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जावेद अख्तर का आह्वान: विज्ञान-तकनीक को लिबरल आर्ट्स से जोड़ें, यही इंसान को रोबोट से अलग करता है

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जावेद अख्तर का आह्वान: विज्ञान-तकनीक को लिबरल आर्ट्स से जोड़ें, यही इंसान को रोबोट से अलग करता है

सारांश

जावेद अख्तर ने कहा कि विज्ञान और लिबरल आर्ट्स को अलग-अलग खांचों में बांटना ठीक नहीं — इतिहास, कविता, चित्रकला की समझ ही इंसान को रोबोट से अलग करती है। AI और स्वचालन के दौर में यह बात और भी प्रासंगिक हो जाती है।

मुख्य बातें

जावेद अख्तर ने 25 अक्टूबर 2026 को मुंबई में कहा कि विज्ञान-तकनीक और लिबरल आर्ट्स को साथ पढ़ना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा, 'यही एक इंसान और कंप्यूटर या रोबोट के बीच का अंतर है।' अख्तर के अनुसार, इतिहास, साहित्य, कविता, चित्रकला और लोक कलाओं की समझ संतुलित व्यक्तित्व के लिए अनिवार्य है।
उन्होंने 'जंजीर' (1973) , 'दीवार' (1975) और 'शोले' (1975) जैसी फिल्मों की पटकथाएँ सलीम-जावेद जोड़ी के रूप में लिखीं।
अख्तर को पद्म श्री (1999) , पद्म भूषण (2007) और पाँच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं।

वरिष्ठ पटकथा लेखक, गीतकार और उर्दू कवि जावेद अख्तर ने 25 अक्टूबर 2026 को मुंबई में कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को उदार कलाओं (लिबरल आर्ट्स) से अलग करके देखना न केवल शिक्षा के लिए बल्कि मानवीय विकास के लिए भी घातक है। उनके अनुसार, इतिहास, साहित्य, कविता और चित्रकला जैसे विषयों की समझ ही एक व्यक्ति को मशीन से अलग पहचान देती है।

मुख्य वक्तव्य

अख्तर ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन लिबरल आर्ट्स की भी कुछ समझ होना ज़रूरी है। यही एक इंसान और कंप्यूटर या रोबोट के बीच का अंतर है।' उनका यह कथन ऐसे समय में आया है जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्वचालन को लेकर वैश्विक बहस तेज़ हो रही है।

उन्होंने यह भी जोड़ा, 'ज्ञान को इस तरह अलग-अलग खांचों में बांटना सही नहीं है।' उनके अनुसार, विज्ञान के क्षेत्र के लोगों को भी इतिहास, साहित्य, कविता, चित्रकला और लोक कलाओं की जानकारी होनी चाहिए — और उतनी ही आवश्यकता लिबरल आर्ट्स के विद्यार्थियों को विज्ञान की बुनियादी समझ की है।

क्यों मायने रखता है यह विचार

गौरतलब है कि भारत में उच्च शिक्षा की संरचना अब भी काफी हद तक विभाजित है — इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी एक तरफ, और कला-मानविकी दूसरी तरफ। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में अंतर-विषयक (interdisciplinary) शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है, लेकिन ज़मीनी बदलाव धीमा रहा है।

अख्तर का यह बयान उसी व्यापक विमर्श को आवाज़ देता है जिसमें रचनात्मकता और तकनीकी दक्षता को साथ-साथ विकसित करने की माँग उठती रही है। आलोचकों का कहना है कि STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित) पर अत्यधिक ज़ोर देने से युवाओं में सहानुभूति, आलोचनात्मक सोच और सांस्कृतिक चेतना का अभाव हो सकता है।

