झारखंड में हिरासत में हुई 437 मौतों पर हाईकोर्ट की चिंता: क्या है सच्चाई?
सारांश
Key Takeaways
- 437 हिरासत मौतें झारखंड में 2018 से अब तक हुई हैं।
- जेल में 202 मामलों में न्यायिक जांच कराई गई है।
- हाईकोर्ट ने पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई है।
- पुलिस हिरासत में 39 मौतों में से 11 मामलों में कोई जांच नहीं हुई है।
- अगली सुनवाई 30 अप्रैल को होगी।
रांची, 26 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने पुनः गंभीर चिंता व्यक्त की है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें वर्ष 2018 से अब तक की हिरासत मौतों का विवरण दिया गया है।
गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की प्रधान सचिव वंदना दांडेल द्वारा दाखिल शपथपत्र के अनुसार, राज्य की जेलों में और पुलिस हिरासत में कुल 437 मौतें दर्ज की गई हैं। शपथपत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि जेल में हुई मौतों में से केवल 202 मामलों में न्यायिक जांच कराई जा सकी है।
इसी समय, पुलिस हिरासत में हुई 39 मौतों में से 11 मामलों में अभी तक कोई जांच नहीं की गई है। अदालत ने कहा कि पुलिस या न्यायिक हिरासत में मृत्यु, लापता होने या दुष्कर्म के हर मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक जांच आवश्यक है। इस प्रकार जिन मामलों में अब तक जांच नहीं की गई, वह चिंताजनक हैं।
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता से इस संदर्भ में सुझाव मांगा है और पूछा है कि वे आगे क्या राहत चाहते हैं तथा याचिका में उनकी मांग क्या है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैधानिक प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।
यह उल्लेखनीय है कि फरवरी में हुई सुनवाई के दौरान भी उच्च न्यायालय ने इसी मुद्दे पर राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी थी। उस समय दायर शपथपत्र में वर्ष 2018 से 2025 के बीच 437 हिरासत मौतों का उल्लेख किया गया था, लेकिन अधिकांश मामलों में यह स्पष्ट नहीं था कि क्या अनिवार्य न्यायिक जांच कराई गई थी या नहीं।
अदालत ने तब भी कहा था कि हिरासत में मौत के मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच आवश्यक है। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह शपथपत्र के माध्यम से यह स्पष्ट करे कि इन मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच कराई गई या नहीं और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन हुआ या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 30 अप्रैल को निर्धारित की गई है।