नेपाल त्रासदी हमारे लिए चेतावनी: मीरवाइज उमर फारूक ने जामा मस्जिद से पर्यावरण संरक्षण का आह्वान किया
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने 28 अगस्त 2026 को श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में शुक्रवार के उपदेश के दौरान नेपाल की विनाशकारी त्रासदी को पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी करार दिया। उन्होंने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच टिकाऊ संतुलन बनाने की तत्काल ज़रूरत पर ज़ोर दिया और कहा कि ये घटनाएँ अलग-थलग नहीं, बल्कि एक बड़े पारिस्थितिक संकट की अभिव्यक्ति हैं।
नेपाल त्रासदी और हिमालयी इकोसिस्टम की नाज़ुकता
नौहट्टा इलाके की जामा मस्जिद से संबोधित करते हुए मीरवाइज ने कहा, "ये इस बात की चेतावनी हैं कि ग्लेशियरों के ढहने से हमारे पहाड़ी इकोसिस्टम कितने कमज़ोर हो गए हैं।" उन्होंने नेपाल में जान गँवाने वालों के लिए प्रार्थना की और लापता लोगों की सुरक्षा एवं प्रभावित परिवारों को राहत मिलने की कामना की। उनके अनुसार, पूरा हिमालयी क्षेत्र एक ही पारिस्थितिक श्रृंखला का हिस्सा है और किसी एक कोने में हुई तबाही को बाकी हिस्सों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर में बढ़ते पर्यावरणीय खतरे
मीरवाइज ने रेखांकित किया कि जम्मू-कश्मीर भी उसी नाज़ुक हिमालयी पट्टी का अंग है। उन्होंने कहा, "हम पहले से ही तेज़ बारिश, बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएँ देख रहे हैं।" उन्होंने स्वीकार किया कि जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारण है, लेकिन साथ ही यह भी पूछा कि क्या विकास का मौजूदा तरीका स्थिति को और अधिक खतरनाक बना रहा है। सड़कों के लिए पहाड़ों की कटाई और ब्लास्टिंग, पेड़ों की कटाई, पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में होटल व इमारतों का निर्माण, और जल-प्रवाह मार्गों में रुकावट — इन सभी को उन्होंने गहरी चिंता का विषय बताया।
डल झील: लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण
डल झील का विशेष उल्लेख करते हुए मीरवाइज ने कहा, "हमें यह समझने के लिए बस अपनी डल झील की हालत देखनी होगी कि लंबे समय तक कब्ज़ा, निर्माण और पर्यावरण की अनदेखी कैसे एक कीमती प्राकृतिक सिस्टम को नुकसान पहुँचा सकती है। यह दिन-ब-दिन सिकुड़ रही है जबकि हम दूसरी तरफ देख रहे हैं।" उन्होंने वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) पर हो रहे अतिक्रमण को भी उतना ही गंभीर खतरा बताया। उनके शब्दों में, "वेटलैंड्स बेकार ज़मीन नहीं हैं; वे प्राकृतिक बफर हैं जो अतिरिक्त पानी को सोखते हैं और इंसानी बस्तियों की रक्षा करते हैं।"
धार्मिक और नैतिक दायित्व
पवित्र कुरान का हवाला देते हुए मीरवाइज ने कहा, "और ज़मीन को ठीक-ठाक करने के बाद उस पर फसाद (बर्बादी) न फैलाओ।" उन्होंने इसे सामूहिक ज़िम्मेदारी का गंभीर मामला बताया। उन्होंने अधिकारियों, योजनाकारों, व्यापारियों और नागरिकों — सभी से अपील की कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बुनियादी ढाँचे और पर्यटन विकास के दीर्घकालिक नतीजों को गंभीरता से समझें।
आगे की राह: संतुलन और सावधानी
मीरवाइज ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण की रक्षा करना आज महज़ संरक्षणवाद नहीं, बल्कि "लोगों की जान, घरों और हमारे बच्चों के भविष्य की रक्षा" का प्रश्न है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पहाड़ों, जंगलों, वेटलैंड्स और जल-स्रोतों के प्राकृतिक संतुलन को इसी तरह बिगाड़ा जाता रहा, तो भविष्य में ऐसे परिणाम सामने आ सकते हैं जिन्हें पलटना संभव न हो। नेपाल की त्रासदी से सबक लेते हुए तत्काल नीतिगत और सामाजिक बदलाव की ज़रूरत है।