नालंदा विश्वविद्यालय में आईएएसएसआई का 25वां सम्मेलन संपन्न, राज्यपाल हसनैन बोले— आपदा प्रबंधन में सामाजिक विज्ञान अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर में भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान संघ (आईएएसएसआई) का 25वां वार्षिक सम्मेलन 28 अक्टूबर 2026 को चार दिवसीय विचार-विमर्श के बाद संपन्न हो गया। समापन सत्र में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण, सार्वजनिक विश्वास, आपदा-सहनीयता और मानव-केंद्रित शासन में सामाजिक विज्ञान की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। देशभर के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं तथा नीति-निर्माताओं ने सम्मेलन में विकास और सार्वजनिक नीति से जुड़े अनेक मुद्दों पर गहन चर्चा की।
राज्यपाल का संबोधन: अनुभव और दृष्टि
राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने अपने सैन्य सेवा और आपदा प्रबंधन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी संस्था की प्रभावशीलता केवल संसाधनों और परिचालन क्षमता पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चिंताओं, आकांक्षाओं और उनकी रोज़मर्रा की परिस्थितियों को गहराई से समझने पर भी निर्भर करती है। उन्होंने सामाजिक समझ, सार्वजनिक विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच अटूट संबंध को स्पष्ट किया।
उन्होंने कहा कि सामाजिक विज्ञान अनुसंधान का वास्तविक उद्देश्य लोगों को बेहतर ढंग से समझना और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। यह ऐसे समय में आया है जब नीतिगत निर्णयों में जन-भागीदारी और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण की माँग लगातार बढ़ रही है।
आपदा प्रबंधन और उत्तर बिहार की बाढ़
बिहार की विकास संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए राज्यपाल ने उत्तर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आपदा की तैयारी केवल इंजीनियरिंग समाधानों और पूर्वानुमान तंत्र तक सीमित नहीं रहनी चाहिए — इसमें स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक व्यवहार, आजीविका संरक्षण और विस्थापन के दीर्घकालिक प्रभावों को भी अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।
उन्होंने इसके लिए सामाजिक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय तथा प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी को ज़रूरी बताया। गौरतलब है कि उत्तर बिहार में हर वर्ष बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित होते हैं, फिर भी पुनर्वास और दीर्घकालिक समाधान की कमी बनी रहती है।
विशेषज्ञों के विचार
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर एस. महेंद्र देव ने कहा कि समावेशी और सतत विकास 2030 के बाद भी वैश्विक एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बना रहेगा और भारत अपने आँकड़ों, नीतिगत अनुभव और विकास पहलों के माध्यम से इसमें महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। उन्होंने आईएएसएसआई से संस्थागत विस्तार और शैक्षणिक सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति एवं आईएएसएसआई के अध्यक्ष प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि विकास को केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं किया जा सकता — इसमें संस्कृति, सामाजिक संबंध, मूल्य और मानव कल्याण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने जटिल सामाजिक चुनौतियों के समाधान के लिए अंतर्विषयक शोध सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
डिजिटल युग और शोध की भाषा
राज्यपाल हसनैन ने बिहार के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान क्षमता मजबूत करने और युवा शोधकर्ताओं को बेहतर मार्गदर्शन देने पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि शोध निष्कर्षों को हिंदी सहित अन्य प्रासंगिक भाषाओं में आम लोगों तक पहुँचाना आवश्यक है, ताकि ज्ञान का लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँच सके। डिजिटल पहुँच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग जैसी समकालीन चुनौतियों के समाधान में संवाद और प्रमाण-आधारित दृष्टिकोण को भी महत्वपूर्ण बताया गया।
सम्मेलन के मुख्य विषय और आगे की राह
चार दिनों के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, संस्कृति, सार्वजनिक नीति, सामाजिक परिवर्तन और डिजिटल प्रौद्योगिकी के सामाजिक एवं नैतिक प्रभावों पर विचार-विमर्श हुआ। प्रतिभागियों ने एकमत से साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और अंतर्विषयक अनुसंधान को समावेशी तथा सतत विकास के लिए अनिवार्य बताया। सम्मेलन की अनुशंसाएँ नीति-निर्माताओं और शोध संस्थानों तक पहुँचाई जाएंगी, जो आने वाले वर्षों में सामाजिक विज्ञान अनुसंधान की दिशा तय करने में सहायक होंगी।