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IIT मद्रास की खोज: एकल अणु को घुमाकर विद्युत धारा 100 गुना बढ़ाई, 'नेचर' में प्रकाशित शोध

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IIT मद्रास की खोज: एकल अणु को घुमाकर विद्युत धारा 100 गुना बढ़ाई, 'नेचर' में प्रकाशित शोध

सारांश

IIT मद्रास के डॉ. अनिल कुमार सिंह की अगुवाई में पाँच देशों के वैज्ञानिकों ने साबित किया कि हेलिसीन अणु को बिजली से घुमाकर विद्युत धारा 100 गुना तक बढ़ाई जा सकती है। 'नेचर' में प्रकाशित यह शोध आणविक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक स्विच बनाने की दिशा में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है।

मुख्य बातें

अनिल कुमार सिंह की अगुवाई में भारत, इज़रायल, जर्मनी, डेनमार्क और चीन के वैज्ञानिकों ने यह अंतरराष्ट्रीय शोध किया।
घुमावदार संरचना वाले हेलिसीन अणु को सोने के दो सूक्ष्म इलेक्ट्रोड के बीच रखकर प्रयोग किया गया।
विद्युत विभव आरोपित करने पर अणु के आर-पार बहने वाली विद्युत धारा लगभग 100 गुना तक बढ़ गई।
122 मामलों में वैज्ञानिक अणु के घूमने की दिशा को भी नियंत्रित करने में सफल रहे।
यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित हुआ है।
यह अभी प्रारंभिक शोध है; व्यावसायिक तकनीक बनने के लिए और अध्ययन आवश्यक है।

आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार सिंह और उनकी अंतरराष्ट्रीय शोध-टीम ने एक एकल अणु को विद्युत-शक्ति से घुमाकर उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा को लगभग 100 गुना तक बढ़ाने में सफलता हासिल की है। यह महत्वपूर्ण खोज प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित हुई है। इस शोध में भारत, इज़रायल, जर्मनी, डेनमार्क और चीन के वैज्ञानिकों ने मिलकर भाग लिया।

शोध का मूल विचार

इस प्रयोग की प्रेरणा आर्किमिडीज़ के पेंच से ली गई है — वह प्राचीन युक्ति जिससे पानी को नीचे से ऊपर पहुँचाया जाता है। वैज्ञानिकों ने सोचा कि क्या बिजली और घूर्णन-गति के बीच भी ऐसा कोई संबंध स्थापित किया जा सकता है, जिसमें घूमने की क्रिया विद्युत-प्रवाह को बढ़ा दे।

इसके लिए उन्होंने हेलिसीन नामक एक विशेष अणु का चयन किया, जिसकी संरचना घुमावदार पेंच जैसी होती है। यह अणु स्वाभाविक रूप से वामावर्त या दक्षिणावर्त दिशा में बल खाया हुआ होता है, जो इसे घूमने के लिए उपयुक्त बनाता है।

प्रयोग की प्रक्रिया

शोधकर्ताओं ने हेलिसीन अणु को सोने के दो अत्यंत सूक्ष्म इलेक्ट्रोड के बीच स्थापित किया और फिर उसके दोनों सिरों पर विद्युत विभव (voltage) आरोपित किया। प्रयोग में देखा गया कि जैसे-जैसे विद्युत विभव एक निश्चित स्तर से अधिक हुआ, अणु विभिन्न स्थितियों के बीच धीरे-धीरे बदलने की बजाय एक निरंतर चक्रीय गति में घूमने लगा।

घूमते समय वह ऐसी ज्यामितीय स्थितियों में पहुँचा जहाँ इलेक्ट्रॉनों का उसके आर-पार गुजरना सुगम हो गया। परिणामस्वरूप विद्युत धारा में लगभग 100 गुना की अचानक वृद्धि दर्ज की गई।

घूर्णन-दिशा पर नियंत्रण की उपलब्धि

आईआईटी मद्रास के अनुसार इस शोध की एक और उल्लेखनीय उपलब्धि यह रही कि वैज्ञानिक अणु के घूमने की दिशा को भी नियंत्रित कर पाए। जिन 122 मामलों में अणु की स्थिति-परिवर्तन की दिशा स्पष्ट रूप से पहचानी जा सकी, उन सभी में एक समान चक्र देखा गया।

