेश एन.
पटेल करेंगे; सदस्यों में RBI के उप राज्यपाल शिरीष चंद्र मुर्मु और पूर्व उप राज्यपाल एन.
समिति संरचनात्मक, नियामक और विधायी सुधारों के साथ-साथ AI और डिजिटल नवाचार का रोडमैप भी तैयार करेगी।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 के केंद्रीय बजट में इस समिति के गठन की घोषणा की थी।
समिति क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों , सहकारी बैंकों और NBFCs सहित समग्र बैंकिंग तंत्र की समीक्षा करेगी।
लक्ष्य: 2047 तक भारतीय बैंकों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और वित्तीय रूप से समावेशी बनाना।

केंद्र सरकार ने 30 अक्टूबर 2026 को भारत के बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। वित्त मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, इस समिति का उद्देश्य भारतीय बैंकिंग तंत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, वित्तीय रूप से समावेशी और 2047 तक के 'विकसित भारत' के लक्ष्य के अनुरूप सुदृढ़ बनाना है। यह समिति संरचनात्मक, संस्थागत, नियामक और विधायी सुधारों पर अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपेगी।

समिति का गठन और सदस्य

इस समिति की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सुरेश एन. पटेल करेंगे। समिति के सदस्यों में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के उप राज्यपाल शिरीष चंद्र मुर्मु, इंडियन बैंक की पूर्व मुख्य निदेशक एवं सीईओ पद्मजा चुंदुरु तथा RBI के पूर्व उप राज्यपाल एन. एस. विश्वनाथन शामिल हैं। वित्तीय सेवा विभाग में बैंकिंग के संयुक्त सचिव इस समिति के सदस्य सचिव के रूप में कार्य करेंगे।

गौरतलब है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 के केंद्रीय बजट में इस उच्च स्तरीय समिति के गठन की घोषणा की थी। बजट घोषणा से लेकर समिति के औपचारिक गठन तक का यह कदम सरकार की बैंकिंग क्षेत्र में सुधार की मंशा को स्पष्ट करता है।

कार्यक्षेत्र: क्या-क्या समीक्षा होगी

समिति को व्यापक कार्यक्षेत्र सौंपा गया है। यह वर्तमान बैंकिंग प्रथाओं और विवेकपूर्ण मानदंडों का आकलन करेगी, वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की पहचान कर उन्हें भारतीय संदर्भ में अनुकूलित करेगी, और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैंकों के निर्माण के लिए एक रोडमैप तैयार करेगी।

इसके अलावा, समिति क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों सहित समस्त बैंकों के नियामक और कानूनी ढाँचों की समीक्षा करेगी। विकास वित्तीय संस्थानों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) सहित बैंकों की दीर्घकालिक पूंजी आवश्यकताओं का भी आकलन किया जाएगा।

डिजिटल नवाचार और साइबर सुरक्षा पर ज़ोर

समिति बैंकिंग संस्थानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल नवाचार के एकीकरण के लिए एक समग्र रोडमैप तैयार करेगी। साथ ही, साइबर जोखिमों से सुरक्षा के लिए ठोस उपाय सुझाएगी — यह ऐसे समय में अत्यंत प्रासंगिक है जब भारत में डिजिटल बैंकिंग धोखाधड़ी के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।

भविष्य के लिए तैयार कार्यबल सुनिश्चित करने हेतु प्रतिभा अधिग्रहण और क्षमता निर्माण की रणनीति भी समिति के एजेंडे में शामिल है।

वित्तीय समावेशन और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण

समिति प्राथमिकता क्षेत्र ऋण ढाँचे और लीड बैंक योजना की समीक्षा करेगी, ताकि समावेशी, संतुलित और डेटा-आधारित ऋण वितरण को बढ़ावा दिया जा सके। यह मूल्यांकन बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं और वित्तीय समावेशन के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।

