वट सावित्री व्रत 2026: दिल्ली से बिहार तक बरगद की पूजा, सुहागिनों ने माँगी पतियों की लंबी उम्र

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वट सावित्री व्रत 2026: दिल्ली से बिहार तक बरगद की पूजा, सुहागिनों ने माँगी पतियों की लंबी उम्र

सारांश

वट सावित्री व्रत पर 16 मई को दिल्ली के तुगलकाबाद मंदिर से लेकर बिहार के बांका तक — देशभर की सुहागिन महिलाओं ने बरगद की परिक्रमा की, कलावा बाँधा और सावित्री की अटूट आस्था को जीया। यह पर्व सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री-शक्ति और पारिवारिक बंधन का जीवंत उत्सव है।

मुख्य बातें

वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 को देशभर में मनाया गया, सुहागिन महिलाओं ने बरगद की पूजा कर पतियों की दीर्घायु माँगी।
नई दिल्ली के तुगलकाबाद शिव प्राचीन मंदिर और श्री राधा कृष्ण मंदिर में सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।
प्रयागराज में महिलाओं ने सामूहिक रूप से वट वृक्ष की परिक्रमा की और कलावा बाँधा।
बिहार के नालंदा और बांका जिलों में गाँव-गाँव सामूहिक पूजा और कथा-पाठ का आयोजन हुआ।
व्रत में पूजा थाली में रोली, कुमकुम, अक्षत, भीगे काले चने, फल और सुहाग सामग्री शामिल होती है।
यह व्रत सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री ने यमराज से पति का जीवन वापस पाया था।

वट सावित्री व्रत के अवसर पर 16 मई 2026 को देशभर की सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा और आस्था के साथ बरगद के वृक्ष की पूजा की तथा अपने पतियों की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना की। नई दिल्ली, प्रयागराज, नालंदा और बांका सहित देश के कोने-कोने में मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर भक्तिमय माहौल छाया रहा।

दिल्ली में उत्साह और श्रद्धा का संगम

नई दिल्ली के तुगलकाबाद शिव प्राचीन मंदिर और श्री राधा कृष्ण मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर पूजा थाल लेकर पहुँचीं और विधिपूर्वक वट वृक्ष की अर्चना की। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन की गूँज के बीच भक्ति का वातावरण सुबह से शाम तक बना रहा।

व्रत का धार्मिक महत्व और पूजा विधि

एक श्रद्धालु महिला ने बताया कि यह व्रत सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से जुड़ा है — जिसमें सावित्री ने अपने अटूट प्रेम और दृढ़ निश्चय से यमराज से अपने पति का जीवन वापस प्राप्त किया था। इसीलिए सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत विशेष महत्व रखता है। वट वृक्ष को स्थिरता, दीर्घायु और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसकी पूजा इस व्रत का केंद्र है।

पूजा में महिलाएं थाली में रोली, कुमकुम, अक्षत, भीगे काले चने, फल, मिठाई और सुहाग सामग्री लेकर आती हैं। वे बरगद के पेड़ के चारों ओर कच्चे सूत (कलावा) लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा का पाठ करती हैं।

प्रयागराज में सामूहिक पूजा का आयोजन

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में भी व्रत को लेकर विशेष उत्साह देखा गया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से बरगद के पेड़ की पूजा की, कलावा बाँधा और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। यह ऐसे समय में आया है जब पूरे उत्तर भारत में ज्येष्ठ मास के धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा सदियों से जीवित है।

बिहार में गाँव-गाँव गूँजी आस्था की धुन

बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ में महिलाओं ने सामूहिक रूप से वट वृक्ष की पूजा की। बांका जिले में भी गाँव-गाँव और मंदिरों में महिलाओं ने बरगद की परिक्रमा कर पूरे श्रद्धाभाव से व्रत का पालन किया। कई स्थानों पर सामूहिक कथा-पाठ का आयोजन हुआ, जहाँ महिलाओं ने मिलकर व्रत की विधि पूर्ण की और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ दीं।

परंपरा और आधुनिकता का सेतु

गौरतलब है कि वट सावित्री व्रत उत्तर और पूर्वी भारत में ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र और गुजरात में यह पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष देश के विभिन्न राज्यों में महिलाओं की सहभागिता और सामूहिक आयोजनों ने इस पर्व को और भव्य रूप दिया। आने वाले वर्षों में भी यह पर्व भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की जड़ों को मज़बूत करता रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका सामाजिक आयाम अधिक गहरा है — यह उन महिलाओं की सामूहिक अभिव्यक्ति है जो सार्वजनिक स्थलों पर एकजुट होकर अपनी परंपरा को जीवित रखती हैं। गौरतलब है कि शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के बावजूद इस व्रत की लोकप्रियता घटी नहीं है — बल्कि सामूहिक आयोजनों की संख्या बढ़ी है। यह भारतीय सांस्कृतिक पहचान की उस मज़बूती का प्रमाण है जो आधुनिकता के साथ-साथ चलती है, न कि उसके विरुद्ध।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वट सावित्री व्रत 2026 कब मनाया गया?
वट सावित्री व्रत 2026 में 16 मई को मनाया गया। यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को उत्तर और पूर्वी भारत में मनाया जाता है।
वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा क्यों की जाती है?
वट वृक्ष को स्थिरता, दीर्घायु और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन महिलाएं इसकी परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटती हैं और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि क्या है?
महिलाएं पूजा थाली में रोली, कुमकुम, अक्षत, भीगे काले चने, फल, मिठाई और सुहाग सामग्री लेकर आती हैं। वे बरगद के पेड़ के चारों ओर कलावा लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा का पाठ करती हैं।
वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व क्या है?
यह व्रत सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री ने अपने अटूट प्रेम से यमराज से पति का जीवन वापस पाया था। इसीलिए यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
2026 में वट सावित्री व्रत कहाँ-कहाँ मनाया गया?
इस वर्ष वट सावित्री व्रत दिल्ली के तुगलकाबाद और श्री राधा कृष्ण मंदिर, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, और बिहार के नालंदा व बांका जिलों सहित देशभर में मनाया गया। कई स्थानों पर सामूहिक पूजा और कथा-पाठ का आयोजन हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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