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एलजी मनोज सिन्हा का आह्वान: हिमालय में जलवायु लचीलेपन के लिए प्रकृति-आधारित समाधान अपनाएं

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एलजी मनोज सिन्हा का आह्वान: हिमालय में जलवायु लचीलेपन के लिए प्रकृति-आधारित समाधान अपनाएं

सारांश

एलजी मनोज सिन्हा ने IUST के मंच से स्पष्ट संदेश दिया — हिमालय को बचाना है तो प्रकृति को ही बुनियादी ढाँचा मानना होगा। पिछले साल जनवरी से अगस्त के बीच हर दिन एक आपदा और जम्मू-कश्मीर में बाढ़-तबाही के बीच यह आह्वान नीति से ज़्यादा ज़रूरत बन चुका है।

मुख्य बातें

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 3 अगस्त 2026 को IUST, श्रीनगर में जलवायु सम्मेलन को संबोधित किया।
पिछले वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच हिमालय में लगभग प्रतिदिन कोई न कोई प्राकृतिक आपदा दर्ज की गई।
जम्मू-कश्मीर में बाढ़ और बादल फटने से सड़कें, जलापूर्ति और बिजली फीडर बाधित हुए।
2020 में शुरू 'ग्रीन जम्मू-कश्मीर ड्राइव' से वन क्षेत्र लगभग 55% तक पहुँचा।
सिन्हा ने IUST में सिविल-मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्लॉक , लारमू कैंपस और लॉ स्कूल का उद्घाटन किया।
विश्वविद्यालयों से प्रकृति-आधारित समाधानों को बहु-विषयक पाठ्यक्रम के रूप में विकसित करने का आग्रह।

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 3 अगस्त 2026 को श्रीनगर में इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिमालयी क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बचाने के लिए प्रकृति-आधारित समाधानों (Nature-Based Solutions) को नीति और विकास-योजना के केंद्र में रखने का आग्रह किया। यह सम्मेलन हिमालयी क्षेत्र में जलवायु लचीलेपन और आजीविका को मजबूत करने पर केंद्रित था।

मुख्य घटनाक्रम

उपराज्यपाल सिन्हा ने IUST के मुख्य कैंपस में सिविल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्लॉक, लारमू कैंपस और लॉ स्कूल का उद्घाटन भी किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की 'ड्रग-फ्री जम्मू-कश्मीर' अभियान पर तैयार की गई पॉलिसी ब्रीफ की सराहना की और IUST को उसकी समग्र पहलों के लिए बधाई दी।

जलवायु संकट की गंभीरता

सिन्हा ने हिमालय में जलवायु परिवर्तन की तेज़ होती रफ्तार को रेखांकित करते हुए बताया कि पिछले वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच हिमालयी क्षेत्र में लगभग प्रतिदिन कोई न कोई प्राकृतिक आपदा दर्ज की गई। अकेले जम्मू-कश्मीर में अचानक आई बाढ़ और बादल फटने की घटनाओं ने सड़कों, जलापूर्ति योजनाओं और बिजली फीडरों सहित सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे को व्यापक नुकसान पहुँचाया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वाटरशेड बाढ़-नियंत्रण प्रणाली के रूप में काम करते हैं, वेटलैंड्स जलाशय का कार्य करते हैं, और घने जंगल पहाड़ी ढलानों को भूस्खलन से बचाते हैं — यानी प्रकृति स्वयं एक संरचनात्मक बुनियादी ढाँचा है।

सरकार की प्रतिक्रिया और दृष्टिकोण

सिन्हा ने कहा, 'जब हम इन प्राकृतिक प्रणालियों को नष्ट करते हैं तो हम भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे होते हैं, लेकिन जब हम उन्हें संरक्षित और बहाल करते हैं, तो हम एक उज्ज्वल भविष्य में निवेश कर रहे होते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि विकास और संरक्षण के बीच कोई विरोधाभास नहीं है — दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

2020 में शुरू किए गए 'ग्रीन जम्मू-कश्मीर ड्राइव' का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इस अभियान ने जम्मू-कश्मीर के वन क्षेत्र को लगभग 55 प्रतिशत तक बढ़ाने में योगदान दिया। यह पहल प्रकृति-आधारित नीति निर्माण का एक व्यावहारिक उदाहरण है।

