9 जुलाई 2026
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भारत-ऑस्ट्रेलिया ऊर्जा सुरक्षा समझौता: यूरेनियम आयात का रास्ता खुला, मोदी-अल्बानीज ने किए हस्ताक्षर

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भारत-ऑस्ट्रेलिया ऊर्जा सुरक्षा समझौता: यूरेनियम आयात का रास्ता खुला, मोदी-अल्बानीज ने किए हस्ताक्षर

सारांश

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मेलबर्न में हुआ यह ऊर्जा सुरक्षा समझौता महज एक द्विपक्षीय करार नहीं — यह भारत की परमाणु ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ा द्वार है। IAEA निगरानी में ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम का रास्ता खुलना भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

मुख्य बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बानीज ने 9 जुलाई 2026 को मेलबर्न में ऊर्जा सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए।
ऑस्ट्रेलिया-भारत परमाणु सहयोग समझौता (2015) के तहत यूरेनियम निर्यात की प्रशासनिक व्यवस्थाएँ अंतिम रूप से तय हुईं।
यूरेनियम आपूर्ति केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए और IAEA के सुरक्षा नियमों के अंतर्गत होगी।
दोनों देशों ने LNG , नवीकरणीय ऊर्जा और कम-कार्बन ईंधन में द्विपक्षीय व्यापार व निवेश बढ़ाने का संकल्प लिया।
पश्चिम एशिया के तनाव से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर असर को लेकर दोनों देशों ने चिंता जताई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने 9 जुलाई 2026 को मेलबर्न में आयोजित एनुअल लीडर्स समिट में एक ऐतिहासिक ऊर्जा सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम के भारत में आयात का मार्ग प्रशस्त हो गया है। यह समझौता भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को नई दिशा देने के साथ-साथ दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग को एक ठोस आधार प्रदान करता है।

समझौते का मूल स्वरूप

संयुक्त बयान के अनुसार, दोनों देशों ने 'ऑस्ट्रेलिया-भारत परमाणु सहयोग समझौता (2015)' के तहत यूरेनियम निर्यात के लिए आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दे दिया है। यह यूरेनियम आपूर्ति विशेष रूप से शांतिपूर्ण कार्यों तक सीमित रहेगी और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण (IAEA) के सुरक्षा नियमों के दायरे में संचालित होगी।

पीएम मोदी ने इस अवसर पर कहा, "आज हमने न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में एक अहम समझौता किया है। इससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता खुलेगा और हमारे स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को नई मजबूती मिलेगी।"

ऊर्जा व्यापार में द्विपक्षीय भूमिका

दोनों देशों ने एक-दूसरे की ऊर्जा आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया। ऑस्ट्रेलिया, भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति में एक प्रमुख साझेदार है, जबकि भारत, ऑस्ट्रेलिया को लिक्विड फ्यूल और डाउनस्ट्रीम पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाता है। दोनों पक्षों ने ऊर्जा आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखने और द्विपक्षीय ऊर्जा व्यापार व निवेश को बढ़ाने का संकल्प लिया।

यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला और कमोडिटी की कीमतों पर दबाव डाल रहे हैं। दोनों देशों ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए खुले बाजार और नियम-आधारित व्यापार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु प्रतिबद्धता

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने नवीकरणीय ऊर्जा और कम-कार्बन ईंधन को बढ़ावा देने, ऊर्जा परिवर्तन की गति तेज करने और पूरी ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में अधिक निवेश प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया। गौरतलब है कि भारत ने 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य रखा है और परमाणु ऊर्जा को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है।

आलोचकों का कहना है कि यूरेनियम आयात से भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता विस्तार को बल मिलेगा, जो घरेलू यूरेनियम भंडार की सीमित उपलब्धता के कारण अब तक बाधित रही है।

व्यापक रणनीतिक साझेदारी

पीएम मोदी ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया, जीवंत लोकतंत्र और महत्वपूर्ण इंडो-पैसिफिक साझेदार होने के नाते, एक जैसी सोच और गहरे आपसी भरोसे को साझा करते हैं। यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और सुदृढ़ करने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

इस समझौते से आने वाले वर्षों में भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में ठोस प्रगति की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि भारत के परमाणु संयंत्र वर्षों से ईंधन की कमी से जूझ रहे हैं। इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच यह साझेदारी केवल ऊर्जा नहीं, रणनीतिक संतुलन का भी हिस्सा है — और यही इसे महज एक व्यापार समझौते से अलग बनाता है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत-ऑस्ट्रेलिया ऊर्जा सुरक्षा समझौता क्या है?
यह 9 जुलाई 2026 को मेलबर्न में हस्ताक्षरित एक द्विपक्षीय करार है, जो 'ऑस्ट्रेलिया-भारत परमाणु सहयोग समझौता (2015)' के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम निर्यात की प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देता है। इससे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम के भारत में आयात का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
ऑस्ट्रेलिया से आने वाला यूरेनियम किन कामों के लिए इस्तेमाल होगा?
संयुक्त बयान के अनुसार, यूरेनियम का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा और यह अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण (IAEA) के सुरक्षा नियमों के दायरे में रहेगा। इसका सैन्य या अन्य किसी गैर-नागरिक उद्देश्य के लिए उपयोग वर्जित है।
इस समझौते से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा?
भारत के परमाणु संयंत्र घरेलू यूरेनियम की सीमित उपलब्धता के कारण पूर्ण क्षमता पर नहीं चल पाते। ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति से परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी, जो भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऊर्जा व्यापार में एक-दूसरे की क्या भूमिका है?
ऑस्ट्रेलिया, भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति में एक प्रमुख साझेदार है, जबकि भारत, ऑस्ट्रेलिया को लिक्विड फ्यूल और डाउनस्ट्रीम पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराता है। दोनों देशों ने इस व्यापार को और विस्तार देने का संकल्प लिया है।
यह समझौता 2015 के परमाणु सहयोग समझौते से किस तरह अलग है?
2015 का समझौता एक रूपरेखा मात्र था जिसमें यूरेनियम व्यापार की सैद्धांतिक स्वीकृति थी, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्थाएँ अधूरी थीं। 2026 के इस नए समझौते में उन्हीं व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया गया है, जिससे वास्तविक व्यापार शुरू होने का रास्ता खुला है।
राष्ट्र प्रेस
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