झारखंड में वज्रपात का कहर: 15 दिनों में 30 से अधिक मौतें, 35 घायल; येलो अलर्ट जारी
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड में मानसून के साथ आकाशीय बिजली का प्रकोप जानलेवा बनता जा रहा है। 12 जून 2025 से 29 जून 2025 तक राज्य में वज्रपात की विभिन्न घटनाओं में 30 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 35 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं। यह आँकड़ा इस मानसून सीज़न में राज्य के लिए सबसे भयावह स्थिति को दर्शाता है।
ताज़ा घटनाक्रम
29 जून को रांची जिले के सोनाहातू में वॉच टावर का निरीक्षण कर रहे वनरक्षक रोशन श्रीवास्तव की वज्रपात से मौत हो गई, जबकि दो अन्य वनकर्मी झुलस गए। इसी दिन लोहरदगा में एक तीन वर्षीय बच्ची, रांची के बेड़ो में एक किसान, सिल्ली में एक नाबालिग और गढ़वा जिले के रंका में आम चुनने गए दो बच्चों की भी बिजली गिरने से जान चली गई।
पिछले सप्ताह की तबाही
24 से 26 जून के बीच चतरा, पलामू, जामताड़ा, कोडरमा, देवघर और लोहरदगा सहित विभिन्न जिलों में 12 लोगों की मौत हुई और करीब 18 लोग घायल हुए। लोहरदगा में दो अलग-अलग घटनाओं में दो महिलाओं की जान गई, जबकि 8 लोग गंभीर रूप से झुलस गए।
21 से 23 जून के बीच पश्चिमी सिंहभूम के टोकलो में फुटबॉल मैच के दौरान मैदान पर बिजली गिरने से दो खिलाड़ियों की मौत हो गई। खूंटी जिले के कर्रा में क्रिकेट खेल रहे युवकों पर वज्रपात से एक खिलाड़ी की मौत हुई और 11 अन्य घायल हो गए।
17 से 19 जून के बीच हजारीबाग, रामगढ़, पलामू, लोहरदगा, गोड्डा और पश्चिमी सिंहभूम में 8 लोगों की मौत दर्ज की गई। मानसून के प्रवेश के पहले 24 घंटों में ही रांची, गढ़वा, चतरा, गिरिडीह, जामताड़ा और सरायकेला-खरसावां में 8 लोगों की जान चली गई थी।
झारखंड क्यों है सबसे संवेदनशील
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड की भौगोलिक संरचना इसे वज्रपात के लिहाज़ से अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। पठारी भूभाग, घने जंगल, ऊँचे वृक्ष, खनिज संपदा और मानसून के दौरान गर्म व ठंडी हवाओं के टकराव से वातावरण में तेज़ी से विद्युत ऊर्जा विकसित होती है। रांची, गुमला, पलामू, बोकारो और पूर्वी सिंहभूम को राज्य के प्रमुख 'लाइटनिंग हॉटस्पॉट' माना जाता है।
क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल (CROPC) और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आँकड़ों के अनुसार, झारखंड में पिछले पाँच वर्षों में हर साल औसतन 4.36 लाख से अधिक बार आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएँ दर्ज की गई हैं। पिछले एक दशक में वज्रपात से राज्य में कम से कम 1,669 लोगों की मौत हो चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि दूरदराज के ग्रामीण इलाकों की कई घटनाएँ आधिकारिक रिकॉर्ड तक नहीं पहुँच पातीं।
सबसे अधिक प्रभावित कौन
वज्रपात से होने वाली मौतों में सबसे अधिक संख्या किसानों, खेतिहर मज़दूरों, मवेशी चराने वालों, महिलाओं और खुले स्थानों पर काम करने वाले लोगों की होती है। गौरतलब है कि मानसून के दौरान खेतों में काम करना और खुले मैदान में रहना इन समुदायों की आजीविका का अनिवार्य हिस्सा है, जो उन्हें सबसे बड़े जोखिम में डालता है।
सरकार और मौसम विभाग की चेतावनी
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने राज्य के अधिकांश जिलों के लिए येलो अलर्ट जारी करते हुए लोगों से गरज-चमक के दौरान खुले खेतों, पेड़ों, बिजली के खंभों और जलाशयों से दूर रहने की सलाह दी है। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने भी अपील की है कि मौसम खराब होने पर लोग सुरक्षित स्थान पर शरण लें और किसी भी स्थिति में खुले मैदान में न रुकें। मानसून अभी पूरे ज़ोर पर है और आने वाले हफ्तों में सतर्कता बेहद ज़रूरी है।