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झारखंड हाईकोर्ट का ई-वेस्ट पर कड़ा रुख, राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एसओपी पर माँगा जवाब

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झारखंड हाईकोर्ट का ई-वेस्ट पर कड़ा रुख, राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एसओपी पर माँगा जवाब

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में ई-वेस्ट के वैज्ञानिक निपटान के लिए कोई एसओपी न होने पर कड़ा रुख अपनाया है। बढ़ते डिजिटलाइजेशन के बीच यह खतरनाक कचरा मिट्टी और भूमिगत जल को जहरीला बना रहा है — और राज्य सरकार के पास अब तक कोई ठोस जवाब नहीं है।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने 8 जून 2026 को ई-वेस्ट प्रबंधन पर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जवाब माँगा।
मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश कुमार की खंडपीठ ने राज्य में ई-वेस्ट एसओपी न होने पर गहरी चिंता जताई।
याचिकाकर्ता शशि सागर वर्मा की ओर से अधिवक्ता शैलेश पोद्दार ने तर्क दिया कि केंद्रीय नियमावली के बावजूद झारखंड में कोई ठोस ई-वेस्ट नीति नहीं है।
कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी जैसे उपकरणों का खतरनाक कचरा सामान्य घरेलू कचरे में मिलाया जा रहा है, जिससे मिट्टी और भूमिगत जल प्रदूषित हो रहे हैं।
तेज़ डिजिटलाइजेशन के कारण राज्य में ई-वेस्ट की मात्रा रिकॉर्ड गति से बढ़ रही है, जिसका मानव स्वास्थ्य और पशुओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

झारखंड हाईकोर्ट ने 8 जून 2026 को राज्य में इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) के वैज्ञानिक और सुरक्षित निपटान की कोई ठोस व्यवस्था न होने पर गंभीर चिंता जताते हुए राज्य सरकार और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से विस्तृत जवाब तलब किया है। रांची में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने सीधे पूछा कि क्या राज्य में ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए अब तक कोई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह जनहित याचिका शशि सागर वर्मा की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता शैलेश पोद्दार ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे के सुरक्षित प्रबंधन और निपटान के लिए पहले ही राष्ट्रीय गाइडलाइंस और नियमावली अधिसूचित कर रखी है। इस राष्ट्रीय नियमावली के तहत सभी राज्यों को ई-वेस्ट के संग्रह, पृथक्करण, सुरक्षित परिवहन और रिसाइक्लिंग के लिए अपनी एसओपी तैयार करनी होती है।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि झारखंड में इस दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं, जो केंद्रीय नियमावली का स्पष्ट उल्लंघन है।

मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ की चिंता

मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य की कचरा प्रबंधन प्रणाली पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने आधिकारिक तौर पर पूछा कि यदि राज्य में ई-वेस्ट के वैज्ञानिक निपटान के लिए कोई गाइडलाइन या एसओपी नहीं है, तो इसके क्या कारण हैं। खंडपीठ ने दोनों पक्षों को इस संवेदनशील विषय पर अपना विस्तृत पक्ष प्रस्तुत करने का स्पष्ट निर्देश दिया है।

ई-वेस्ट से पर्यावरण और स्वास्थ्य पर खतरा

याचिका में रेखांकित किया गया है कि झारखंड में कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का खतरनाक कचरा सीधे सामान्य घरेलू और नगर निगम के ठोस कचरे के साथ मिला दिया जाता है। वैज्ञानिक तरीके से रिसाइकिल न होने के कारण इसमें मौजूद हानिकारक तत्व मिट्टी और भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहे हैं।

अधिवक्ता ने अदालत को यह भी बताया कि तेज़ी से बढ़ते डिजिटलाइजेशन के कारण राज्य में ई-वेस्ट की मात्रा रिकॉर्ड गति से बढ़ रही है। इसके जानलेवा प्रभाव न केवल मानव स्वास्थ्य पर, बल्कि पशुओं पर भी पड़ रहे हैं।

आगे क्या होगा

अदालत के निर्देश के बाद अब झारखंड सरकार और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपना जवाब दाखिल करना होगा। यह मामला राज्य में ई-वेस्ट नीति की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है। गौरतलब है कि देश के कई अन्य राज्य भी ई-वेस्ट प्रबंधन की इसी चुनौती से जूझ रहे हैं, और झारखंड हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप एक अहम मिसाल बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन राज्य स्तर पर क्रियान्वयन की जिम्मेदारी अनिश्चितकाल तक टलती रहती है। झारखंड अकेला नहीं है — देश के दर्जनों राज्यों में ई-वेस्ट एसओपी केवल कागज़ पर है। असली सवाल यह है कि क्या अदालती दबाव के बिना राज्य सरकारें इस दिशा में स्वेच्छा से कदम उठातीं। बढ़ते डिजिटलाइजेशन के दौर में यह चूक केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की नींव है।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने ई-वेस्ट पर क्या आदेश दिया है?
झारखंड हाईकोर्ट ने 8 जून 2026 को राज्य सरकार और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से ई-वेस्ट प्रबंधन की एसओपी न होने पर विस्तृत जवाब तलब किया है। यह आदेश शशि सागर वर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
झारखंड में ई-वेस्ट की समस्या क्यों गंभीर है?
झारखंड में इलेक्ट्रॉनिक कचरे को सामान्य घरेलू और नगर निगम के ठोस कचरे के साथ मिला दिया जाता है। वैज्ञानिक तरीके से रिसाइकिल न होने के कारण इसमें मौजूद हानिकारक तत्व मिट्टी और भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे मानव स्वास्थ्य और पशुओं पर जानलेवा प्रभाव पड़ रहे हैं।
ई-वेस्ट एसओपी क्या होती है और यह क्यों ज़रूरी है?
मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) वह दिशानिर्देश है जो ई-वेस्ट के संग्रह, पृथक्करण, सुरक्षित परिवहन और रिसाइक्लिंग की प्रक्रिया तय करती है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय नियमावली के तहत सभी राज्यों को यह एसओपी तैयार करनी होती है, लेकिन याचिका के अनुसार झारखंड में अब तक ऐसा नहीं हुआ है।
यह जनहित याचिका किसने दायर की है?
यह जनहित याचिका शशि सागर वर्मा की ओर से दायर की गई है। उनकी ओर से अधिवक्ता शैलेश पोद्दार ने अदालत में दलीलें पेश कीं और केंद्रीय नियमावली के अनुपालन न होने का मुद्दा उठाया।
इस मामले में आगे क्या होगा?
अदालत के निर्देश के बाद झारखंड सरकार और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य की ई-वेस्ट नीति की दिशा स्पष्ट होने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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