जावेद अख्तर: एक परिचय

जावेद अख्तर को सबसे पहले प्रसिद्ध पटकथा लेखन जोड़ी सलीम-जावेद के सदस्य के रूप में व्यापक पहचान मिली। सलीम खान के साथ इस जोड़ी ने 'जंजीर' (1973), 'दीवार' (1975), 'शोले' (1975) और 'मिस्टर इंडिया' (1987) जैसी ऐतिहासिक फिल्मों की पटकथाएँ लिखीं, जिन्होंने बॉलीवुड की कहानी कहने की शैली पर गहरी छाप छोड़ी।

बाद में उन्होंने एक स्वतंत्र गीतकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई और 'सिलसिला', '1942: ए लव स्टोरी', 'बॉर्डर', 'रिफ्यूजी' तथा 'लगान' जैसी फिल्मों के लिए यादगार गीत दिए। उनकी उर्दू काव्य कृति 'तरकश' साहित्यिक हलकों में अत्यंत प्रशंसित है।

सम्मान और उपलब्धियाँ

भारतीय सिनेमा और साहित्य में उनके अतुलनीय योगदान के लिए अख्तर को पाँच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है — ये दोनों भारत सरकार के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान हैं।

आगे की दिशा

अख्तर का यह आह्वान शिक्षा नीति-निर्माताओं, विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत के लिए एक संकेत है कि भविष्य की प्रतिभा को केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता और सांस्कृतिक जागरूकता के साथ तैयार करना होगा। यह विमर्श आने वाले समय में शिक्षा सुधार की बहस में और अधिक प्रासंगिक होता जाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली की एक बड़ी संरचनात्मक खामी पर सीधा प्रहार है। NEP 2020 ने अंतर-विषयक शिक्षा की बात तो की, लेकिन IIT और NIT जैसे संस्थानों में मानविकी अब भी हाशिये पर है। AI के इस युग में जब 'क्या करना है' मशीनें तय करने लगी हैं, असली सवाल यह है कि 'क्यों और किसके लिए करना है' — यह समझ केवल कला और मानवीय विषय दे सकते हैं। अख्तर की पीढ़ी ने यह संतुलन जिया है; अगली पीढ़ी के लिए इसे पाठ्यक्रम में उतारना बाकी है।
RashtraPress
25 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जावेद अख्तर ने विज्ञान और लिबरल आर्ट्स को जोड़ने की ज़रूरत क्यों बताई?
जावेद अख्तर का कहना है कि इतिहास, साहित्य, कविता और चित्रकला जैसे विषयों की समझ ही इंसान को कंप्यूटर और रोबोट से अलग बनाती है। उनके अनुसार ज्ञान को अलग-अलग खांचों में बांटना किसी के लिए भी उचित नहीं है।
जावेद अख्तर कौन हैं और उनकी पहचान क्या है?
जावेद अख्तर भारतीय सिनेमा के प्रतिष्ठित पटकथा लेखक, गीतकार और उर्दू कवि हैं। सलीम-जावेद जोड़ी के रूप में उन्होंने 'जंजीर', 'दीवार' और 'शोले' जैसी ऐतिहासिक फिल्में लिखीं, और बाद में 'लगान' व '1942: ए लव स्टोरी' जैसी फिल्मों के गीत लिखे।
जावेद अख्तर को कौन-कौन से पुरस्कार मिल चुके हैं?
जावेद अख्तर को पाँच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, 1999 में पद्म श्री और 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है। ये भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से हैं।
लिबरल आर्ट्स और विज्ञान का समन्वय भारत में क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में विज्ञान-तकनीक और मानविकी अब भी काफी हद तक अलग-अलग धाराओं में हैं। NEP 2020 ने अंतर-विषयक शिक्षा की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन AI और स्वचालन के युग में रचनात्मकता और मानवीय संवेदनशीलता की माँग पहले से कहीं अधिक है।
जावेद अख्तर की काव्य रचनाएँ कौन-सी हैं?
जावेद अख्तर की प्रमुख उर्दू काव्य कृति 'तरकश' है, जो साहित्यिक हलकों में अत्यंत प्रशंसित रही है। सिनेमा के अलावा उनकी पहचान एक गंभीर उर्दू कवि के रूप में भी स्थापित है।
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