संविधान में समानता का संकल्प, पर ज़मीनी हकीकत का आकलन ज़रूरी: उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने 4 जुलाई 2026 को तुमकुरु के शेट्टिहल्ली स्थित एक लॉ कॉलेज के दीक्षांत समारोह में कहा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना समानता के आदर्श को केंद्र में रखती है, लेकिन समाज और कानूनी व्यवस्था में यह समानता किस हद तक साकार हुई है — इसका गंभीर और ईमानदार मूल्यांकन अपरिहार्य है। उन्होंने नए कानून स्नातकों से आग्रह किया कि वे अपने पेशे को महज आजीविका का साधन नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना का माध्यम मानें।
साक्षरता से संविधान तक: भारत की यात्रा
परमेश्वर ने स्वतंत्रता के बाद से देश की प्रगति का उल्लेख करते हुए बताया कि आज़ादी के समय भारत की साक्षरता दर मात्र लगभग 12 प्रतिशत थी, जो आज बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गई है। उन्होंने इस उपलब्धि को लोकतांत्रिक संस्थाओं की मज़बूती का प्रमाण बताया।
उन्होंने डॉ. बी. आर. अंबेडकर के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को एक सुदृढ़ संवैधानिक ढाँचा दिया, जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। उनके शब्दों में, 'अगर संविधान कमज़ोर होता है तो लोकतंत्र भी कमज़ोर हो जाएगा।' उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में निहित मूल्यों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
अधिकार और कर्तव्य: दोनों पक्षों की समझ ज़रूरी
उपमुख्यमंत्री ने संविधान के अनुच्छेद 12 से 35 का संदर्भ देते हुए मौलिक अधिकारों की व्याख्या की और अनुच्छेद 51ए के तहत नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि लोकतंत्र तभी प्रभावशाली ढंग से कार्य कर सकता है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों के प्रति भी सजग हों।
कानूनी पेशे में उत्कृष्टता की दरकार
परमेश्वर ने बताया कि भारत में 1,500 से अधिक लॉ कॉलेज हैं जो प्रतिवर्ष हज़ारों स्नातक तैयार करते हैं। इसके बावजूद अदालतों में लंबित मामलों की बड़ी संख्या न्यायिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में मुवक्किल बार-बार उन्हीं चुनिंदा वकीलों पर भरोसा करते हैं जिन्होंने गहरे कानूनी ज्ञान और प्रभावी वकालत से जनता का विश्वास अर्जित किया है।
उन्होंने युवा वकीलों को प्रेरित किया कि निरंतर अध्ययन और समर्पण के ज़रिए वे भी उसी स्तर की विशेषज्ञता हासिल कर सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कानूनी सेवाओं की माँग तेज़ी से बढ़ रही है और वैश्विक मंचों पर भारतीय कानूनी विशेषज्ञों की उपस्थिति भी विस्तृत हो रही है।
साइबर अपराध: उभरती चुनौती
परमेश्वर ने चेतावनी दी कि साइबर अपराध एक गंभीर और बढ़ती हुई चुनौती के रूप में सामने आया है। उन्होंने इस क्षेत्र में कानूनों को और सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि डिजिटल युग में नागरिकों को प्रभावी कानूनी सुरक्षा मिल सके। गौरतलब है कि भारत वैश्विक कानूनी क्षेत्र में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है और भारतीय कानूनी विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
आगे चलकर नए स्नातकों की भूमिका न केवल अदालती कमरों तक सीमित रहेगी, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को समाज की अंतिम पंक्ति तक पहुँचाने में भी निर्णायक होगी।