23 सितंबर 2026
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आईआईटी बॉम्बे छात्र साहिल वाकोडे की मौत: राज ठाकरे ने जाति-केंद्रित बहस को शिक्षा संकट से भटकाव बताया

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आईआईटी बॉम्बे छात्र साहिल वाकोडे की मौत: राज ठाकरे ने जाति-केंद्रित बहस को शिक्षा संकट से भटकाव बताया

सारांश

आईआईटी बॉम्बे में 20 वर्षीय साहिल वाकोडे की मौत के बाद उठी जाति बनाम शिक्षा की बहस पर राज ठाकरे का बड़ा बयान — उन्होंने कहा, असली सवाल यह है कि एक युवा को लगा उसके सारे रास्ते बंद हो गए, लेकिन जाति की बहस ने इस दर्दनाक सच को दबा दिया।

मुख्य बातें

आईआईटी बॉम्बे के 20 वर्षीय छात्र साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर 2026 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने 23 सितंबर को एक्स पर पोस्ट कर जाति-केंद्रित बहस को शिक्षा व्यवस्था के असली संकट से ध्यान भटकाने वाली बताया।
आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने शुरू में परीक्षा में मोबाइल व ChatGPT के इस्तेमाल का आरोप लगाया, बाद में जांच पूरी होने से पहले इसे सार्वजनिक करने पर माफी माँगी।
साहिल के परिवार ने जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप लगाया है; मामला दर्ज कर जांच जारी है।
ठाकरे ने कहा — प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं का बोझ, घटती कैंपस सैलरी और मानसिक दबाव असली मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने छात्र आंदोलनों को चेताया कि जाति-धर्म की बहस में न फंसें, बल्कि शिक्षा व्यवस्था सुधार पर केंद्रित रहें।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को आईआईटी बॉम्बे के 20 वर्षीय छात्र साहिल वाकोडे की मौत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए, हर दुखद घटना को जाति और धर्म के चश्मे से देखने की बढ़ती प्रवृत्ति पर तीखी आपत्ति जताई। ठाकरे ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लंबी पोस्ट के ज़रिए चेताया कि इस तरह का ध्रुवीकरण भारत की शिक्षा व्यवस्था की गहरी खामियों से जनता का ध्यान भटकाता है। गौरतलब है कि साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर 2026 को फांसी लगाकर अपनी जान दे दी थी।

घटना का पूरा पृष्ठभूमि

आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने शुरू में आरोप लगाया था कि साहिल ने परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन और ChatGPT का इस्तेमाल किया था। बाद में प्रशासन ने माफी माँगते हुए स्वीकार किया कि जांच पूरी होने से पहले इस आरोप को सार्वजनिक करना उचित नहीं था। वहीं, साहिल के परिवार ने जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप लगाया है और इस संदर्भ में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।

संबंधित प्राध्यापकों ने भी अपना पक्ष सार्वजनिक किया है। इस पूरे विवाद के बीच ठाकरे ने सवाल उठाया कि 20 वर्षीय साहिल को आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए वास्तव में किस चीज़ ने मजबूर किया — यह बुनियादी सवाल बहस में कहीं खो गया है।

राज ठाकरे की मुख्य बात

ठाकरे ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'अगर कोई छात्र परीक्षा के दौरान गलत काम करता है, तो प्रोफेसर का यह फर्ज़ है कि वे उसे रोकें और नियमों के अनुसार कार्रवाई करें। लेकिन आरोप साबित होने से पहले किसी दिवंगत छात्र को दोषी ठहराना सही नहीं है। इसी तरह, सिर्फ जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप लगने पर बिना जांच पूरी हुए प्रोफेसरों को दोषी मान लेना भी गलत है।' उन्होंने कहा कि 'जाति' के मुद्दे को सबसे आगे रखने की वजह से कोई भी यह नहीं पूछ रहा कि एक ही घटना के बाद उस युवक को ऐसा क्यों लगा कि उसकी ज़िंदगी के सारे रास्ते बंद हो गए।

शिक्षा व्यवस्था के संकट पर निशाना

ठाकरे ने कहा कि आईआईटी का प्रवेश हो या उससे पहले की कोई प्रतियोगी परीक्षा — मुकाबला बेहद कड़ा हो चुका है। लाखों छात्र कुछ सौ सीटों के लिए होड़ करते हैं, चुने जाने के बाद पढ़ाई का भारी बोझ और फिर कैंपस प्लेसमेंट की चिंता उन्हें घेरे रहती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अब आईआईटी और आईआईएम के कैंपस प्लेसमेंट से वैसी मोटी सैलरी की गारंटी नहीं मिलती जैसी पहले मिलती थी।

ठाकरे ने जोड़ा कि निराशा का यह भाव केवल आईआईटी तक सीमित नहीं, बल्कि कॉमर्स, आर्ट्स, मेडिकल और इंजीनियरिंग — हर क्षेत्र के छात्रों पर इसका असर है। उन्होंने सवाल उठाया: 'क्या हमें उस शिक्षा व्यवस्था को चुनौती देनी चाहिए जो पूरी तरह चरमरा चुकी है, या फिर आत्महत्या करने वाले छात्र की जाति और सवाल पूछने वाले की जाति पर ध्यान देना चाहिए?'

