12 जुलाई 2026
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कल्पेश पटेल की प्राकृतिक खेती: ₹10-12 लाख सालाना आय, 73 किलो का केला गुच्छा — देश के लिए 'रोल मॉडल'

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कल्पेश पटेल की प्राकृतिक खेती: ₹10-12 लाख सालाना आय, 73 किलो का केला गुच्छा — देश के लिए 'रोल मॉडल'

सारांश

पिता की कैंसर से मृत्यु ने सूरत के कल्पेश पटेल को रासायनिक खेती छोड़ने पर मजबूर किया। 2019 से शुरू हुई प्राकृतिक खेती की यात्रा में आज वे साढ़े तीन बीघा में 50 से अधिक केला किस्में उगाकर सालाना ₹10-12 लाख कमा रहे हैं — और केंद्रीय कृषि मंत्री तक उनकी तारीफ कर चुके हैं।

मुख्य बातें

कल्पेश पटेल ने 2019 में पिता रमणभाई पटेल की कैंसर से मृत्यु के बाद रासायनिक खाद पूरी तरह छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाई।
साढ़े तीन बीघा जमीन पर केले की 50 से अधिक किस्में उगाई जाती हैं; सालाना आय ₹10 से 12 लाख ।
वर्ष 2025 में केले के एक गुच्छे का वजन 73 किलो — सामान्य औसत 20-30 किलो से कहीं अधिक।
प्राकृतिक खेती से प्रति बीघा ₹15,000-₹20,000 का रासायनिक खाद और कीटनाशक खर्च समाप्त हुआ।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कल्पेश से वार्तालाप कर उनकी सफलता सोशल मीडिया पर साझा की।
कल्पेश सूरत के वेसू कृषि बाज़ार में बिक्री करते हैं और अन्य राज्यों को पार्सल से उत्पाद भेजते हैं।

गुजरात के सूरत जिले की ओलपाड तहसील के सरस गाँव के किसान कल्पेश पटेल ने 2019 में रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों को पूरी तरह छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाई और आज साढ़े तीन बीघा जमीन पर केले की खेती से सालाना ₹10 से 12 लाख की आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी इस यात्रा की शुरुआत एक व्यक्तिगत त्रासदी से हुई — पिता रमणभाई पटेल की कैंसर से मृत्यु ने उन्हें रासायनिक कृषि के खतरों के प्रति सचेत किया और जीवन की दिशा बदल दी।

पिता की मृत्यु से बदली जीवन की राह

कल्पेश पटेल मूलतः सूरत स्थित एक फैक्ट्री में केमिकल ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं। उनके पिता रमणभाई पटेल खेती में अत्यधिक कीटनाशकों का उपयोग करते थे। कल्पेश ने बताया, "जब मेरे पिताजी को कैंसर हुआ, तभी मेरे मन में यह विचार आया कि अब रासायनिक खाद के जहर से मुक्त होना पड़ेगा और धरती माता को भी इस जहर से मुक्त करना है।" उन्होंने कहा कि उनके पिता खेत में इतनी कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कते थे कि उनके पूरे शरीर से उस दवा की दुर्गंध आती थी। पिता के निधन के बाद कल्पेश ने संकल्प लिया कि वे अपने खेत में कभी रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

प्रशिक्षण और 'जंगल मॉडल' की अपनाई राह

गुजरात सरकार के कृषि विभाग द्वारा दिए जाने वाले प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण में भाग लेकर कल्पेश ने जीवामृत बनाना सीखा। उन्होंने 'जंगल मॉडल' भी अपनाया और 'मेरा माल, मेरा भाव' के सिद्धांत पर खेती तथा उपज की बिक्री शुरू की। विरासत में मिली करीब आठ बीघा जमीन में से साढ़े तीन बीघा पर उन्होंने केले की 50 से अधिक किस्में उगाई हैं — जिनमें पूवन, आधापुरी, रस्थली, लाल केळ, ब्लू जावा, बरराई, महालक्ष्मी और इलायची केला शामिल हैं।

रिकॉर्ड उत्पादन और आर्थिक फायदा

वर्ष 2025 में कल्पेश के खेत में केले के एक गुच्छे का वजन 73 किलो दर्ज किया गया, जबकि सामान्यतः एक गुच्छे का वजन 20 से 30 किलो होता है। उनके खेत में केले के गुच्छे का औसत वजन 30 किलो से अधिक रहता है। प्राकृतिक खेती अपनाने से प्रति बीघा ₹15,000 से ₹20,000 का रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों का खर्च बंद हो गया है, और मिट्टी की सेहत सुधरने से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यदि कच्चे केले नहीं बिक पाते, तो वे उनसे वेफर और पाउडर जैसे उत्पाद बनाकर वैल्यू एडिशन करते हैं।

