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कजरी तीज 2026: पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश में श्रद्धा व लोक परंपराओं के साथ मना पर्व

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कजरी तीज 2026: पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश में श्रद्धा व लोक परंपराओं के साथ मना पर्व

सारांश

उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में कजरी तीज सिर्फ एक त्योहार नहीं — यह लोक संस्कृति, सामूहिक श्रद्धा और पीढ़ियों के बीच सेतु है। काशी से लेकर गाँव-गाँव तक सोलह श्रृंगार, मेहंदी और रतजगे की परंपरा ने इस बार भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा।

मुख्य बातें

31 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में कजरी तीज उत्साह व श्रद्धा के साथ मनाई गई।
काशी की महिलाओं में विशेष उमंग देखी गई; एक रात पहले रतजगा और जलेबा खाने की परंपरा निभाई गई।
महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखा और समूह में लोकगीत गाए।
गणेश चतुर्थी का निर्जला व्रत पुत्र की कुशलता के लिए रखा जाता है; शाम की पूजा के बाद जल से व्रत खोला जाता है।
यह पर्व पूर्वांचल की लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सांस्कृतिक माध्यम माना जाता है।

उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का पर्व उत्साह, विश्वास और गहरी श्रद्धा के साथ मनाया गया। काशी की महिलाओं में इस त्योहार को लेकर विशेष उमंग देखने को मिली, जहाँ रात भर लोकगीतों की गूँज और परंपराओं का जीवंत उत्सव छाया रहा।

रतजगा और सोलह श्रृंगार की रही धूम

कजरी तीज से एक रात पहले महिलाओं ने रतजगा किया, जलेबा खाया और पारंपरिक लोकगीत गाए। पर्व के दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार करके सजीं, हाथों में मेहंदी लगाई और समूह में गाने-बजाने के कार्यक्रम आयोजित किए। यह व्रत पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ रखा जाता है।

लोक परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम

स्वर्णिमा शर्मा ने बताया कि कजरी तीज पूर्वांचल और बिहार की साझी सांस्कृतिक धरोहर है। उन्होंने कहा, 'इस त्योहार में लोकगीत और परंपराओं के माध्यम से ग्रामीण जीवनशैली का सुंदर चित्रण किया जाता है।' उनके अनुसार यह पर्व नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने और रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है।

गणेश चतुर्थी व्रत का भी विशेष महत्व

स्वर्णिमा शर्मा ने गणेश चतुर्थी के संदर्भ में बताया कि यह व्रत मुख्यतः माताएँ अपने बच्चों — विशेषकर पुत्रों — की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखती हैं। जिन माताओं के पुत्र नहीं हैं, वे भी गणेश जी की पूजा कर पुत्र रत्न की प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं। गणेश चतुर्थी का व्रत पूर्णतः निर्जला होता है और शाम की पूजा के बाद जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।

महिलाओं की आवाज़: तीज और गणेश चतुर्थी दोनों अहम

श्वेता शर्मा ने कहा कि कजरी तीज महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। उन्होंने बताया, 'यह पर्व पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए मनाया जाता है, जबकि गणेश चतुर्थी का व्रत पुत्र की कुशलता के लिए।' उनके अनुसार दोनों व्रत मिलकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक बन जाते हैं। यह पर्व पूर्वांचल की लोक संस्कृति को जीवित रखने की एक सामूहिक कोशिश के रूप में हर वर्ष और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान के वाहक हैं। शहरीकरण की तेज़ रफ्तार में जब लोक परंपराएँ हाशिये पर जाती दिखती हैं, तब काशी जैसे शहरों में इस उत्साह का बने रहना उल्लेखनीय है। हालाँकि यह भी देखने वाली बात है कि इन परंपराओं की व्याख्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदल रही है — नई पीढ़ी इन्हें सांस्कृतिक विरासत के रूप में अपना रही है, न कि केवल धार्मिक कर्तव्य के रूप में, जो इन त्योहारों की दीर्घायु के लिए शुभ संकेत है।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कजरी तीज क्या है और यह कब मनाई जाती है?
कजरी तीज पूर्वांचल, उत्तर प्रदेश और बिहार का एक प्रमुख लोक पर्व है, जो भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएँ पति की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं और लोकगीत गाती हैं।
कजरी तीज में कौन-कौन सी परंपराएँ निभाई जाती हैं?
कजरी तीज में महिलाएँ एक रात पहले रतजगा करती हैं, जलेबा खाती हैं और लोकगीत गाती हैं। पर्व के दिन सोलह श्रृंगार, मेहंदी और सामूहिक गाने-बजाने के कार्यक्रम प्रमुख परंपराएँ हैं।
कजरी तीज का पूर्वांचल की संस्कृति में क्या महत्व है?
यह पर्व पूर्वांचल की लोक परंपराओं, ग्रामीण जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम है। लोकगीतों के ज़रिये नई पीढ़ी को रीति-रिवाजों से जोड़ा जाता है।
गणेश चतुर्थी का व्रत कजरी तीज से कैसे अलग है?
कजरी तीज का व्रत पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है, जबकि गणेश चतुर्थी का निर्जला व्रत माताएँ पुत्र की कुशलता और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखती हैं। गणेश चतुर्थी में शाम की पूजा के बाद जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।
2026 में कजरी तीज कहाँ-कहाँ मनाई गई?
31 अगस्त 2026 को कजरी तीज पूरे उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में मनाई गई। काशी (वाराणसी) में विशेष उत्साह देखा गया, जहाँ महिलाओं ने सामूहिक रूप से लोक परंपराएँ निभाईं।
राष्ट्र प्रेस
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