विशेषज्ञों और विश्वविद्यालयों से अपील

उपराज्यपाल ने वैज्ञानिकों और विषय-विशेषज्ञों से आग्रह किया कि वे विकास-नियोजन में प्रकृति-आधारित समाधानों को प्राथमिकता दें। उन्होंने विश्वविद्यालयों से अनुरोध किया कि वे इस विषय को एक बहु-विषयक (Multi-Disciplinary) क्षेत्र के रूप में विकसित करें, जिसमें पारिस्थितिकी (Ecology), जल-विज्ञान (Hydrology), इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र, आपदा प्रबंधन और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत किया जाए।

आगे का विज़न

सिन्हा ने एक ऐसे हिमालय की परिकल्पना प्रस्तुत की जहाँ वाटरशेड स्वस्थ हों, वेटलैंड्स समृद्ध हों और नदियाँ प्राकृतिक रूप से प्रवाहित हों — जिससे जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत दोनों सुरक्षित रहें। उन्होंने कहा, 'हिमालय केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि एक जीवित विरासत है जिसके लिए दूरदर्शिता, धैर्य और जिम्मेदारी की आवश्यकता है।' आधुनिक तकनीक को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़कर और समुदायों को समान भागीदार बनाकर जलवायु-लचीलापन हासिल किया जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन सवाल यह है कि 'ग्रीन जम्मू-कश्मीर ड्राइव' के छह साल बाद भी बाढ़ और बादल फटने की घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं। वन क्षेत्र 55% तक पहुँचने का दावा और प्रतिदिन एक आपदा का वास्तव — ये दोनों एक साथ कैसे सच हो सकते हैं, इसका जवाब नीति-निर्माताओं को देना होगा। प्रकृति-आधारित समाधानों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की अपील सराहनीय है, परंतु जब तक इन्हें बजट आवंटन और जवाबदेही ढाँचे से नहीं जोड़ा जाता, यह विमर्श सम्मेलन कक्षों तक ही सीमित रहेगा।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एलजी मनोज सिन्हा ने IUST सम्मेलन में क्या कहा?
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 3 अगस्त 2026 को IUST, श्रीनगर में हिमालयी क्षेत्र में जलवायु लचीलेपन के लिए प्रकृति-आधारित समाधानों को विकास-नीति के केंद्र में रखने का आह्वान किया। उन्होंने वाटरशेड, वेटलैंड्स और जंगलों को प्राकृतिक बुनियादी ढाँचे के रूप में संरक्षित करने पर जोर दिया।
हिमालय में जलवायु परिवर्तन की स्थिति कितनी गंभीर है?
एलजी सिन्हा के अनुसार, पिछले वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच हिमालयी क्षेत्र में लगभग प्रतिदिन कोई न कोई प्राकृतिक आपदा आई। अकेले जम्मू-कश्मीर में अचानक बाढ़ और बादल फटने से सड़कें, जलापूर्ति और बिजली फीडर बाधित हुए।
ग्रीन जम्मू-कश्मीर ड्राइव क्या है और इसका क्या असर हुआ?
'ग्रीन जम्मू-कश्मीर ड्राइव' 2020 में शुरू किया गया एक पर्यावरण अभियान है, जिसने जम्मू-कश्मीर के वन क्षेत्र को लगभग 55 प्रतिशत तक बढ़ाने में योगदान दिया। यह अभियान टिकाऊ जीवन शैली और प्रकृति-संरक्षण को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
IUST में किन सुविधाओं का उद्घाटन हुआ?
एलजी सिन्हा ने IUST के मुख्य कैंपस में सिविल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्लॉक, लारमू कैंपस और लॉ स्कूल का उद्घाटन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की 'ड्रग-फ्री जम्मू-कश्मीर' अभियान पर तैयार पॉलिसी ब्रीफ की भी सराहना की।
प्रकृति-आधारित समाधानों में कौन-से विषय शामिल हैं?
एलजी सिन्हा ने विश्वविद्यालयों से आग्रह किया कि वे प्रकृति-आधारित समाधानों को एक बहु-विषयक क्षेत्र के रूप में विकसित करें। इसमें पारिस्थितिकी, जल-विज्ञान, इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र, आपदा प्रबंधन और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने की बात कही गई।
राष्ट्र प्रेस
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