झारखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: हिरासत में मौत और दुष्कर्म मामलों में न्यायिक जांच अनिवार्य

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झारखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: हिरासत में मौत और दुष्कर्म मामलों में न्यायिक जांच अनिवार्य

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस और जेल हिरासत में मौत व दुष्कर्म के मामलों में न्यायिक जांच अनिवार्य कर दी है। सरकार के अपने शपथ पत्र में 2018–2025 के बीच 500 कस्टोडियल मौतें स्वीकार की गई हैं, जिनमें से करीब 250 में अब तक जांच नहीं हुई — यह आदेश उस जवाबदेही की खाई को पाटने की कोशिश है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 14 मई 2026 को आदेश दिया कि पुलिस या जेल हिरासत में मौत या दुष्कर्म के हर मामले में न्यायिक जांच अनिवार्य होगी।
सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) के तहत यह आदेश पारित किया।
राज्य सरकार के शपथ पत्र में स्वीकार: 2018 से 2025 के बीच झारखंड में 500 कस्टोडियल मौतें , जिनमें से करीब 250 मामलों में न्यायिक जांच नहीं हुई।
झालसा (JHALSA) को NHRC की गाइडलाइंस के अनुरूप एसओपी तैयार करने का निर्देश।
संबंधित जिलों के जिला जजों को लंबित मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट सीधे हाईकोर्ट को सौंपने का आदेश।

झारखंड हाईकोर्ट ने 14 मई 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया कि अब राज्य में पुलिस या जेल हिरासत में होने वाली किसी भी मौत अथवा दुष्कर्म की घटना में न्यायिक जांच (ज्यूडिशियल इंक्वायरी) अनिवार्य रूप से कराई जाएगी। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला एक जनहित याचिका पर सुनाया, जो राज्य में कस्टोडियल मौतों और दुष्कर्म की घटनाओं से जुड़ी थी।

मुख्य आदेश और कानूनी आधार

खंडपीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) और पूर्ववर्ती कानून सीआरपीसी की धारा 176(1-ए) के तहत न्यायिक जांच को अनिवार्य घोषित किया है। इससे पहले झारखंड में ऐसे मामलों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारी (एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) से कराई जाती थी, जिसे न्यायिक जांच का विकल्प नहीं माना जाता था। अदालत के इस आदेश के बाद यह पुरानी व्यवस्था पूरी तरह बदल जाएगी।

250 लंबित मामलों पर कड़ा संज्ञान

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अपने रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि करीब 250 कस्टोडियल मौत के मामलों में अब तक न्यायिक जांच नहीं हुई है। इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए खंडपीठ ने संबंधित जिलों के जिला जजों को निर्देश दिया कि वे इन मामलों में जांच न होने के कारणों को स्पष्ट करते हुए अपनी विस्तृत रिपोर्ट सीधे हाईकोर्ट को सौंपें।

सरकार का चौंकाने वाला खुलासा

इस मामले की पूर्व सुनवाई में राज्य के गृह सचिव द्वारा दाखिल शपथ पत्र में स्वीकार किया गया था कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच झारखंड में पुलिस और जेल हिरासत में करीब 500 मौतें हुई हैं। इनमें से लगभग आधे मामलों में न्यायिक जांच नहीं कराई गई — यह तथ्य राज्य की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

झालसा को एसओपी बनाने का निर्देश

खंडपीठ ने झारखंड लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (झालसा) को निर्देश दिया है कि वह नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC), नई दिल्ली की गाइडलाइंस के अनुरूप एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार करे, ताकि हिरासत में मौत या दुष्कर्म के मामलों की निष्पक्ष और व्यवस्थित जांच सुनिश्चित की जा सके।

याचिकाकर्ता और अधिवक्ता की भूमिका

याचिकाकर्ता मोहम्मद मुमताज अंसारी की ओर से अधिवक्ता शादाब अंसारी ने लिखित बहस के साथ सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों और एनएचआरसी के दिशा-निर्देशों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। इन्हीं आधारों पर खंडपीठ ने यह व्यापक आदेश पारित किया। यह फैसला झारखंड में हिरासत में मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह महज प्रशासनिक चूक नहीं — यह संरचनात्मक जवाबदेही का अभाव है। हाईकोर्ट का यह आदेश कानूनन सही दिशा में है, लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन में है: क्या जिला जज वास्तव में स्वतंत्र रूप से जांच कर पाएंगे जहाँ पुलिस और प्रशासन एक ही तंत्र के हिस्से हैं? एसओपी बनाना एक कदम है, लेकिन बिना समयबद्ध अनुपालन और दंड के प्रावधान के, यह आदेश भी उन्हीं फाइलों में दब सकता है जिन्हें यह खोलने की कोशिश कर रहा है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने हिरासत में मौत पर क्या आदेश दिया है?
झारखंड हाईकोर्ट ने 14 मई 2026 को आदेश दिया कि राज्य में पुलिस या जेल हिरासत में होने वाली किसी भी मौत या दुष्कर्म की घटना में न्यायिक जांच अनिवार्य होगी। यह आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) और पूर्ववर्ती सीआरपीसी की धारा 176(1-ए) के तहत पारित किया गया है।
झारखंड में 2018 से 2025 के बीच कितनी कस्टोडियल मौतें हुईं?
राज्य के गृह सचिव द्वारा अदालत में दाखिल शपथ पत्र के अनुसार वर्ष 2018 से 2025 के बीच झारखंड में पुलिस और जेल हिरासत में करीब 500 मौतें हुई हैं। इनमें से लगभग 250 मामलों में न्यायिक जांच नहीं कराई गई थी।
पहले हिरासत में मौत के मामलों की जांच कैसे होती थी?
पहले झारखंड सरकार ऐसे मामलों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारी (एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) से कराती थी, न कि न्यायिक मजिस्ट्रेट से। हाईकोर्ट के नए आदेश के बाद यह व्यवस्था पूरी तरह बदल जाएगी और अब न्यायिक जांच अनिवार्य हो गई है।
झालसा को क्या निर्देश दिया गया है?
झारखंड लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (झालसा) को निर्देश दिया गया है कि वह नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC), नई दिल्ली की गाइडलाइंस के अनुरूप एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार करे। इसका उद्देश्य हिरासत में मौत या दुष्कर्म के मामलों की निष्पक्ष और व्यवस्थित जांच सुनिश्चित करना है।
इस मामले में याचिका किसने दायर की थी?
यह जनहित याचिका मोहम्मद मुमताज अंसारी की ओर से दायर की गई थी। उनके अधिवक्ता शादाब अंसारी ने लिखित बहस के साथ सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों और एनएचआरसी के दिशा-निर्देशों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने यह आदेश पारित किया।
राष्ट्र प्रेस
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