जब वैज्ञानिकों ने विद्युत-ध्रुवता (polarity) बदली, तो अणु की गति का क्रम भी पलट गया — यानी बिजली के संकेत से ही अणु की घूमने की दिशा निर्धारित की जा सकती है। यह खोज आणविक स्विच की परिकल्पना को एक ठोस वैज्ञानिक आधार देती है।

भावी संभावनाएँ और सीमाएँ

शोधकर्ताओं के अनुसार इस जानकारी का भविष्य में उपयोग अत्यंत सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक स्विच और उपकरणों के निर्माण में हो सकता है, जिनमें बिजली के प्रवाह को अणुओं की गति से नियंत्रित किया जाएगा। यह तकनीक पारंपरिक सिलिकॉन-आधारित ट्रांज़िस्टर की तुलना में कहीं छोटे उपकरणों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

हालाँकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह अभी प्रारंभिक स्तर का शोध है और इसे व्यावसायिक तकनीक में बदलने के लिए और अधिक अध्ययन आवश्यक होगा। आगे वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि क्या गोलाकार ध्रुवित प्रकाश या विशेष प्रकार की विद्युत-धाराओं की सहायता से भी अणुओं की गति को नियंत्रित किया जा सकता है।

वैश्विक विज्ञान में भारत की भूमिका

यह शोध ऐसे समय में सामने आया है जब भारत परमाणु और आणविक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स की अगली पीढ़ी के विकास में अपनी वैज्ञानिक उपस्थिति दर्ज करा रहा है। गौरतलब है कि 'नेचर' जैसी पत्रिका में प्रकाशित होना किसी भी शोध की वैज्ञानिक विश्वसनीयता की उच्चतम मुहर मानी जाती है। यह खोज आणविक इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में नई दिशाएँ खोलने की क्षमता रखती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह है घूर्णन-दिशा पर नियंत्रण — यह केवल धारा बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे 'स्विच' की तरह चालू-बंद करने की दिशा में एक मज़बूत संकेत है। भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जब देश सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता की बात कर रहा है, तब मौलिक वैज्ञानिक शोध में यह उपस्थिति दीर्घकालिक तकनीकी नेतृत्व की नींव रखती है।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

IIT मद्रास के इस शोध में क्या खोजा गया है?
IIT मद्रास के डॉ. अनिल कुमार सिंह और उनकी अंतरराष्ट्रीय टीम ने पाया कि हेलिसीन नामक घुमावदार अणु को विद्युत-शक्ति से घुमाने पर उसके आर-पार बहने वाली विद्युत धारा लगभग 100 गुना तक बढ़ जाती है। यह खोज 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित हुई है और आणविक इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
हेलिसीन अणु क्या है और इसे क्यों चुना गया?
हेलिसीन एक ऐसा कार्बनिक अणु है जिसकी संरचना घुमावदार पेंच जैसी होती है। वैज्ञानिकों ने इसे इसलिए चुना क्योंकि इसकी पेंचदार बनावट इसे बिजली के प्रभाव में एक निश्चित दिशा में घूमने के लिए उपयुक्त बनाती है, ठीक वैसे जैसे आर्किमिडीज़ का पेंच पानी को ऊपर धकेलता है।
इस शोध का भविष्य में क्या उपयोग हो सकता है?
इस शोध का उपयोग भविष्य में अत्यंत सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक स्विच और उपकरण बनाने में हो सकता है, जिनमें बिजली के प्रवाह को अणुओं की गति से नियंत्रित किया जाएगा। हालाँकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह अभी प्रारंभिक शोध है और इसे रोज़मर्रा की तकनीक बनने में और अधिक अध्ययन की आवश्यकता होगी।
क्या वैज्ञानिक अणु की गति की दिशा को नियंत्रित कर पाए?
हाँ, 122 मामलों में जहाँ अणु की स्थिति-परिवर्तन की दिशा स्पष्ट रूप से पहचानी जा सकी, वहाँ वैज्ञानिकों ने पाया कि विद्युत-ध्रुवता बदलने पर अणु के घूमने का क्रम भी पलट जाता है। इसका अर्थ है कि बिजली के संकेत से अणु की घूर्णन-दिशा को नियंत्रित किया जा सकता है।
इस शोध में कौन-कौन से देश शामिल थे?
इस अंतरराष्ट्रीय शोध में भारत, इज़रायल, जर्मनी, डेनमार्क और चीन के वैज्ञानिकों ने भाग लिया। भारत की ओर से IIT मद्रास के डॉ. अनिल कुमार सिंह इस शोध-दल का हिस्सा थे।
राष्ट्र प्रेस
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