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मिलेट्स से स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों की रक्षा संभव: उपराज्यपाल मनोज सिन्हा

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मिलेट्स से स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों की रक्षा संभव: उपराज्यपाल मनोज सिन्हा

सारांश

जम्मू के GMC में 'मिलेट्स फॉर हेल्थ' संगोष्ठी में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बाजरे को सिर्फ खाद्यान्न नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट और पर्यावरण क्षरण दोनों का एक साथ जवाब बताया — और किसानों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों से सामूहिक कार्रवाई की अपील की।

मुख्य बातें

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने GMC जम्मू में 'मिलेट्स फॉर हेल्थ' संगोष्ठी और SKUAST के मिलेट्स मिशन संवाद को संबोधित किया।
2018 की आईसीएमआर रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में देश की कुल मौतों का 61.8% गैर-संक्रामक रोगों के कारण हुआ, जो 1990 में 37.09% था।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 15-49 वर्ष आयु वर्ग के 11% महिलाओं और 15% पुरुषों में उच्च रक्तचाप दर्ज।
मिलेट्स में फाइबर, आयरन, कैल्शियम भरपूर; कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स से हृदय स्वास्थ्य और वजन प्रबंधन में सहायक।
उपराज्यपाल ने किसानों, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों से मिलेट्स को बढ़ावा देने की सामूहिक अपील की।

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 22 सितंबर 2026 को जम्मू के सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) में आयोजित 'मिलेट्स फॉर हेल्थ' संगोष्ठी को संबोधित करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रकृति का संदेश एकदम साफ है — यदि मानव जाति को पृथ्वी और स्वयं को बचाना है, तो प्राकृतिक सीमाओं का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। उन्होंने मिलेट्स को इस चुनौती का एक विश्वसनीय और टिकाऊ समाधान बताया। इससे पहले उन्होंने SKUAST जम्मू द्वारा आयोजित मिलेट्स मिशन पर एक राष्ट्रीय संवाद में भी भाग लिया।

संगोष्ठी का संदेश और व्यापक उद्देश्य

उपराज्यपाल सिन्हा ने GMC की इस संगोष्ठी को केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि पृथ्वी, जल, किसान परिवारों, गाँवों और प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य के प्रति साझा जिम्मेदारी की याद दिलाने वाला अवसर बताया। उन्होंने चिकित्सा जगत, वैज्ञानिकों, किसानों और आम नागरिकों से मिलेट्स को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का आग्रह किया।

उन्होंने रेखांकित किया कि बाजरा भारतीय सभ्यता जितना ही प्राचीन है। बाजरा, ज्वार, रागी, कोडो, कुटकी, कांगनी और सनवा जैसी मिलेट फसलें पीढ़ियों से उगाई जाती रही हैं, कठोर जलवायु में कम पानी से फलती-फूलती हैं और इन्हें न्यूनतम रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है।

गंभीर स्वास्थ्य आँकड़े और मिलेट्स की भूमिका

2018 की आईसीएमआर रिपोर्ट का हवाला देते हुए उपराज्यपाल ने बताया कि 2016 में देश में कुल मौतों का 61.8 प्रतिशत गैर-संक्रामक रोगों के कारण हुआ, जो 1990 में 37.09 प्रतिशत था। उन्होंने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के हवाले से बताया कि 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 11 प्रतिशत महिलाओं और 15 प्रतिशत पुरुषों में उच्च रक्तचाप दर्ज किया गया है।

सिन्हा ने कहा कि ये केवल चिकित्सीय समस्याएँ नहीं हैं — ये सीधे पारिवारिक आर्थिक स्थिति, सामाजिक जीवन और राष्ट्रीय उत्पादकता को प्रभावित करती हैं। उनके अनुसार पारंपरिक भोजन में बाजरे को अधिक स्थान देना रोग निवारण और स्वस्थ जीवनशैली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

