2 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

हिमाचल प्रदेश: जमीन कब्जाधारियों की बहुओं पर भी पंचायत चुनाव में रोक, विधानसभा में बिल पास

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
हिमाचल प्रदेश: जमीन कब्जाधारियों की बहुओं पर भी पंचायत चुनाव में रोक, विधानसभा में बिल पास

सारांश

हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार ने वह खामी बंद कर दी जिसके ज़रिये जमीन कब्जाधारी अपनी बहुओं को चुनाव में उतारकर परोक्ष रूप से सत्ता चलाते थे। नए संशोधन के तहत बहू को भी 'परिवार' में शामिल कर 6 साल की अयोग्यता का दायरा बढ़ा दिया गया है।

मुख्य बातें

हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने 1 सितंबर 2026 को पंचायती राज (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।
अब जमीन कब्जाधारियों की बहुएँ भी पंचायत, BDC और जिला परिषद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य होंगी।
अयोग्यता की अवधि कब्जा छोड़ने या बेदखली की तारीख से 6 वर्ष निर्धारित की गई है।
यह बिल 6 मई 2026 को जारी अध्यादेश का स्थान लेगा और इसे स्थायी कानूनी रूप देगा।
अयोग्यता के आधारों में NDPS मामले, बकाया कर, सरकारी नौकरी और नामांकन में गलत जानकारी भी शामिल।
शिकायत की स्थिति में राज्य चुनाव आयोग से परामर्श के बाद अधिकृत अधिकारी निर्णय लेगा।

हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को 'हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2026' पारित कर दिया, जो सरकारी और शामिलात (गाँव की साझा) भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों के परिवार की बहुओं को भी पंचायत चुनाव लड़ने से रोकता है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने यह कदम उस कानूनी खामी को बंद करने के लिए उठाया है, जिसका फायदा पिछले चुनावों में कब्जाधारी बड़े पैमाने पर उठाते रहे हैं।

क्या है नई व्यवस्था

पुराने हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 में 'परिवार के सदस्य' की परिभाषा में दादा-दादी/नाना-नानी, माता-पिता, जीवनसाथी, बेटा और अविवाहित बेटी शामिल थे — लेकिन बहू का कोई उल्लेख नहीं था। नए संशोधन के तहत बहू को भी परिवार की परिभाषा में शामिल कर लिया गया है।

अब यदि कोई उम्मीदवार या उनके परिवार का कोई सदस्य — जिसमें बहू भी सम्मिलित है — सरकारी अथवा शामिलात भूमि पर अवैध कब्जे का दोषी पाया जाता है, तो उसे कब्जा छोड़ने या बेदखल किए जाने की तारीख से छह वर्ष तक पंचायत, ब्लॉक डेवलपमेंट कमेटी (BDC) या जिला परिषद के किसी भी पद के लिए चुनाव लड़ने से पूरी तरह अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

पुरानी खामी और उसका दुरुपयोग

गौरतलब है कि पिछले पंचायत चुनावों में अनेक अवैध कब्जाधारी स्वयं अयोग्य घोषित होने पर अपनी बहुओं को पंचायत प्रधान, BDC सदस्य या जिला परिषद सदस्य के पद के लिए मैदान में उतार देते थे और परोक्ष रूप से शासन संचालित करते थे। सरकार का तर्क है कि बहू परिवार का अभिन्न हिस्सा होती है और प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उस कब्जे का लाभ उठाती है, इसलिए यह अयोग्यता तार्किक रूप से उन पर भी लागू होनी चाहिए।

यह ऐसे समय में आया है जब हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों की तैयारियाँ जोर पकड़ रही हैं और भूमि अतिक्रमण के मामले ग्रामीण राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बने हुए हैं।

अध्यादेश की जगह लेगा यह बिल

राज्य सरकार ने इस विषय में पहले 6 मई 2026 को एक अध्यादेश जारी किया था। विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह द्वारा पेश किया गया यह विधेयक अब उस अध्यादेश का स्थान लेगा, जिससे यह प्रावधान स्थायी कानूनी रूप ले लेगा।

