झारखंड परिसीमन विवाद: भाजपा नेता अमर बाउरी ने राहुल गांधी से 2008 के यूपीए फैसले पर माफी की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड में परिसीमन को लेकर छिड़ी राजनीतिक जंग में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी ने 1 सितंबर 2026 को रांची स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में प्रेसवार्ता कर कांग्रेस पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से माँग की कि वे 2008 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा परिसीमन के मुद्दे पर लिए गए फैसले के लिए जनता से सार्वजनिक रूप से माफी माँगें।
मुख्य घटनाक्रम
बाउरी ने कहा कि 2008 में यूपीए सरकार ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का प्रस्ताव रखा था, जिसके चलते झारखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या 28 से घटकर 22 होने की स्थिति बन रही थी। उन्होंने कहा कि उस समय भाजपा ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संविधान के 84वें संशोधन का समर्थन किया, ताकि जनजातीय समुदाय के हित सुरक्षित रहें।
कांग्रेस और झामुमो पर आरोप
बाउरी ने आरोप लगाया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) बिना किसी ठोस आधार के लोगों के बीच यह भ्रम फैला रहे हैं कि राज्य में आदिवासी सीटें कम हो जाएंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी तक न तो परिसीमन आयोग का गठन हुआ है और न ही केंद्र सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव सामने आया है। उनके अनुसार, इस स्थिति में विपक्ष का यह रुख राजनीति से प्रेरित है।
50 प्रतिशत सीट वृद्धि का प्रस्ताव
बाउरी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस कथित प्रस्ताव का हवाला दिया, जिसमें मौजूदा विधानसभा सीटों में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की बात कही गई है। उनके अनुसार, यदि झारखंड विधानसभा की कुल सीटें 81 से बढ़कर 121 होती हैं, तो एसटी सीटें 28 से बढ़कर 42 और अनुसूचित जाति (एससी) सीटें 9 से बढ़कर 14 हो सकती हैं। उन्होंने कांग्रेस और झामुमो से सवाल किया कि वे इस प्रस्ताव का समर्थन क्यों नहीं कर रहे।
जनजातीय अधिकारों पर भाजपा का पक्ष
बाउरी ने कहा कि भाजपा ने 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन से लेकर अब तक जनजातीय समाज के सम्मान और प्रतिनिधित्व के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाए जाने और द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति पद पर आसीन होने को जनजातीय समाज के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड में आदिवासी राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है और परिसीमन का मुद्दा आगामी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या
परिसीमन आयोग के गठन से पहले ही इस मुद्दे पर राजनीतिक तापमान बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीटों की वास्तविक संख्या और आरक्षण का स्वरूप तब तक स्पष्ट नहीं होगा, जब तक आयोग अपनी सिफारिशें नहीं देता। तब तक, झारखंड की राजनीति में यह मुद्दा तीखी बहस का केंद्र बना रहेगा।