झारखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: हिरासत में मौत और दुष्कर्म मामलों में न्यायिक जांच अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 14 मई 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया कि अब राज्य में पुलिस या जेल हिरासत में होने वाली किसी भी मौत अथवा दुष्कर्म की घटना में न्यायिक जांच (ज्यूडिशियल इंक्वायरी) अनिवार्य रूप से कराई जाएगी। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला एक जनहित याचिका पर सुनाया, जो राज्य में कस्टोडियल मौतों और दुष्कर्म की घटनाओं से जुड़ी थी।
मुख्य आदेश और कानूनी आधार
खंडपीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) और पूर्ववर्ती कानून सीआरपीसी की धारा 176(1-ए) के तहत न्यायिक जांच को अनिवार्य घोषित किया है। इससे पहले झारखंड में ऐसे मामलों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारी (एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) से कराई जाती थी, जिसे न्यायिक जांच का विकल्प नहीं माना जाता था। अदालत के इस आदेश के बाद यह पुरानी व्यवस्था पूरी तरह बदल जाएगी।
250 लंबित मामलों पर कड़ा संज्ञान
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अपने रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि करीब 250 कस्टोडियल मौत के मामलों में अब तक न्यायिक जांच नहीं हुई है। इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए खंडपीठ ने संबंधित जिलों के जिला जजों को निर्देश दिया कि वे इन मामलों में जांच न होने के कारणों को स्पष्ट करते हुए अपनी विस्तृत रिपोर्ट सीधे हाईकोर्ट को सौंपें।
सरकार का चौंकाने वाला खुलासा
इस मामले की पूर्व सुनवाई में राज्य के गृह सचिव द्वारा दाखिल शपथ पत्र में स्वीकार किया गया था कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच झारखंड में पुलिस और जेल हिरासत में करीब 500 मौतें हुई हैं। इनमें से लगभग आधे मामलों में न्यायिक जांच नहीं कराई गई — यह तथ्य राज्य की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
झालसा को एसओपी बनाने का निर्देश
खंडपीठ ने झारखंड लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (झालसा) को निर्देश दिया है कि वह नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC), नई दिल्ली की गाइडलाइंस के अनुरूप एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार करे, ताकि हिरासत में मौत या दुष्कर्म के मामलों की निष्पक्ष और व्यवस्थित जांच सुनिश्चित की जा सके।
याचिकाकर्ता और अधिवक्ता की भूमिका
याचिकाकर्ता मोहम्मद मुमताज अंसारी की ओर से अधिवक्ता शादाब अंसारी ने लिखित बहस के साथ सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों और एनएचआरसी के दिशा-निर्देशों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। इन्हीं आधारों पर खंडपीठ ने यह व्यापक आदेश पारित किया। यह फैसला झारखंड में हिरासत में मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।