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मथुरा इस्कॉन मंदिर में पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य, महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता

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मथुरा इस्कॉन मंदिर में पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य, महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता

सारांश

मथुरा के इस्कॉन मंदिर ने पारंपरिक वेशभूषा को अनिवार्य घोषित किया है — महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता। प्रशासन का कहना है कि यह नियम एक वर्ष पुराना है और सनातन परंपरा के सम्मान में लागू किया गया है।

मुख्य बातें

मथुरा इस्कॉन मंदिर ने श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य की है।
महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता या पैंट-शर्ट अपेक्षित है।
ड्रेस कोड का सूचना-बोर्ड मंदिर में एक वर्ष पूर्व से लगा हुआ है।
इस्कॉन PRO रविलोचन दास और दिल्ली इस्कॉन ट्रस्टी युधिष्ठिर गोविंदा दास ने इसे सनातन परंपरा का हिस्सा बताया।
यह नियम महिलाओं और पुरुषों दोनों पर समान रूप से लागू है।

मथुरा स्थित इस्कॉन मंदिर ने श्रद्धालुओं के लिए एक आधिकारिक ड्रेस एडवाइजरी जारी की है, जिसके तहत मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य कर दी गई है। इस्कॉन के जनसंपर्क अधिकारी रविलोचन दास ने स्पष्ट किया कि यह नियम सभी भक्तों पर समान रूप से लागू होता है और इसका उद्देश्य मंदिर की पवित्रता एवं सनातन परंपरा का सम्मान सुनिश्चित करना है।

ड्रेस कोड का विवरण

रविलोचन दास के अनुसार, महिला श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक साड़ी पहनकर आना अपेक्षित है, जबकि पुरुष भक्तों को धोती-कुर्ता अथवा पैंट-शर्ट में आना होगा। उन्होंने कहा, "इस बोर्ड का मतलब लोगों को बताना है कि वे पारंपरिक कपड़ों में आएं, जिनकी इच्छा है वे सनातन धर्म का पालन करके आएं।" गौरतलब है कि यह सूचना-बोर्ड मंदिर में एक वर्ष पूर्व से ही लगा हुआ था, किंतु अब इसे व्यापक ध्यान मिल रहा है।

इस्कॉन दिल्ली के ट्रस्टी का स्पष्टीकरण

दिल्ली इस्कॉन के ट्रस्टी एवं कम्युनिकेशंस के कंट्री डायरेक्टर युधिष्ठिर गोविंदा दास ने इस विषय पर विस्तार से बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह ड्रेस कोड किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है — यह महिलाओं और पुरुषों दोनों पर समान रूप से लागू होता है। उनके अनुसार, "जब भी हम किसी मंदिर या पवित्र जगह पर जाते हैं, तो हम भगवान के प्रति भक्ति, विश्वास और समर्पण की भावना के साथ आते हैं। इसलिए हर जगह की अपनी पवित्रता और मर्यादा होती है।"

व्यापक संदर्भ: केवल इस्कॉन तक नहीं

युधिष्ठिर गोविंदा दास ने यह भी रेखांकित किया कि ड्रेस कोड की परंपरा इस्कॉन की विशिष्टता नहीं है। उन्होंने त्रिवेंद्रम के अनंत पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुपति के बालाजी मंदिर और जगन्नाथ पुरी का उदाहरण देते हुए कहा कि देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर वेशभूषा संबंधी नियम पहले से प्रचलित हैं। उन्होंने इसे कार्यालयों, अस्पतालों और सुरक्षा बलों के ड्रेस कोड से भी जोड़ते हुए कहा, "हर जगह का अपना एक अलग महत्व है, बस हम उसका ही सम्मान करने के लिए बोल रहे हैं।"

आगे की स्थिति

मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह एडवाइजरी श्रद्धालुओं को दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक परिवेश के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से जारी की गई है। आने वाले समय में इस नियम के क्रियान्वयन पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि बोर्ड एक साल पहले से लगा था। यह घटना उस व्यापक सांस्कृतिक बहस का हिस्सा है जिसमें धार्मिक स्थलों की मर्यादा और आधुनिक जीवनशैली के बीच संतुलन का प्रश्न बार-बार उठता है। मंदिर प्रशासन का दृष्टिकोण तर्कसंगत है, लेकिन क्रियान्वयन की पारदर्शिता और श्रद्धालुओं को पहले से सूचित करने की व्यवस्था पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मथुरा इस्कॉन मंदिर में ड्रेस कोड क्या है?
मथुरा इस्कॉन मंदिर में महिला श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक साड़ी और पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता या पैंट-शर्ट पहनना अनिवार्य है। यह नियम सभी भक्तों पर समान रूप से लागू होता है।
इस्कॉन का यह ड्रेस कोड कब से लागू है?
इस्कॉन PRO रविलोचन दास के अनुसार, मंदिर में पारंपरिक वेशभूषा संबंधी सूचना-बोर्ड एक वर्ष पूर्व से ही लगा हुआ है। अब इसे व्यापक ध्यान मिल रहा है।
क्या यह ड्रेस कोड केवल महिलाओं पर लागू होता है?
नहीं, दिल्ली इस्कॉन के ट्रस्टी युधिष्ठिर गोविंदा दास ने स्पष्ट किया है कि यह नियम महिलाओं और पुरुषों दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
क्या अन्य मंदिरों में भी ऐसे ड्रेस कोड हैं?
हाँ, युधिष्ठिर गोविंदा दास ने त्रिवेंद्रम के अनंत पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुपति के बालाजी मंदिर और जगन्नाथ पुरी का उदाहरण दिया, जहाँ वेशभूषा संबंधी नियम पहले से प्रचलित हैं।
इस्कॉन ने ड्रेस कोड क्यों लागू किया है?
मंदिर प्रशासन का कहना है कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता और सनातन परंपरा के सम्मान के लिए पारंपरिक वेशभूषा आवश्यक है। इसे श्रद्धालुओं में आध्यात्मिक अनुशासन और भक्ति-भावना को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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