21 अगस्त 2026
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मीरवाइज उमर फारूक का श्रीनगर जामा मस्जिद में खुतबा: 'मिंबर हमेशा लोगों के अधिकारों की आवाज रहा'

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मीरवाइज उमर फारूक का श्रीनगर जामा मस्जिद में खुतबा: 'मिंबर हमेशा लोगों के अधिकारों की आवाज रहा'

सारांश

करीब दो सप्ताह की पाबंदी के बाद मीरवाइज उमर फारूक श्रीनगर की जामा मस्जिद के मिंबर पर लौटे और कहा कि यह ऐतिहासिक मंच पीढ़ियों से लोगों के अधिकारों की आवाज़ रहा है। उन्होंने पाबंदियों को 'राज्य की नीति' का हिस्सा बताते हुए धैर्य और संवाद का आह्वान किया।

मुख्य बातें

मीरवाइज उमर फारूक ने 21 अगस्त 2026 को श्रीनगर की जामा मस्जिद में करीब दो सप्ताह की पाबंदी के बाद जुमे का खुतबा दिया।
पाबंदी के दौरान उन्हें जामा मस्जिद में खुतबा देने और नक्शबंद साहिब में 'ख्वाजा दिगर' सभा को संबोधित करने से रोका गया था।
मीरवाइज ने पाबंदियों को 'मिंबर की आवाज़ दबाने की कोशिश' और 'राज्य की नीति का हिस्सा' बताया।
उन्होंने कहा कि जामा मस्जिद का मिंबर पीढ़ियों से लोगों के अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता का केंद्र रहा है।
मीरवाइज ने इस विरासत को अपने पूर्वजों की धरोहर और जम्मू-कश्मीर के लोगों की साझी संपत्ति बताया।

जम्मू-कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने 21 अगस्त 2026 को श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में जुमे का खुतबा (शुक्रवार का उपदेश) दिया और कहा कि यह मिंबर पीढ़ियों से लोगों के अधिकारों की आवाज़ बनता आया है। करीब दो सप्ताह की पाबंदियों के बाद श्रद्धालुओं के बीच लौटे मीरवाइज ने इस अवसर को 'अल्लाह की नेमत' बताया।

मुख्य घटनाक्रम

मीरवाइज के अनुसार, पाबंदी की अवधि के दौरान उन्हें जामा मस्जिद में जुमे का खुतबा देने से रोका गया था और नक्शबंद साहिब में 'ख्वाजा दिगर' की सभा को संबोधित करने का मौका भी नहीं दिया गया था। उन्होंने कहा कि पाबंदियाँ और 'मिंबर की आवाज़ दबाने की कोशिशें, दुर्भाग्य से, अभी राज्य की नीति का हिस्सा' लगती हैं।

मिंबर की ऐतिहासिक भूमिका

मीरवाइज ने रेखांकित किया कि इस मिंबर ने पीढ़ियों से समाज को धार्मिक और नैतिक आधार पर ढालने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि इसने लोगों में न केवल उनके अधिकारों, बल्कि उनके कर्तव्यों के प्रति भी जागरूकता पैदा की है। उनके शब्दों में, जब भी ज़रूरत पड़ी, यह मंच लोगों की चिंताओं को सामने रखने और उनकी आकांक्षाओं की वकालत करने के लिए खड़ा रहा।

शांति और सह-अस्तित्व पर ज़ोर

मीरवाइज ने कहा कि इस मिंबर से जो संदेश दिया जाता रहा है, वह हमेशा इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप — शांतिपूर्ण, सिद्धांतों पर आधारित और गरिमापूर्ण — रहा है। उन्होंने बताया कि इस मंच ने समुदायों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए भी मज़बूती से आवाज़ उठाई है। टकराव के बजाय बातचीत और व्यक्तिगत मुद्दों के बजाय असल मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना इस मंच की पहचान रही है।

विरासत और आगे की राह

मीरवाइज ने कहा, 'इंशाअल्लाह, जब भी मौका मिलेगा, यह ऐसा ही करता रहेगा। यह मेरे पूर्वजों की विरासत है और जम्मू-कश्मीर के लोगों की साझी धरोहर है।' उन्होंने इस समय को धैर्य रखने और जैसे भी हो सके, अच्छे काम जारी रखने का समय बताया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में धार्मिक सभाओं और सार्वजनिक उपदेशों पर पाबंदियों को लेकर बहस जारी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि जम्मू-कश्मीर में धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक संवाद की सीमाओं पर एक सुविचारित टिप्पणी है। पाबंदियों को 'राज्य की नीति' कहना एक गंभीर आरोप है, जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती है। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से धार्मिक सभाओं पर पाबंदियों का सिलसिला बार-बार सामने आता रहा है, और मीरवाइज की वापसी इस तनाव का एक और अध्याय है। असली सवाल यह है कि संवाद और शांति की वकालत करने वाले एक धार्मिक नेता को बार-बार रोकने से क्या हासिल होता है — और इसकी कीमत विश्वास-निर्माण की प्रक्रिया को चुकानी पड़ती है।
RashtraPress
21 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मीरवाइज उमर फारूक कौन हैं और जामा मस्जिद में उनकी क्या भूमिका है?
मीरवाइज उमर फारूक जम्मू-कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु हैं और श्रीनगर की जामा मस्जिद के प्रमुख धार्मिक नेता हैं। वे पीढ़ियों पुरानी मीरवाइज परंपरा के वाहक हैं और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
मीरवाइज को जामा मस्जिद में खुतबा देने से क्यों रोका गया था?
मीरवाइज के अनुसार, करीब दो सप्ताह की पाबंदी के दौरान उन्हें जामा मस्जिद में जुमे का खुतबा देने और नक्शबंद साहिब में 'ख्वाजा दिगर' की सभा को संबोधित करने से रोका गया। उन्होंने इसे 'मिंबर की आवाज़ दबाने की कोशिश' बताया, हालाँकि अधिकारियों की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
जामा मस्जिद का मिंबर ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
श्रीनगर की जामा मस्जिद का मिंबर सदियों से कश्मीर में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का केंद्र रहा है। मीरवाइज के अनुसार, इस मंच ने पीढ़ियों से लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया है और अल्पसंख्यकों सहित सभी समुदायों के लिए आवाज़ उठाई है।
मीरवाइज ने खुतबे में किस संदेश पर ज़ोर दिया?
मीरवाइज ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, संवाद और धैर्य पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि इस मिंबर की गतिविधियाँ हमेशा इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप — टकराव के बजाय बातचीत और व्यक्तिगत मुद्दों के बजाय असल मुद्दों पर केंद्रित — रही हैं।
जम्मू-कश्मीर में धार्मिक सभाओं पर पाबंदियों की स्थिति क्या है?
जम्मू-कश्मीर में समय-समय पर धार्मिक और सार्वजनिक सभाओं पर पाबंदियाँ लगाई जाती रही हैं, विशेषकर संवेदनशील अवसरों पर। मीरवाइज का यह मामला इस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसे आलोचक धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश मानते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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