DOJ मामला खारिज होने के बाद गौतम अदाणी बोले — विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी, हिंडनबर्ग से मिला आत्ममंथन का अवसर
सारांश
मुख्य बातें
अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी ने 12 अगस्त 2026 को अहमदाबाद में आयोजित 'अपनी बात, अपनों के साथ' कार्यक्रम में समूह के 700 से अधिक स्थानों पर जुड़े तीन लाख से अधिक कर्मचारियों और साझेदारों को संबोधित किया। यह संबोधन न्यूयॉर्क ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट द्वारा अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) के आपराधिक मामले को स्थायी रूप से खारिज किए जाने के ठीक दो दिन बाद आया। अदाणी ने कहा कि पिछले लगभग दो वर्षों के इस अनुभव ने उन्हें और अधिक विनम्र बनाया है।
संकट में भी अटूट रहा संकल्प
गौतम अदाणी ने कहा कि जब मामला वैश्विक सुर्खियों में था, तब भी समूह के इंजीनियरों, श्रमिकों, आपूर्तिकर्ताओं, ठेकेदारों और साझेदारों ने अपने कार्यों को पूरी प्रतिबद्धता के साथ जारी रखा। उनके अनुसार, अदालत की कार्यवाही से अधिक प्रभावित करने वाली चीज़ यही शांत और अटूट समर्पण था। उन्होंने इस सामूहिक संकल्प को समूह की सबसे बड़ी ताकत बताया।
हिंडनबर्ग और FPO वापसी का फैसला
2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों के बाद समूह ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। अदाणी ने बताया कि समूह कानूनी रूप से अपने ₹20,000 करोड़ के पूर्ण रूप से सब्सक्राइब्ड फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO) को आगे बढ़ा सकता था, लेकिन निवेशकों की पूंजी वापस लौटाने का फैसला किया गया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय किसी कानूनी अधिकार के उपयोग से नहीं, बल्कि निवेशकों के भरोसे की रक्षा करने की भावना से लिया गया था। यह सीख उन्हें अपने पिता से मिली थी कि 'विश्वास किसी भी कानूनी अधिकार से बड़ा होता है।'
कारोबारी प्रदर्शन और निवेश की निरंतरता
इस प्रतिबद्धता का प्रभाव समूह के वित्तीय प्रदर्शन में भी दिखा। अदाणी समूह का पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पिछले वर्ष ₹1.53 लाख करोड़ तक पहुँचा, जो भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े निवेशों में से एक रहा। समूह ने बंदरगाह, हवाई अड्डे, लॉजिस्टिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, ट्रांसमिशन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और विनिर्माण में निवेश जारी रखा। गौरतलब है कि यह निवेश उस दौर में हुआ जब समूह पर वैश्विक दबाव चरम पर था।
समुद्र मंथन से सबक — संकट में ही असली ताकत
अदाणी ने भारतीय पौराणिक कथा 'समुद्र मंथन' का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति, संस्थान या राष्ट्र की हर महत्वपूर्ण यात्रा कठिन परिस्थितियों से होकर गुजरती है, और उन्हीं परिस्थितियों में वास्तविक ताकत सामने आती है। उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर मुंबई आने और शून्य से कारोबार खड़ा करने के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वास न तो माँगा जा सकता है और न ही विरासत में मिलता है — इसे केवल चरित्र, निरंतरता और वचन निभाने से अर्जित किया जाता है।
विकसित भारत 2047 और आने वाली पीढ़ी
भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष यानी 2047 की ओर देखते हुए अदाणी ने कर्मचारियों से पूछा कि हमारी पीढ़ी को किस लिए याद किया जाएगा? उनके अनुसार, भारत का मूल्यांकन केवल अवसंरचना से नहीं, बल्कि उन अवसरों, समुदायों और मूल्यों से होगा जिन्हें देश विकसित करेगा। उन्होंने कहा कि किसी संस्थान की पहचान इस बात से बनती है कि संकट के दौरान उसने किन मूल्यों की रक्षा की — और 'विकसित भारत' की यात्रा में सबसे बड़ी विरासत वे संस्थान होंगे जो विश्वास अर्जित करें और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर भविष्य सौंपें।