व्यवसायों के लिए पूंजी की लागत में अंतर का विश्लेषण भी किया जाएगा और सतत विकास के लिए निजी निवेश को प्रोत्साहित करने हेतु नीतिगत विकल्प सुझाए जाएँगे। समिति सरकार द्वारा सौंपे गए किसी भी अन्य मामले पर भी सिफारिशें देने के लिए अधिकृत होगी।

आगे की राह

यह समिति ऐसे समय में गठित की गई है जब भारत का बैंकिंग क्षेत्र गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) में कमी के बाद अपेक्षाकृत मज़बूत स्थिति में है, लेकिन वैश्विक बैंकिंग मानकों से तालमेल बिठाने की चुनौती अभी भी बनी हुई है। समिति की सिफारिशें भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के अगले दशक की रूपरेखा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत में बैंकिंग सुधार समितियों का इतिहास मिला-जुला रहा है — नरसिम्हम समिति से लेकर पी. जे. नायक समिति तक, सिफारिशें अक्सर आंशिक रूप से ही लागू हुई हैं। असली परीक्षा यह होगी कि क्या सरकार समिति की रिपोर्ट को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखकर उसे पूरी तरह अमल में लाती है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकारी हस्तक्षेप और व्यावसायिक स्वायत्तता के बीच का तनाव — जो दशकों पुरानी समस्या है — इस बार की सिफारिशों में केंद्रबिंदु होनी चाहिए। बिना क्रियान्वयन की समयसीमा और जवाबदेही तंत्र के, यह रिपोर्ट भी उन दस्तावेज़ों की कतार में शामिल होने का जोखिम उठाती है जो अलमारियों में धूल खाते रहते हैं।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विकसित भारत बैंकिंग समिति क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
यह केंद्र सरकार द्वारा 30 अक्टूबर 2026 को गठित एक उच्च स्तरीय समिति है, जिसका उद्देश्य भारतीय बैंकिंग क्षेत्र को 2047 तक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, वित्तीय रूप से समावेशी और 'विकसित भारत' के लक्ष्य के अनुरूप बनाना है। यह संरचनात्मक, नियामक और विधायी सुधारों पर सिफारिशें देगी।
इस समिति की अध्यक्षता कौन करेगा और इसमें कौन-कौन शामिल हैं?
समिति की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सुरेश एन. पटेल करेंगे। सदस्यों में RBI के उप राज्यपाल शिरीष चंद्र मुर्मु, इंडियन बैंक की पूर्व CEO पद्मजा चुंदुरु और RBI के पूर्व उप राज्यपाल एन. एस. विश्वनाथन शामिल हैं। वित्तीय सेवा विभाग में बैंकिंग के संयुक्त सचिव सदस्य सचिव का कार्य करेंगे।
यह समिति किन विषयों पर काम करेगी?
समिति वर्तमान बैंकिंग प्रथाओं, नियामक ढाँचे, दीर्घकालिक पूंजी आवश्यकताओं, AI और डिजिटल नवाचार, साइबर सुरक्षा, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों की समीक्षा करेगी। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैंकों के निर्माण का रोडमैप भी तैयार करेगी।
इस समिति की घोषणा कब और कहाँ हुई थी?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए इस समिति के गठन की घोषणा की थी। बजट घोषणा के बाद वित्त मंत्रालय ने 30 अक्टूबर 2026 को आधिकारिक रूप से समिति का गठन किया।
यह समिति आम नागरिकों और बैंकिंग क्षेत्र को कैसे प्रभावित करेगी?
समिति की सिफारिशें ग्रामीण और सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली, वित्तीय समावेशन, ऋण वितरण की सुगमता और डिजिटल बैंकिंग सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकती हैं। आम नागरिकों के लिए इसका मतलब बेहतर बैंकिंग सेवाएँ, सस्ता ऋण और अधिक सुरक्षित डिजिटल लेनदेन हो सकता है — हालाँकि यह समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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