जंतर-मंतर प्रदर्शन: PM के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी पर रुचिका सिंह के विरुद्ध नोएडा में जीरो FIR
सारांश
मुख्य बातें
नोएडा के थाना एक्सप्रेसवे (गौतमबुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट) में 30 जुलाई को एक युवती रुचिका सिंह के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की गई है। आरोप है कि उसने 23 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया। यह मुकदमा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, 353(1) और 356(1) के अंतर्गत दर्ज किया गया है।
मामले का घटनाक्रम
शिकायतकर्ता स्मृति सिंह, पत्नी तेजेंद्र सिंह, ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में कहा कि 23 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान आरोपी रुचिका सिंह ने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली टिप्पणियाँ कीं। शिकायत में यह भी कहा गया कि कथित बयान जानबूझकर विद्वेष फैलाने और लोक शांति भंग करने की मंशा से दिया गया प्रतीत होता है।
पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता को इस घटना की जानकारी 23 जुलाई को ही मिली, जिसके बाद उन्होंने विधिक कार्रवाई की माँग करते हुए शिकायत दर्ज कराई।
जीरो FIR क्यों और क्या होगा आगे
चूँकि घटना नई दिल्ली में हुई जबकि शिकायत नोएडा में दर्ज हुई, इसलिए पुलिस ने जीरो एफआईआर का रास्ता अपनाया। जीरो एफआईआर की प्रक्रिया के तहत आगे की विवेचना संबंधित अधिकार क्षेत्र की पुलिस — अर्थात दिल्ली पुलिस — को स्थानांतरित की जाएगी।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उपलब्ध वीडियो फुटेज और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जाँच की जा रही है। जाँच पूरी होने के बाद तथ्यों के अनुसार आगे की विधिक कार्रवाई तय होगी।
किन धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा
गौतमबुद्ध नगर पुलिस ने प्रथम दृष्टया शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 352 (जानबूझकर अपमान कर उकसावा), 353(1) (सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से बयान) और 356(1) (राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध कृत्य) के तहत मामला दर्ज किया है। यह ध्यान देने योग्य है कि ये आरोप शिकायत पर आधारित हैं और जाँच अभी जारी है।
व्यापक संदर्भ
जंतर-मंतर लंबे समय से विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक मंचों पर की गई टिप्पणियों को लेकर कानूनी कार्रवाई के मामले पूरे देश में बढ़े हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के दायरे के बीच की सीमा-रेखा अदालतों द्वारा तय की जानी चाहिए। फिलहाल मामले की जाँच जारी है और किसी निष्कर्ष पर पहुँचना समय से पहले होगा।