जंतर-मंतर प्रदर्शन पर मीरवाइज की शर्तें: अनुच्छेद 370 बहाली और राजनीतिक कैदियों की रिहाई भी एजेंडे में हो
सारांश
मुख्य बातें
मीरवाइज उमर फारूक ने 10 जुलाई को श्रीनगर की जामिया मस्जिद में शुक्रवार की नमाज के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रस्तावित जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कई अहम शर्तें रख दीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की बहाली का यह आंदोलन केवल राज्य का दर्जा वापस दिलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
मीरवाइज की प्रमुख शर्तें
मीरवाइज ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला से निमंत्रण मिलने की उन्होंने पुष्टि की और कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के हक के लिए कोई भी नेक प्रयास स्वागत योग्य है। हालाँकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि इस आंदोलन के एजेंडे में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए की बहाली, संवैधानिक सुरक्षा उपायों का संरक्षण, राजनीतिक कैदियों के अधिकार, बिना मुकदमे के या जमानत के बावजूद हिरासत में रखे गए युवाओं की रिहाई और कश्मीर संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान भी शामिल होना चाहिए।
नेशनल कॉन्फ्रेंस का जंतर-मंतर धरना: पृष्ठभूमि
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने संसद के आगामी मानसून सत्र के पहले दिन नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने देश के 52 प्रमुख राजनीतिक नेताओं, जम्मू-कश्मीर के विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के सदस्यों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण भेजा है। मीरवाइज को भी यह औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था।
डॉ. फारूक अब्दुल्ला का पत्र और दिए गए तर्क
डॉ. अब्दुल्ला ने अपने निमंत्रण पत्र में कहा कि वे यह अपील केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के दीर्घ अनुभव के आधार पर कर रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाए जाने, जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने और राज्य का दर्जा समाप्त किए जाने के समय केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट आश्वासन दिया था कि उचित समय पर राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने इन आश्वासनों पर भरोसा करते हुए किसी भी आंदोलन की राह छोड़ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिया। वर्ष 2024 में शांतिपूर्ण विधानसभा चुनाव हुए और जनता ने अपना जनादेश दिया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में निर्वाचित सरकार कार्यरत है, परंतु राज्य का दर्जा अभी तक बहाल नहीं किया गया है।
राजनीतिक महत्व और व्यापक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है और जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक स्थिति एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। गौरतलब है कि मीरवाइज की शर्तें नेशनल कॉन्फ्रेंस के मूल एजेंडे से कहीं आगे जाती हैं, जो मुख्यतः स्टेटहुड बहाली पर केंद्रित है। यह देखना अहम होगा कि उमर अब्दुल्ला सरकार इन शर्तों पर किस हद तक सहमति जताती है और क्या मीरवाइज अंततः जंतर-मंतर प्रदर्शन में शरीक होते हैं।