जातिवाद की बढ़ती जड़ों पर चिंता

ठाकरे ने कहा कि वे वर्षों से अपने भाषणों में चेताते आए हैं कि साल 2000 के बाद महाराष्ट्र में जातिवाद इस कदर बढ़ा है कि लोग कक्षा में पड़ोसी बच्चे की जाति जानने लगे हैं और वर्षों का साथी सहकर्मी भी एक-दूसरे को जाति के नज़रिए से देखने लगा है। उन्होंने पंडित नेहरू का हवाला देते हुए कहा कि जिन आईआईटी को 'आधुनिक भारत का मंदिर' कहा गया था, वहाँ तक यह जहर पहुँच जाना अत्यंत दुखद है।

'जेन-जी' आंदोलन और आगे की राह

ठाकरे ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि हाल ही में 'जेन-जी' आंदोलन से व्यवस्था सुधार की उम्मीद जागी थी, और उसे देशभर से इसलिए समर्थन मिला क्योंकि वह समाधान पर केंद्रित था। उन्होंने आगाह किया कि अगर जाति और धर्म के मुद्दे बीच में आ जाते हैं तो बातचीत को भटकाना आसान हो जाता है, और सरकार के पास ये 'असरदार हथियार हमेशा मौजूद रहते हैं।' उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे ऐसी भटकाने वाली बातों में न फंसें और व्यवस्था सुधार की माँग को आगे बढ़ाते रहें।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सधा हुआ राजनीतिक हस्तक्षेप है — ऐसे समय में जब आईआईटी परिसरों में छात्र मौतों की श्रृंखला पर राष्ट्रीय बहस चल रही है। उनका यह तर्क कि जाति-बहस असली प्रश्न — एक युवा का मानसिक टूटना — को दबा देती है, सही दिशा में है, परंतु यह भी उतना ही सच है कि जाति-आधारित उत्पीड़न के आरोपों को 'भटकाव' बताकर खारिज करना भी एक प्रकार की चूक हो सकती है। दोनों मुद्दे — संस्थागत भेदभाव और शिक्षा के व्यावसायीकरण का दबाव — एक साथ सच हो सकते हैं। मुख्यधारा की कवरेज या तो जाति बनाम प्रशासन के विवाद में उलझ जाती है या मानसिक स्वास्थ्य की भावनात्मक चर्चा तक सिमट जाती है; जो सवाल छूट जाता है वह यह है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में छात्र संकट-सहायता तंत्र आखिर इतना कमज़ोर क्यों है।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की मौत कब और कैसे हुई?
साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर 2026 को आईआईटी बॉम्बे परिसर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वे 20 वर्ष के थे और संस्थान में पढ़ाई कर रहे थे।
आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने साहिल पर क्या आरोप लगाए थे और बाद में क्या हुआ?
प्रशासन ने शुरू में आरोप लगाया था कि साहिल ने परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन और ChatGPT का इस्तेमाल किया। बाद में प्रशासन ने माफी माँगी और माना कि जांच पूरी होने से पहले इस आरोप को सार्वजनिक करना गलत था।
साहिल वाकोडे के परिवार ने क्या आरोप लगाए हैं?
साहिल के परिवार ने जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इन आरोपों के आधार पर मामला दर्ज किया गया है और जांच अभी जारी है।
राज ठाकरे ने इस मौत पर क्या कहा?
मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि जाति-बहस ने असली सवाल — एक युवा को इतना असहाय क्यों महसूस हुआ — को दबा दिया है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था के व्यावसायीकरण, प्रतिस्पर्धा के अत्यधिक दबाव और घटती कैंपस प्लेसमेंट को मूल कारण बताया।
राज ठाकरे ने छात्र आंदोलनों को क्या सलाह दी?
ठाकरे ने छात्रों से आग्रह किया कि वे जाति और धर्म की बहस में न फंसें, क्योंकि ये मुद्दे बातचीत को भटकाने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन को व्यवस्था की कमियों को दूर करने के समाधान खोजने पर केंद्रित रहना चाहिए, जिससे सरकार ठोस कदम उठाने के लिए बाध्य होगी।
राष्ट्र प्रेस
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