हिंदू, हिंदुत्व और सनातन विमर्श ने बदला चुनावी समीकरण, बंगाल-असम में भाजपा की प्रचंड जीत

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हिंदू, हिंदुत्व और सनातन विमर्श ने बदला चुनावी समीकरण, बंगाल-असम में भाजपा की प्रचंड जीत

सारांश

के आरोप लगाए और इसे चुनावी मुद्दा बनाया। सत्ता परिवर्तन हुआ, हालाँकि राजनीतिक विशेषज्ञ इसे केवल इस एक मुद्दे से नहीं जोड़ते — सत्ता विरोधी लहर, स्थानीय मुद्दे, संगठनात्मक मजबूती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा भी अहम कारक रहे। छत्तीसगढ़ में भी 'सनातन' विवाद चुनाव प्रचार का हिस्सा बना और BJP ने जीत दर्ज की।

राम मंदिर और धार्मिक आस्था का चुनावी असर

गौरतलब है कि 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और उससे पहले व बाद में कांग्रेस के कई नेताओं ने इसे BJP का प्रायोजित कार्यक्रम बताया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसने एक बड़े वर्ग की धार्मिक आस्था पर चोट पहुँचाने का काम किया। बिहार में भी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता शिवानंद तिवारी समेत अन्य नेताओं के बयानों को लेकर विवाद उठे, जिन्हें BJP और उसके सहयोगियों ने राजनीतिक मुद्दा बनाया। राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार बनने के पीछे गठबंधन और राजनीतिक समीकरण के साथ ही तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 'सुशासन बाबू' की छवि भी मददगार बनी।

आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्षी दल इस धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श के मुकाबले अपनी रणनीति कैसे तय करते हैं और क्या वे मतदाताओं की धार्मिक संवेदनाओं के प्रति अधिक सतर्क रुख अपनाते हैं।

मुख्य बातें

पश्चिम बंगाल और असम में BJP को प्रचंड बहुमत मिला; तमिलनाडु में DMK की हार हुई।
DMK नेता उदयनिधि स्टालिन का 2023 का 'सनातन धर्म' विरोधी बयान राष्ट्रीय चुनावी विमर्श का हिस्सा बना।
TMC नेताओं के मक्का-मदीना से जुड़े बयानों ने पश्चिम बंगाल में पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में डाला।
22 जनवरी 2024 को श्रीराम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा को कांग्रेस द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम बताने से हिंदू मतदाताओं में नाराज़गी बढ़ी।
विशेषज्ञों के अनुसार, धार्मिक नैरेटिव अकेला नहीं बल्कि संगठन, नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों के साथ मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है।

पश्चिम बंगाल और असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को प्रचंड बहुमत मिला है, जबकि तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) को करारी हार का सामना करना पड़ा है। 5 मई 2026 को सामने आए इन चुनावी नतीजों के विश्लेषण में राजनीतिक विशेषज्ञों ने माना है कि 'हिंदू', 'हिंदुत्व' और 'सनातन' को लेकर विपक्षी नेताओं द्वारा दिए गए विवादित बयानों ने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को प्रभावित किया और चुनावी परिणामों पर इसकी छाप स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

धार्मिक विमर्श का चुनावी नैरेटिव पर असर

देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव से पूर्व 'हिंदू' और 'सनातन' को लेकर दिए गए विवादित बयानों ने सियासी विमर्श को गहराई से प्रभावित किया। BJP ने इन बयानों को अपने चुनावी नैरेटिव का केंद्रीय हिस्सा बनाया और इन्हें मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि इन टिप्पणियों ने मतदाताओं के रुझान को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।

पश्चिम बंगाल: ध्रुवीकरण और TMC का बैकफुट

पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबले के दौरान हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का मुद्दा प्रमुखता से उभरा, जिसे BJP ने अपने चुनावी अभियान का अहम हिस्सा बनाया। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं के मक्का-मदीना से जुड़े बयानों ने पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसने मतदाताओं के एक वर्ग को प्रभावित किया और BJP को चुनावी बढ़त हासिल करने में सहायता मिली।

तमिलनाडु: उदयनिधि का 'सनातन' बयान और राष्ट्रीय विवाद

तमिलनाडु में DMK नेता उदयनिधि स्टालिन द्वारा 2023 में 'सनातन धर्म' पर की गई टिप्पणी ने देशभर में राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। BJP ने इस बयान को लगातार

संपादकीय दृष्टिकोण

'हिंदुत्व' और 'सनातन' विमर्श को BJP की जीत का एकमात्र कारण मानना अतिसरलीकरण होगा — असली सवाल यह है कि विपक्षी दलों ने बार-बार ऐसे बयान क्यों दिए जो बहुसंख्यक मतदाताओं को अलग-थलग करते हैं। उदयनिधि स्टालिन का 'सनातन' बयान हो या TMC नेताओं की मक्का-मदीना टिप्पणी — ये रणनीतिक भूलें थीं जिनकी कीमत चुनावी नतीजों में चुकानी पड़ी। गौरतलब है कि भारत में धार्मिक पहचान और विकास एजेंडा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि मतदाता दोनों को एक साथ तौलते हैं। जब तक विपक्ष इस वास्तविकता को नहीं समझेगा और अपनी भाषा में संयम नहीं लाएगा, BJP का यह नैरेटिव उसे चुनावी मैदान में बढ़त दिलाता रहेगा।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल और असम चुनाव में BJP की जीत के मुख्य कारण क्या रहे?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, BJP की जीत में धार्मिक नैरेटिव के साथ-साथ संगठनात्मक मजबूती, नेतृत्व और स्थानीय मुद्दे भी अहम रहे। पश्चिम बंगाल में TMC नेताओं के विवादित बयानों और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के मुद्दे ने BJP को चुनावी बढ़त दिलाई।
उदयनिधि स्टालिन का 'सनातन धर्म' पर विवादित बयान क्या था?
DMK नेता उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में 'सनातन धर्म' के खिलाफ एक टिप्पणी की थी, जिसे BJP ने 'हिंदू आस्था का अपमान' बताते हुए राष्ट्रीय चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाया। यह बयान तमिलनाडु के साथ-साथ अन्य राज्यों के चुनावों में भी BJP के प्रचार का केंद्रीय मुद्दा बना।
क्या 'हिंदुत्व' का मुद्दा अकेले चुनाव जिताने में सक्षम है?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक पहचान से जुड़ा नैरेटिव अकेला निर्णायक नहीं होता। सत्ता विरोधी लहर, स्थानीय मुद्दे, संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व का चेहरा जैसे कारक मिलकर चुनावी नतीजे तय करते हैं।
श्रीराम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का चुनावों पर क्या असर पड़ा?
22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा को कांग्रेस नेताओं द्वारा BJP का प्रायोजित कार्यक्रम बताए जाने से हिंदू मतदाताओं के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। विश्लेषकों के अनुसार, इसका असर बाद के कई राज्यों के चुनावी नतीजों में देखने को मिला।
असम में BJP की जीत में CM हिमंत बिस्वा सरमा की क्या भूमिका रही?
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 'हिंदू पहचान' के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, जिससे उनकी छवि एक मुखर हिंदू नेता के रूप में मजबूत हुई। BJP पहले से राज्य में सत्तारूढ़ रही है और हालिया चुनाव परिणामों में भी उसने सत्ता बरकरार रखी।
राष्ट्र प्रेस
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