नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय परिसंवाद: राज्यपाल हसनैन बोले — भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने 21 सितंबर 2026 को नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का उद्घाटन करते हुए कहा कि भारत को ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजक बनना होगा। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सहयोग से आयोजित इस परिसंवाद का केंद्रीय विषय 'विकसित भारत के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका' है। यह आयोजन ऐसे समय में हुआ है जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत उच्च शिक्षा को भारत-केंद्रित बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
परिसंवाद का संदर्भ और महत्त्व
राज्यपाल हसनैन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा के लिए नालंदा से अधिक उपयुक्त स्थान नहीं हो सकता। उन्होंने नालंदा, राजगीर, बोधगया, वैशाली और विक्रमशिला को ज्ञान, आध्यात्मिकता और बौद्धिक आदान-प्रदान की व्यापक सभ्यतागत परंपरा का अभिन्न हिस्सा बताया। उनके अनुसार, आधुनिक विकास और राष्ट्रीय शक्ति के मूल में ज्ञान की केंद्रीय भूमिका है।
परिसंवाद में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के कुलपति, निदेशक, शिक्षाविद, शोधकर्ता तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
राज्यपाल का 'नालंदा दृष्टिकोण'
राज्यपाल हसनैन ने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा का केवल पुनर्स्मरण पर्याप्त नहीं है — इसके माध्यम से समकालीन प्रश्न पूछने और आधुनिक विज्ञान के साथ गंभीर संवाद स्थापित करना आवश्यक है। उन्होंने गणित, खगोल, चिकित्सा, दर्शन, भाषाविज्ञान, धातुविज्ञान और शासन जैसे क्षेत्रों में इस परंपरा के ऐतिहासिक योगदान का विशेष उल्लेख किया।
'नालंदा दृष्टिकोण' की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यतागत शक्ति ज्ञान, संस्कृति और बौद्धिक आदान-प्रदान के ज़रिए वैश्विक साझेदारियाँ बनाने में भी निहित है। उन्होंने भारतीय भाषाओं को शोध, नवाचार और ज्ञान-सृजन का माध्यम बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
विशेषज्ञों के विचार
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि आज प्रश्न यह नहीं है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता है या नहीं — बल्कि यह है कि इसे आगे कैसे ले जाया जाए। उन्होंने इसे दक्षिण एशिया और व्यापक एशियाई सभ्यतागत विरासत से जुड़ी साझा ज्ञान-परंपरा के रूप में देखने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और बताया कि विभिन्न देशों के विद्यार्थियों के लिए विशेष पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं।
प्रख्यात शिक्षाविद् प्रोफेसर रमेश भारद्वाज ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था को भारत-केंद्रित बनाने की दिशा में हो रहे प्रयासों को रेखांकित किया। यूजीसी (UGC) के पूर्व उपाध्यक्ष प्रोफेसर भूषण पटवर्धन ने कहा कि भारतीय ज्ञान को केवल विरासत के रूप में नहीं, बल्कि समकालीन नवाचार के स्रोत के रूप में देखने की ज़रूरत है।
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य और सतत जीवन पद्धति जैसी वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता को विशेष रूप से उजागर किया।
परिसंवाद के सत्र और आगामी कार्ययोजना
दो दिवसीय परिसंवाद में 'भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा-बोध', 'उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेशन', 'विकसित भारत का सांस्कृतिक आधार' तथा 'आगामी कार्ययोजना' जैसे विषयों पर सत्र और परिचर्चाएँ आयोजित होंगी। गौरतलब है कि शास्त्रार्थ की नालंदा परंपरा का उल्लेख करते हुए कुलपति चतुर्वेदी ने कहा कि इसका उद्देश्य बहस में जीत-हार नहीं, बल्कि संवाद के ज़रिए सामूहिक रूप से ज्ञान का विस्तार करना है।
परिसंवाद का समापन 22 सितंबर 2026 को विमर्श के निष्कर्षों और आगामी कार्ययोजना की प्रस्तुति के साथ होगा, जो उच्च शिक्षण संस्थानों में भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यावहारिक समावेशन की रूपरेखा तय कर सकती है।