जम्मू-कश्मीर में वित्तीय अधिकारों का विकेंद्रीकरण: अधिकारियों को ₹60 करोड़ तक कॉन्ट्रैक्ट देने का अधिकार
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर सरकार ने 12 अगस्त 2026 को प्रशासनिक मंजूरी, तकनीकी मंजूरी और कॉन्ट्रैक्ट आवंटन से जुड़ी वित्तीय शक्तियों के वितरण में व्यापक बदलाव किए हैं, जिससे परियोजनाओं की मंजूरी प्रक्रिया तेज़ और विकेंद्रीकृत होगी। जम्मू-कश्मीर वित्त विभाग ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 की धारा 67 के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए ये संशोधन लागू किए हैं, जो 9 जनवरी 2020 की पुरानी अधिसूचना की संबंधित धाराओं की जगह लेंगे।
प्रशासनिक मंजूरी में बदलाव
नए प्रावधानों के अनुसार, प्रशासनिक विभाग अब ₹30 करोड़ तक के कार्यों को सीधे मंजूरी दे सकेंगे। हालाँकि, इसके लिए वित्त विभाग के संबंधित अधिकारी की सहमति अनिवार्य होगी। यह प्रावधान बड़े स्तर पर निर्णय-प्रक्रिया को तेज़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
तकनीकी मंजूरी की नई सीमाएँ
मूल कार्यों के विस्तृत अनुमानों — जिनमें विशेष मरम्मत, नवीनीकरण, अतिरिक्त निर्माण, संरचनात्मक बदलाव और सुधार शामिल हैं — के लिए तकनीकी मंजूरी की शक्तियाँ इस प्रकार निर्धारित की गई हैं:
सुपरिटेंडिंग इंजीनियर को ₹2 करोड़ तक, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को ₹75 लाख तक और असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को ₹10 लाख तक की तकनीकी मंजूरी का अधिकार दिया गया है। गौरतलब है कि ₹5 लाख और ₹20 लाख से अधिक लागत वाले कार्यों के प्लान और डिज़ाइन के लिए, सक्षम अधिकारी की तकनीकी स्वीकृति से पूर्व क्रमशः सुपरिटेंडिंग इंजीनियर और चीफ इंजीनियर से अनुमोदन लेना अनिवार्य होगा।
रखरखाव और मरम्मत कार्यों के लिए सुपरिटेंडिंग इंजीनियर को ₹7.50 लाख, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को ₹3.75 लाख और असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को ₹1 लाख तक की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
कॉन्ट्रैक्ट आवंटन में विस्तारित अधिकार
कॉन्ट्रैक्ट मंजूरी और आवंटन के मामले में भी वित्तीय शक्तियों का उल्लेखनीय विस्तार किया गया है। नई व्यवस्था के तहत विभागीय कॉन्ट्रैक्ट समिति को ₹60 करोड़ तक, चीफ इंजीनियर को ₹30 करोड़ तक, सुपरिटेंडिंग इंजीनियर को ₹10.50 करोड़ तक और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को ₹2.25 करोड़ तक के कॉन्ट्रैक्ट देने का अधिकार होगा।
आम जनता और विकास पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढाँचे के विकास को गति देना केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन की प्राथमिकता है। विकेंद्रीकृत वित्तीय अधिकारों से परियोजनाओं में होने वाली प्रशासनिक देरी में कमी आने की उम्मीद है, जो सड़क, भवन और सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण को सीधे प्रभावित करती है।
आगे की राह
नए नियम तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन बदलावों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जमीनी स्तर पर अधिकारी इन शक्तियों का उपयोग पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ करते हैं या नहीं। आने वाले महीनों में इन नियमों के क्रियान्वयन की समीक्षा यह तय करेगी कि विकेंद्रीकरण का यह प्रयोग वास्तव में परियोजनाओं की गति में बदलाव ला पाता है।