मोदी की तीन-देश यात्रा: यूरेनियम से ब्रह्मोस तक, भारत के लिए खुले दशकों से बंद दरवाजे
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता, मेलबर्न और ऑकलैंड यात्रा ने भारत की विदेश नीति में एक ऐतिहासिक मोड़ को रेखांकित किया है — वह मोड़ जहाँ दशकों तक बंद रहे दरवाजे एक-एक करके खुल रहे हैं। जुलाई 2026 में संपन्न इस यात्रा में यूरेनियम आपूर्ति की मंजूरी, ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात समझौते, रणनीतिक बंदरगाह साझेदारी और मुक्त व्यापार समझौतों ने मिलकर भारत की वैश्विक स्थिति को नई ऊँचाई दी है।
यूरेनियम: जो इनकार था, वह अब स्वीकृति बना
जनवरी 2008 में भारत के विशेष दूत पर्थ गए थे — ऊर्जा-संकट से जूझ रहे एक अरब से अधिक आबादी वाले देश के लिए यूरेनियम की माँग लेकर। ऑस्ट्रेलिया का जवाब स्पष्ट था: 'पहले परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करें।' भारत ने सम्मानपूर्वक अस्वीकार किया और खाली हाथ लौटा।
गौरतलब है कि 2006 में जब अमेरिका भारत के साथ नागरिक परमाणु सहयोग आगे बढ़ा रहा था, तब ऑस्ट्रेलिया ने इसका समर्थन नहीं किया। 2008 में वह अपनी पहले की सैद्धांतिक सहमति से भी पीछे हट गया। पूरे यूपीए शासनकाल में दिल्ली आग्रह करती रही, कैनबरा इनकार करता रहा — और विरोधाभासी रूप से, लोकतांत्रिक भारत को मना करते हुए चीन को यूरेनियम बिक्री पर चर्चा जारी रही।
सत्ता संभालने के लगभग 100 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री मोदी ने सितंबर 2014 में लंबे समय से लंबित नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस सप्ताह मेलबर्न में अंतिम प्रशासनिक बाधा भी दूर हो गई और आपूर्ति आरंभ हो गई — जो भारत के 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में एक ठोस कदम है। इस बार कोई उपदेश नहीं, कोई शर्त नहीं — केवल एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में भारत को दिया गया सम्मान।
जकार्ता: खरीदार से निर्यातक बना भारत
सात दशकों तक भारत की रक्षा कहानी एक खरीदार की कहानी रही। जकार्ता में यह बदल गया। भारत और इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की आपूर्ति के लिए समझौते किए। इसके साथ इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के बाद तीसरा देश बन गया जिसने भारतीय रक्षा तकनीक पर भरोसा जताया। इसके अतिरिक्त अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली से संबंधित समझौते भी संपन्न हुए।
ब्रह्मोस की विश्वसनीयता उसके वास्तविक युद्ध अनुभव से जुड़ी है। दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने बदलते सुरक्षा माहौल में भारतीय रक्षा क्षमता को चुना — यह केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि रणनीतिक भरोसे का संकेत है।
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक और सैन्य सम्मान 'बिंतांग आदिपूर्णा' से सम्मानित किया।
भूगोल को रणनीति में बदला: सबांग बंदरगाह समझौता
जकार्ता में हुआ बंदरगाह समझौता मिसाइलों से भी अधिक दूरगामी महत्व रखता है। भारत और इंडोनेशिया मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार पर स्थित सबांग बंदरगाह के विकास में सहयोग करेंगे — जो भारत के प्रस्तावित ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट हब से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। दो बंदरगाह, दो झंडे, लेकिन एक ऐसा समुद्री मार्ग जो दुनिया के लगभग एक-तिहाई व्यापार को प्रभावित करता है।
दोनों देश महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा रहे हैं। इंडोनेशिया के पास दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत निकेल भंडार हैं — जो इलेक्ट्रिक वाहन और ऊर्जा भंडारण उद्योग के लिए अनिवार्य कच्चा माल है।
प्रधानमंत्री मोदी योग्यकार्ता भी गए, जहाँ हजार वर्ष पुराने प्रम्बानन मंदिरों के बीच भारत ने इस महान हिंदू धरोहर के संरक्षण में सहयोग का संकल्प लिया। वर्तमान के लिए मिसाइलें, भविष्य के लिए बंदरगाह और अनंत काल के लिए मंदिर — एक ही यात्रा में कूटनीति के तीन स्तरों का संगम।
ऑस्ट्रेलिया: व्यापार में 55% वृद्धि, अरबों का निवेश
2022 के व्यापार समझौते के बाद भारत-ऑस्ट्रेलिया द्विपक्षीय व्यापार में 55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) को शीघ्र पूरा करने का निर्देश दिया है।
ऑस्ट्रेलियाई निवेश संस्था 'ऑस्ट्रेलियन सुपर' ने भारत में 50 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के निवेश की घोषणा की। प्रधानमंत्री मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के चार ट्रिलियन डॉलर के पेंशन फंड को भारत के बुनियादी ढाँचे में निवेश के लिए आमंत्रित किया। मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में भारतीय समुदाय की बड़ी सभा में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री का मोदी के साथ खड़ा होना केवल औपचारिक सम्मान नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की स्वीकृति है।
न्यूजीलैंड: चार दशक बाद ऐतिहासिक यात्रा
चार दशकों में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड गया। ऑकलैंड में पारंपरिक 'माओरी पोविरी' स्वागत समारोह के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने नई रणनीतिक साझेदारी और 2030 रोडमैप की घोषणा की, जिसमें समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, साइबर रक्षा, 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर के व्यापार लक्ष्य और भारतीय नौसेना तथा न्यूजीलैंड रक्षा बल के बीच लॉजिस्टिक्स समझौता शामिल है।
अब भारतीय नौसेना का जहाज ऑकलैंड में सहायता और आपूर्ति प्राप्त कर सकता है — यह दर्शाता है कि भारत की समुद्री साझेदारी का विस्तार हिंद महासागर से दक्षिण प्रशांत तक हो रहा है। वर्षों से लंबित व्यापार वार्ताएँ भी वर्तमान सरकार के कार्यकाल में तेजी से आगे बढ़ी हैं।
आगे की दिशा
यह तीन-देश यात्रा एक व्यापक रणनीतिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। जिस देश को दो दशकों तक यूरेनियम से दूर रखने की कोशिश की गई, वह अब आपूर्ति प्राप्त कर रहा है। जिन रक्षा प्रणालियों को भारत कभी आयात करता था, अब उनका निर्यात हो रहा है। वर्षों से अटके व्यापार समझौते तेजी से पूरे हो रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार यह संयोग नहीं, बल्कि वर्षों से निर्मित विश्वसनीयता का परिणाम है — और भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए आने वाले वर्ष और भी निर्णायक होंगे।