17 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

जन भवन में हाइड्रोपोनिक चारा इकाई का उद्घाटन, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल से गौशाला को मिलेगा रोज़ 100 किलो ताज़ा चारा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
जन भवन में हाइड्रोपोनिक चारा इकाई का उद्घाटन, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल से गौशाला को मिलेगा रोज़ 100 किलो ताज़ा चारा

सारांश

लखनऊ के जन भवन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल पर स्थापित हाइड्रोपोनिक चारा इकाई प्रतिदिन 100 किलो ताज़ा, रसायन मुक्त चारा तैयार करेगी। मात्र आठ दिनों में बीज से चारे तक की यह प्रक्रिया गौसंरक्षण और जल संरक्षण दोनों के लिए एक व्यावहारिक मॉडल पेश करती है।

मुख्य बातें

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 29 मई 2026 को जन भवन, लखनऊ में हाइड्रोपोनिक चारा उत्पादन इकाई का उद्घाटन किया।
इकाई की क्षमता प्रतिदिन 100 किलोग्राम हरा चारा उत्पादन की है।
बीज बुआई से चारा तैयार होने तक की प्रक्रिया मात्र आठ दिनों में पूरी होती है।
मक्का, जौ, जई और गेहूं जैसी पोषक फसलें उगाई जाएंगी — पूरी तरह रसायन मुक्त ।
पारंपरिक खेती की तुलना में बेहद कम पानी और स्थान की आवश्यकता; मौसम का उत्पादन पर कोई असर नहीं।

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 29 मई 2026 को लखनऊ स्थित जन भवन में एक हाइड्रोपोनिक चारा उत्पादन इकाई का उद्घाटन किया। यह इकाई जन भवन की गौशाला में रहने वाले गोवंशों को वर्षभर रसायन मुक्त, पौष्टिक और ताज़ा हरा चारा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित की गई है। पर्यावरण संरक्षण और सतत कृषि की दिशा में यह एक उल्लेखनीय कदम माना जा रहा है।

इकाई की क्षमता और उत्पादन प्रक्रिया

जन भवन में स्थापित यह हाइड्रोपोनिक इकाई प्रतिदिन लगभग 100 किलोग्राम हरा चारा उत्पादन करने में सक्षम है। इसमें मक्का, जौ, जई (ओट्स) और गेहूं जैसी पोषक फसलों का उत्पादन किया जाएगा। बीज बुआई से लेकर चारा तैयार होने तक की पूरी प्रक्रिया मात्र आठ दिनों में पूरी हो जाती है, और चक्रीय व्यवस्था के चलते प्रतिदिन ताज़ा उत्पाद उपलब्ध रहेगा।

हाइड्रोपोनिक तकनीक की विशेषताएँ

पारंपरिक खेती की तुलना में हाइड्रोपोनिक प्रणाली में बेहद कम पानी और सीमित स्थान की आवश्यकता होती है। इस तकनीक में किसी भी रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं होता, जिससे तैयार चारा पूरी तरह रसायन मुक्त और उच्च पोषण मूल्य से युक्त होता है। गौरतलब है कि प्रतिकूल मौसम का इस प्रणाली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे सर्दी, गर्मी या मानसून — हर मौसम में निर्बाध उत्पादन जारी रहता है।

गौसंरक्षण और पर्यावरण की दिशा में पहल

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पर्यावरण-केंद्रित सोच के अनुरूप यह इकाई सीमित संसाधनों में गौसंरक्षण को मज़बूत करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। यह पहल जल संरक्षण और सतत कृषि के सिद्धांतों के अनुकूल है, और इसे अन्य गौशालाओं के लिए एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। यह ऐसे समय में आई है जब उत्तर प्रदेश में गोवंश संरक्षण और उनके पोषण को लेकर नीतिगत जोर बढ़ा है।

आगे की संभावनाएँ

जन भवन में सफल संचालन के बाद इस मॉडल को प्रदेश की अन्य सरकारी गौशालाओं में भी लागू किए जाने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार हाइड्रोपोनिक तकनीक छोटे किसानों और पशुपालकों के लिए भी एक किफायती विकल्प बन सकती है, बशर्ते इसकी प्रारंभिक लागत को अनुदान के माध्यम से सुलभ बनाया जाए।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह मॉडल उत्तर प्रदेश की हज़ारों सरकारी और निजी गौशालाओं तक पहुँच सकेगा जहाँ चारे की किल्लत एक पुरानी समस्या है। प्रारंभिक स्थापना लागत और तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता इस मॉडल के व्यापक विस्तार में बाधा बन सकती है। राज्यपाल की पहल सराहनीय है, परंतु इसका वास्तविक प्रभाव तभी मापा जा सकेगा जब इसे नीतिगत ढाँचे और बजटीय समर्थन के साथ ज़मीनी स्तर पर उतारा जाए।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हाइड्रोपोनिक चारा उत्पादन इकाई क्या है?
हाइड्रोपोनिक चारा उत्पादन इकाई एक ऐसी वैज्ञानिक प्रणाली है जिसमें बिना मिट्टी के, केवल पानी और पोषक तत्वों की सहायता से हरा चारा उगाया जाता है। इसमें पारंपरिक खेती की तुलना में बहुत कम जगह, कम पानी और कोई रसायन नहीं लगता, और बीज बुआई से चारा तैयार होने में मात्र आठ दिन लगते हैं।
जन भवन की इस इकाई से प्रतिदिन कितना चारा मिलेगा?
जन भवन में स्थापित यह इकाई प्रतिदिन लगभग 100 किलोग्राम ताज़ा हरा चारा उत्पादित करने में सक्षम है। चक्रीय उत्पादन व्यवस्था के कारण हर दिन ताज़ा चारा उपलब्ध रहेगा।
इस इकाई में कौन-कौन सी फसलें उगाई जाएंगी?
इस इकाई में मक्का, जौ, जई (ओट्स) और गेहूं जैसी पोषक फसलें उगाई जाएंगी। ये सभी फसलें रसायन मुक्त होंगी और गोवंशों के लिए उच्च पोषण मूल्य प्रदान करेंगी।
हाइड्रोपोनिक तकनीक पारंपरिक खेती से बेहतर क्यों मानी जाती है?
हाइड्रोपोनिक तकनीक में पारंपरिक खेती की तुलना में बेहद कम पानी और सीमित स्थान की ज़रूरत होती है। इसमें किसी रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं होता और प्रतिकूल मौसम का उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता, जिससे वर्षभर निर्बाध उत्पादन संभव होता है।
क्या यह मॉडल अन्य गौशालाओं में भी लागू होगा?
जन भवन में सफल संचालन के बाद इस मॉडल को प्रदेश की अन्य सरकारी गौशालाओं में भी अपनाए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालाँकि इसके व्यापक विस्तार के लिए नीतिगत समर्थन और प्रारंभिक लागत में सहायता आवश्यक होगी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 4 दिन पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 4 महीने पहले
  7. 6 महीने पहले
  8. 8 महीने पहले