झारखंड के लातेहार में माता उग्रतारा मंदिर: जहां 9 नहीं, 16 दिनों की होती है नवरात्रि
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के लातेहार जिले में स्थित माता उग्रतारा मंदिर आदिशक्ति के उन दुर्लभ तीर्थस्थलों में से एक है, जहां नवरात्रि की परंपरागत 9 दिनों की सीमा नहीं मानी जाती — बल्कि यहां पूरे 16 दिनों तक दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। एनएच-99 पर चंदवा और बालूमाथ के बीच हरे-भरे पहाड़ों की तलहटी में बसा यह मंदिर आस्था, इतिहास और प्रकृति का अनूठा संगम है।
मंदिर की स्थिति और पहुँच
यह मंदिर चंदवा नगर से लगभग 10 किलोमीटर और लातेहार जिला मुख्यालय से करीब 37 किलोमीटर दूर स्थित है। रांची से यह दूरी लगभग 90 किलोमीटर है और मार्ग चंदवा-चतरा मुख्य सड़क से होकर जाता है। निकटतम रेलवे स्टेशन टोरी जंक्शन मंदिर से मात्र 10 किलोमीटर दूर है। चारों ओर फैली हरियाली, ऊँची पहाड़ियाँ और शांत वातावरण इस स्थान को धार्मिक पर्यटन के लिहाज़ से विशेष रूप से आकर्षक बनाते हैं।
मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
लोक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना का इतिहास टोरी क्षेत्र के शासक पिताम्बर नाथ शाही से जुड़ा है। कथा के अनुसार, एक बार शिकार के दौरान वे मांकरी गाँव पहुँचे और प्यास बुझाने के लिए जोड़ा तालाब पर रुके, जहाँ उन्हें माँ लक्ष्मी और माँ उग्रतारा की दो प्रतिमाएँ मिलीं। उल्लेखनीय है कि इससे कुछ दिन पूर्व उन्होंने इन्हीं प्रतिमाओं को स्वप्न में देखा था। इस दिव्य संकेत को ईश्वरीय इच्छा मानकर उन्होंने यहाँ मंदिर निर्माण का निर्णय लिया।
मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा रानी अहिल्याबाई होल्कर से संबंधित है। मान्यता है कि उन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाया और जाति-धर्म की सीमाओं से परे समाज के सभी वर्गों को यहाँ पूजा का समान अधिकार प्रदान किया। लातेहार जिला पोर्टल पर भी इस मंदिर की जानकारी उपलब्ध है, जो इसे आधिकारिक रूप से एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में मान्यता देता है।
16 दिनों की अनूठी नवरात्रि परंपरा
इस मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी 16 दिवसीय दुर्गा पूजा है, जो देशभर के अधिकांश मंदिरों की 9 दिनों की परंपरा से अलग है। यहाँ जितिया त्योहार के दूसरे दिन से दुर्गा पूजा का आरंभ होता है। पहले दिन कलश स्थापना के साथ अष्टभुजी माता की विशेष पूजा की जाती है और पूरे नवरात्रि काल में विशेष पूजन विधान का पालन किया जाता है।
पान और फूल से जुड़ी विशेष मान्यताएँ
16वें दिन विजयादशमी पर माँ को पान अर्पित किया जाता है। यहाँ की अनोखी मान्यता यह है कि जब यह पान आसन से गिर जाता है, तो इसे माँ की ओर से विसर्जन की अनुमति माना जाता है। कई बार पान देर रात तक नहीं गिरता और आरती का क्रम पूरी रात अनवरत चलता रहता है।
इसी प्रकार फूलों से जुड़ी एक और विशेष मान्यता प्रचलित है — भक्त मनोकामना पूर्ति की कामना लेकर फूल अर्पित करते हैं और यदि फूल शीघ्र गिर जाएँ, तो इसे माँ द्वारा मनोकामना स्वीकार किए जाने का शुभ संकेत माना जाता है।
धार्मिक पर्यटन का बढ़ता केंद्र
यह मंदिर न केवल झारखंड, बल्कि देशभर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यहाँ हिंदू धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मों के श्रद्धालु भी दर्शन के लिए आते हैं, जो इस स्थान की सर्वधर्म समभाव की विरासत को जीवंत रखता है। पहाड़ी परिवेश, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का यह संयोजन इसे एक उभरते धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है।