जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने PDD के 179 दैनिक वेतनभोगियों को SRO 520 का लाभ देने से किया इनकार
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने विद्युत विकास विभाग (PDD) के 179 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की अपीलें खारिज करते हुए उन्हें एसआरओ-520 (2017) के तहत नियमितीकरण का लाभ देने से इनकार कर दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव कुमार और जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी की डिवीजन बेंच ने शनिवार को यह फैसला सुनाया, जिसे रविवार को अपलोड किया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
इन कर्मचारियों ने कोर्ट में दावा किया था कि उन्हें 2012 और 2015 के बीच दैनिक दर पर काम पर रखा गया था — अर्थात 17 मार्च 2015 को जारी सरकारी आदेश संख्या 43-एफ द्वारा नए दैनिक वेतनभोगियों की भर्ती पर लगाई गई रोक से पहले। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनके नाम पहले विभागीय सूचियों में शामिल थे, लेकिन बाद में एसआरओ-520 के अंतर्गत नियमितीकरण हेतु तैयार की गई 472 पीडीएल/टीडीएल की अंतिम सूची से हटा दिए गए।
गौरतलब है कि सरकार ने 17 मार्च 2015 के आदेश के ज़रिए नए दैनिक वेतनभोगियों की नियुक्ति पर पूर्णतः रोक लगा दी थी। इसलिए नियमितीकरण नीति का लाभ पाने के लिए किसी भी कर्मचारी के लिए यह साबित करना अनिवार्य था कि उसे इस कटऑफ तारीख से पहले नियुक्त किया गया था।
कोर्ट का तर्क और फैसला
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल किसी प्रारंभिक या अनंतिम सूची में नाम शामिल होने से नियमितीकरण का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, 'अपील करने वालों का अधिकार साफ तौर पर इस बात पर निर्भर करता था कि वे यह साबित करें कि उन्हें 17 मार्च 2015 से पहले काम पर रखा गया था।'
कोर्ट ने यह भी माना कि मस्टर रोल और अन्य विभागीय अभिलेख सामान्यतः विभाग की अभिरक्षा में रहते हैं और हो सकता है कि वे कर्मचारियों को सहजता से उपलब्ध न हों — परंतु इससे साक्ष्य प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
सरकारी पक्ष की दलील
अतिरिक्त महाधिवक्ता शाहबाज़ सिकंदर ने कोर्ट को बताया कि जाँच समिति ने संबंधित विभागीय अभिलेखों की जाँच के बाद अपील करने वाले दैनिक वेतनभोगियों के विरुद्ध निष्कर्ष निकाला है। कोर्ट ने माना कि यह निष्कर्ष न तो मनमाना है और न ही अभिलेखों के विपरीत।
फैसले में दर्ज किया गया, 'एक बार जब प्रतिवादियों ने 17 मार्च 2015 से पहले काम पर रखे जाने के दावे पर विशेष रूप से सवाल उठाया, तो अपील करने वालों की यह जिम्मेदारी थी कि वे अपने दावे के समर्थन में कोई भरोसेमंद सबूत पेश करें। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया।'
निचली अदालत के फैसले पर मुहर
खंडपीठ ने रिट कोर्ट के दृष्टिकोण को सही ठहराते हुए कहा कि उसने मामले पर सही नज़रिए से विचार किया है और कानून या तथ्य की कोई ऐसी त्रुटि नहीं की जिसके लिए इन इंट्रा-कोर्ट अपीलों में हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। इसी आधार पर सभी अपीलें खारिज कर दी गईं और मैन्डमस का कोई आदेश जारी करने से इनकार किया गया।
आगे क्या
इस फैसले के बाद इन 179 कर्मचारियों के नियमितीकरण का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है। यदि वे उच्चतम न्यायालय में जाना चाहते हैं, तो उन्हें कटऑफ तारीख से पहले की नियुक्ति के ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। यह मामला जम्मू-कश्मीर में सरकारी विभागों में दैनिक वेतनभोगियों के नियमितीकरण की व्यापक बहस का हिस्सा है, जो वर्षों से न्यायालयों में विचाराधीन है।