मिलेट्स के पोषण गुण: शोध क्या कहता है

उपराज्यपाल ने बताया कि मिलेट्स फाइबर, आयरन, कैल्शियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। उन्होंने कहा कि अनेक शोध-पत्रों से पता चलता है कि मिलेट्स का ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम होता है और यह हृदय स्वास्थ्य, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण तथा वजन प्रबंधन में सहायक होता है। उन्होंने कहा, 'शोध अध्ययनों को देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि मिलेट्स व्यक्तिगत स्वास्थ्य की रक्षा से लेकर प्रकृति संरक्षण तक, संपूर्ण चक्र को प्रभावित करता है।'

किसानों, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों से अपील

उपराज्यपाल ने चर्चा से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने किसानों से फसलों में विविधता लाने, वैज्ञानिकों से अधिक उपज देने वाली और जलवायु-अनुकूल किस्में विकसित करने, तथा डॉक्टरों और पोषण विशेषज्ञों से संतुलित आहार में बाजरे की भूमिका के बारे में साक्ष्य-आधारित जागरूकता फैलाने का आग्रह किया।

उन्होंने जम्मू-कश्मीर के समस्त नागरिकों से अपील की कि वे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की जगह बाजरे जैसे पौष्टिक और संतुलित भोजन को प्राथमिकता दें। सिन्हा ने कहा, 'यदि हम सब मिलकर आगे बढ़ें, तो हम एक ऐसे जम्मू-कश्मीर का निर्माण कर सकते हैं जो खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करे, नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करे और जल, मिट्टी तथा पर्यावरण का संरक्षण करे।' यह संदेश ऐसे समय में आया है जब भारत में मोटे अनाज को बढ़ावा देने की राष्ट्रीय मुहिम तेज हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर में मिलेट्स की खेती और खपत बढ़ाने के लिए ठोस नीतिगत ढाँचा मौजूद है। आईसीएमआर के आँकड़े गंभीर हैं, लेकिन जागरूकता संगोष्ठियों से आगे बढ़कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बाजरे की हिस्सेदारी बढ़ाना ही असली बदलाव लाएगा। किसानों को उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाज़ार तक पहुँच मिले बिना, 'फसल विविधीकरण' की अपील कागज़ी रहेगी।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'मिलेट्स फॉर हेल्थ' संगोष्ठी क्या थी और कहाँ हुई?
यह संगोष्ठी जम्मू के सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) में आयोजित हुई, जिसे उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने संबोधित किया। इसका उद्देश्य चिकित्सा जगत, वैज्ञानिकों, किसानों और नागरिकों को मिलेट्स के स्वास्थ्य व पर्यावरणीय लाभों के प्रति जागरूक करना था।
उपराज्यपाल ने किन स्वास्थ्य आँकड़ों का हवाला दिया?
उन्होंने 2018 की आईसीएमआर रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 2016 में देश की 61.8% मौतें गैर-संक्रामक रोगों से हुईं, जो 1990 में 37.09% थीं। साथ ही राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 15-49 वर्ष आयु के 11% महिलाओं और 15% पुरुषों में उच्च रक्तचाप दर्ज किया गया।
मिलेट्स स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार फायदेमंद हैं?
शोध अध्ययनों के अनुसार मिलेट्स फाइबर, आयरन और कैल्शियम से भरपूर होते हैं और इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम होता है। ये हृदय स्वास्थ्य, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण और वजन प्रबंधन में सहायक माने जाते हैं।
उपराज्यपाल ने किसानों और वैज्ञानिकों से क्या अपील की?
उन्होंने किसानों से फसलों में विविधता लाने और मिलेट्स को अपनाने, वैज्ञानिकों से अधिक उपज देने वाली जलवायु-अनुकूल किस्में विकसित करने तथा डॉक्टरों व पोषण विशेषज्ञों से साक्ष्य-आधारित जागरूकता फैलाने का आग्रह किया।
जम्मू-कश्मीर में मिलेट्स को बढ़ावा देना क्यों ज़रूरी माना जा रहा है?
बाजरा, ज्वार और रागी जैसी मिलेट फसलें कम पानी और न्यूनतम रासायनिक उर्वरकों में कठोर जलवायु में भी उगती हैं, जो जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक परिस्थितियों के लिए उपयुक्त हैं। साथ ही ये खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुधार और पर्यावरण संरक्षण तीनों लक्ष्यों को एक साथ साधने में सहायक हैं।
राष्ट्र प्रेस
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