मीरवाइज उमर फारूक का श्रीनगर जामा मस्जिद में खुतबा: 'मिंबर हमेशा लोगों के अधिकारों की आवाज रहा'
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने 21 अगस्त 2026 को श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में जुमे का खुतबा (शुक्रवार का उपदेश) दिया और कहा कि यह मिंबर पीढ़ियों से लोगों के अधिकारों की आवाज़ बनता आया है। करीब दो सप्ताह की पाबंदियों के बाद श्रद्धालुओं के बीच लौटे मीरवाइज ने इस अवसर को 'अल्लाह की नेमत' बताया।
मुख्य घटनाक्रम
मीरवाइज के अनुसार, पाबंदी की अवधि के दौरान उन्हें जामा मस्जिद में जुमे का खुतबा देने से रोका गया था और नक्शबंद साहिब में 'ख्वाजा दिगर' की सभा को संबोधित करने का मौका भी नहीं दिया गया था। उन्होंने कहा कि पाबंदियाँ और 'मिंबर की आवाज़ दबाने की कोशिशें, दुर्भाग्य से, अभी राज्य की नीति का हिस्सा' लगती हैं।
मिंबर की ऐतिहासिक भूमिका
मीरवाइज ने रेखांकित किया कि इस मिंबर ने पीढ़ियों से समाज को धार्मिक और नैतिक आधार पर ढालने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि इसने लोगों में न केवल उनके अधिकारों, बल्कि उनके कर्तव्यों के प्रति भी जागरूकता पैदा की है। उनके शब्दों में, जब भी ज़रूरत पड़ी, यह मंच लोगों की चिंताओं को सामने रखने और उनकी आकांक्षाओं की वकालत करने के लिए खड़ा रहा।
शांति और सह-अस्तित्व पर ज़ोर
मीरवाइज ने कहा कि इस मिंबर से जो संदेश दिया जाता रहा है, वह हमेशा इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप — शांतिपूर्ण, सिद्धांतों पर आधारित और गरिमापूर्ण — रहा है। उन्होंने बताया कि इस मंच ने समुदायों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए भी मज़बूती से आवाज़ उठाई है। टकराव के बजाय बातचीत और व्यक्तिगत मुद्दों के बजाय असल मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना इस मंच की पहचान रही है।
विरासत और आगे की राह
मीरवाइज ने कहा, 'इंशाअल्लाह, जब भी मौका मिलेगा, यह ऐसा ही करता रहेगा। यह मेरे पूर्वजों की विरासत है और जम्मू-कश्मीर के लोगों की साझी धरोहर है।' उन्होंने इस समय को धैर्य रखने और जैसे भी हो सके, अच्छे काम जारी रखने का समय बताया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में धार्मिक सभाओं और सार्वजनिक उपदेशों पर पाबंदियों को लेकर बहस जारी है।