सरकारी समर्थन और बाज़ार तक पहुँच

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य में प्राकृतिक खेती को नई गति मिली है। राज्यपाल आचार्य देवव्रत गाँव-गाँव जाकर किसानों को प्राकृतिक कृषि की ओर प्रेरित कर रहे हैं। गुजरात सरकार ने विभिन्न शहरों में प्राकृतिक कृषि बाज़ार स्थापित किए हैं, जहाँ किसान अपने उत्पाद सीधे बेच सकते हैं। कल्पेश सूरत के वेसू स्थित कृषि बाज़ार में केला और अन्य उत्पाद बेचते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी देश के किसानों से रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील कर चुके हैं।

राष्ट्रीय पहचान और केंद्रीय मंत्री की सराहना

कल्पेश पटेल की सफलता की कहानी अब देश भर में फैल चुकी है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनसे वार्तालाप किया और उनकी सफलता को अपने सोशल मीडिया पर साझा किया। कल्पेश को अन्य राज्यों से भी ऑर्डर मिलते हैं, जिन्हें वे पार्सल के माध्यम से भेजते हैं। यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि प्राकृतिक खेती न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि किसान की आर्थिक समृद्धि के लिए भी एक व्यावहारिक विकल्प है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है — जब एक केमिकल ऑपरेटर अपने खेत में रासायनिक खाद छोड़ सकता है, तो नीति-निर्माता उन लाखों किसानों को यह विकल्प क्यों नहीं दे पाए जो सब्सिडी-आधारित रासायनिक खेती के जाल में फँसे हैं? गुजरात के प्राकृतिक कृषि बाज़ार और सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम सही दिशा में हैं, परंतु जब तक रासायनिक खाद सब्सिडी ढाँचा बना रहेगा, तब तक प्राकृतिक खेती 'रोल मॉडल' की कहानियों तक ही सीमित रहने का जोखिम है — नीतिगत बदलाव नहीं।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कल्पेश पटेल ने प्राकृतिक खेती कब और क्यों अपनाई?
कल्पेश पटेल ने 2019 में प्राकृतिक खेती शुरू की, जब उनके पिता रमणभाई पटेल की कैंसर से मृत्यु हो गई। पिता के अत्यधिक कीटनाशक उपयोग और उसके स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव को देखकर उन्होंने रासायनिक खाद पूरी तरह छोड़ने का संकल्प लिया।
कल्पेश पटेल की प्राकृतिक खेती से कितनी आय होती है?
साढ़े तीन बीघा जमीन पर केले की खेती से कल्पेश पटेल को सालाना ₹10 से 12 लाख की आय होती है। इसके अलावा प्रति बीघा ₹15,000-₹20,000 का रासायनिक खाद और कीटनाशक खर्च भी बचता है।
कल्पेश पटेल के खेत में 73 किलो के केले के गुच्छे का क्या रहस्य है?
वर्ष 2025 में कल्पेश के खेत में केले का एक गुच्छा 73 किलो का दर्ज किया गया, जबकि सामान्यतः यह 20-30 किलो होता है। वे इसका श्रेय जीवामृत आधारित प्राकृतिक खेती और 'जंगल मॉडल' को देते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
गुजरात सरकार प्राकृतिक खेती के लिए किसानों को क्या सहायता देती है?
गुजरात सरकार के कृषि विभाग द्वारा जीवामृत निर्माण सहित प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा विभिन्न शहरों में प्राकृतिक कृषि बाज़ार स्थापित किए गए हैं जहाँ किसान अपने उत्पाद सीधे बेच सकते हैं। राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी गाँव-गाँव जाकर किसानों को जागरूक कर रहे हैं।
केंद्रीय कृषि मंत्री ने कल्पेश पटेल को क्यों सराहा?
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कल्पेश पटेल से सीधे वार्तालाप किया और उनकी प्राकृतिक खेती की सफलता को अपने सोशल मीडिया पर साझा किया। यह इस बात का संकेत है कि कल्पेश की कहानी राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के सरकारी अभियान के लिए एक आदर्श उदाहरण बन गई है।
राष्ट्र प्रेस
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