अयोग्यता के अन्य आधार

अधिनियम की धारा 122 के तहत भूमि कब्जे के अलावा कई अन्य आधारों पर भी उम्मीदवारों को अयोग्य माना जाएगा। इनमें शामिल हैं:

नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम के तहत ड्रग तस्करी से संबंधित न्यायालय में लंबित मामले; पंचायत, पंचायत समिति या जिला परिषद को देय कर, शुल्क या बकाया राशि का अदायगी न करना; पंचायत या सरकारी उपक्रमों में किसी भी प्रकार की — नियमित, अंशकालिक, दैनिक वेतन या संविदा — नौकरी करना; नामांकन पत्रों में गलत जानकारी या भ्रामक घोषणा देना; तथा चुनावी अपराधों, अनुचित तरीकों या नैतिक अधमता वाले अपराधों में छह वर्ष तक की सजा का दोषी पाया जाना।

शिकायत और निर्णय की प्रक्रिया

बिल के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी उम्मीदवार की अयोग्यता को लेकर कोई प्रश्न या शिकायत उठती है, तो संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा। इसके बाद राज्य सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी राज्य चुनाव आयोग से परामर्श करके अंतिम निर्णय लेगा। यह संशोधन हिमाचल प्रदेश की पंचायती राज व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका असर तभी होगा जब जमीन कब्जे की पहचान और बेदखली की प्रशासनिक प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध हो — जो हिमाचल में ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर रही है। बहू को परिवार में शामिल करना एक वैध विस्तार है, परंतु आलोचक यह भी पूछ सकते हैं कि क्या यह प्रावधान राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ चुनिंदा रूप से इस्तेमाल होने का जोखिम नहीं रखता। असली परीक्षा यह है कि राज्य चुनाव आयोग के साथ परामर्श की यह प्रक्रिया चुनाव की घोषणा के बाद की व्यस्तता में कितनी तेज़ और निष्पक्ष रह पाती है।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिमाचल प्रदेश पंचायती राज संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
यह 1 सितंबर 2026 को हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित वह कानून है जो सरकारी या शामिलात भूमि पर अवैध कब्जा करने वाले परिवार की बहुओं को भी पंचायत चुनाव लड़ने से रोकता है। यह बिल 6 मई 2026 के अध्यादेश की जगह लेता है।
बहू को इस कानून में क्यों शामिल किया गया?
पुराने पंचायती राज अधिनियम 1994 में 'परिवार' की परिभाषा में बहू शामिल नहीं थी, जिसका फायदा उठाकर अयोग्य कब्जाधारी अपनी बहुओं को चुनाव में उतारते थे और परोक्ष रूप से शासन चलाते थे। सरकार ने इस खामी को बंद करने के लिए बहू को परिवार की परिभाषा में जोड़ा।
जमीन कब्जाधारी के परिवार पर अयोग्यता कितने समय के लिए लागू होगी?
कब्जा छोड़ने या बेदखली की तारीख से 6 वर्ष तक संबंधित उम्मीदवार और उनके परिवार के सदस्य — जिसमें बहू भी शामिल है — पंचायत, BDC या जिला परिषद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य रहेंगे।
इस कानून के तहत अयोग्यता के अन्य आधार क्या हैं?
NDPS अधिनियम के तहत लंबित ड्रग मामले, पंचायत को देय बकाया राशि न चुकाना, सरकारी उपक्रम में किसी भी प्रकार की नौकरी, नामांकन में गलत जानकारी और नैतिक अधमता वाले अपराधों में दोषसिद्धि — ये सभी अयोग्यता के आधार हैं।
अयोग्यता को लेकर शिकायत पर फैसला कौन करेगा?
यदि किसी उम्मीदवार की अयोग्यता पर प्रश्न उठता है, तो संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। इसके बाद राज्य सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी राज्य चुनाव आयोग से परामर्श करके अंतिम निर्णय लेगा।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 सप्ताह पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 2 महीने पहले
  6. 3 महीने पहले
  7. 4 महीने पहले
  8. 5 महीने पहले