3 अगस्त 2026
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आईएसआई बिल को संसदीय स्थायी समिति के पास भेजने की मांग, सांसद राजा राम सिंह ने मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को लिखा पत्र

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आईएसआई बिल को संसदीय स्थायी समिति के पास भेजने की मांग, सांसद राजा राम सिंह ने मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को लिखा पत्र

सारांश

सीपीआई (एमएल) सांसद राजा राम सिंह ने ISI बिल पर गंभीर चिंता जताते हुए मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को पत्र लिखा है। उनका तर्क है कि माशेलकर समिति ने ISI अधिनियम 1959 को रद्द करने की सिफारिश नहीं की थी और संस्थान के तीनों मुख्य स्तंभों ने आपत्ति जताई है। बिल को बिना स्थायी समिति की समीक्षा के पारित करना उचित नहीं।

मुख्य बातें

सीपीआई (एमएल) सांसद राजा राम सिंह ने 3 अगस्त 2026 को MoSPI मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को पत्र लिखा।
माँग की गई कि ISI बिल को संसदीय स्थायी समिति के पास विस्तृत समीक्षा के लिए भेजा जाए।
माशेलकर समिति ने ISI अधिनियम 1959 को रद्द करने की सिफारिश नहीं की थी, केवल दो संशोधनों का सुझाव दिया था।
आईएसआई की सोसाइटी, काउंसिल और एकेडमिक काउंसिल — तीनों मुख्य स्तंभों ने प्रस्ताव पर गहरी आपत्ति जताई है।
ढाँचे में बदलाव से NEP 2020 के कार्यान्वयन और मुख्य शोध कार्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका।

सीपीआई (एमएल) के लोकसभा सदस्य और फ्लोर लीडर राजा राम सिंह ने 3 अगस्त 2026 को सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को पत्र लिखकर माँग की है कि प्रस्तावित इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) बिल को आगे की विस्तृत समीक्षा के लिए संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा जाए। उनका स्पष्ट कहना है कि प्रस्तावित संशोधनों की गहन जाँच किए बिना इस बिल को पारित नहीं किया जाना चाहिए।

पत्र में क्या कहा सांसद ने

राजा राम सिंह ने मंत्री को लिखे पत्र में कहा, 'मैं आईएसआई से जुड़े प्रस्तावित कानूनी बदलावों के बारे में गहरी चिंता व्यक्त करने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ। आईएसआई राष्ट्रीय महत्व और वैश्विक ख्याति वाला संस्थान है। ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान में किसी भी सुधार के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है।' उन्होंने मंत्री से अनुरोध किया कि इस विषय पर उठाए गए महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाए।

विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों से विचलन

सांसद ने यह भी रेखांकित किया कि चौथी समीक्षा समिति (माशेलकर समिति) ने आईएसआई अधिनियम 1959 को रद्द करने की सिफारिश नहीं की थी। समिति ने केवल दो संशोधनों के साथ मौजूदा सोसाइटी-आधारित संरचना को बनाए रखने का सुझाव दिया था। इस तरह, प्रस्तावित बिल विशेषज्ञ सलाह के विपरीत दिशा में जाता प्रतीत होता है।

ऐतिहासिक विरासत और परामर्श की कमी

राजा राम सिंह के अनुसार, आईएसआई सोसाइटी के साथ संस्थान के सदियों पुराने संबंध को तोड़ने से भारतीय पुनर्जागरण की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत कमज़ोर होगी और महँगी कानूनी व प्रशासनिक अड़चनें पैदा होने का जोखिम रहेगा। उन्होंने यह भी बताया कि आईएसआई के तीन मुख्य स्तंभ — सोसाइटी, काउंसिल और एकेडमिक काउंसिल — के साथ-साथ अधिकांश फैकल्टी और मुख्य नेतृत्व ने इस प्रस्ताव पर गहरी आपत्ति जताई है और बातचीत का अनुरोध किया है।

शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवधान की आशंका

पत्र में आशंका जताई गई है कि ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन करने से आईएसआई वर्षों तक नियमों को फिर से लिखने में उलझा रहेगा, जिससे मुख्य शोध कार्य प्रभावित होगा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के कार्यान्वयन में बाधा आएगी। इसके अलावा, बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के साथ कई मैनेजमेंट काउंसिल जोड़ने से एक अपेक्षाकृत छोटे संस्थान के लिए अनावश्यक नौकरशाही का बोझ पड़ेगा।

आगे क्या होगा

राजा राम सिंह ने स्पष्ट माँग की है कि इन दूरगामी परिणामों को देखते हुए, कोई भी विधायी कदम उठाने से पहले इस बिल को संसदीय समिति के पास विस्तृत समीक्षा और हितधारकों के परामर्श के लिए भेजा जाए। यह देखना अभी बाकी है कि मंत्रालय इस माँग पर क्या रुख अपनाता है और क्या बिल को समिति के पास भेजा जाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो बिल को सीधे पारित करने की जल्दबाज़ी संदेह पैदा करती है। संसदीय समिति को भेजना न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का तकाज़ा है, बल्कि ISI की वैश्विक साख की रक्षा के लिए भी ज़रूरी है।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ISI बिल क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
ISI बिल, इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट अधिनियम 1959 में प्रस्तावित संशोधन है जो संस्थान की मौजूदा सोसाइटी-आधारित संरचना को बदलने का प्रयास करता है। विवाद इसलिए है क्योंकि विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों से अलग जाकर यह बदलाव प्रस्तावित किया गया है और संस्थान के प्रमुख हितधारकों ने इस पर गहरी आपत्ति जताई है।
सांसद राजा राम सिंह की माँग क्या है?
सीपीआई (एमएल) के लोकसभा सदस्य राजा राम सिंह ने माँग की है कि ISI बिल को संसदीय स्थायी समिति के पास विस्तृत समीक्षा और हितधारकों के परामर्श के लिए भेजा जाए। उनका कहना है कि बिना इस समीक्षा के इसे पारित नहीं किया जाना चाहिए।
माशेलकर समिति ने ISI पर क्या सिफारिश की थी?
चौथी समीक्षा समिति (माशेलकर समिति) ने ISI अधिनियम 1959 को रद्द करने की सिफारिश नहीं की थी। समिति ने केवल दो संशोधनों के साथ मौजूदा सोसाइटी-आधारित संरचना को बनाए रखने का सुझाव दिया था।
ISI बिल से संस्थान पर क्या असर पड़ सकता है?
ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन से ISI वर्षों तक नियमों को फिर से लिखने में उलझ सकता है, जिससे मुख्य शोध कार्य प्रभावित होगा और NEP 2020 के कार्यान्वयन में बाधा आएगी। इसके अलावा, महँगी कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें पैदा होने का भी जोखिम है।
ISI के किन पक्षों ने बिल पर आपत्ति जताई है?
ISI के तीनों मुख्य स्तंभ — सोसाइटी, काउंसिल और एकेडमिक काउंसिल — के साथ-साथ अधिकांश फैकल्टी और मुख्य नेतृत्व ने प्रस्तावित बदलावों पर गहरी आपत्ति जताई है और बातचीत का अनुरोध किया है।
राष्ट्र प्रेस
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