मैसूर दशहरा में 'कंबाला' शामिल करने का प्रस्ताव: शाही परिवार और BJP का कड़ा विरोध, CM शिवकुमार बोले — सबसे चर्चा होगी
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक सरकार द्वारा प्रतिष्ठित मैसूर दशहरा-2026 समारोह में तटीय कर्नाटक के पारंपरिक भैंस दौड़ खेल 'कंबाला' को शामिल करने के प्रस्ताव ने राजनीतिक और सांस्कृतिक विवाद खड़ा कर दिया है। मैसूर के शाही परिवार, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं और कई सामाजिक संगठनों ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया है, जबकि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा है कि अंतिम निर्णय सभी पक्षों से विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा।
विवाद की पृष्ठभूमि
राज्य सरकार ने घोषणा की है कि सूखे जैसी परिस्थितियों के बावजूद इस वर्ष 'नादा हब्बा दशहरा-2026' का आयोजन 11 दिनों तक भव्य रूप से किया जाएगा। इसी क्रम में उत्सव को नया आयाम देने के लिए कंबाला को समारोह में जोड़ने का प्रस्ताव सामने आया। गौरतलब है कि 'कांतारा चैप्टर-1' फिल्म की व्यापक सफलता के बाद यह तटीय परंपरा पूरे देश में चर्चा में आई है। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि इस लोकप्रियता को दशहरा जैसे ऐतिहासिक उत्सव पर थोपना उचित नहीं है।
शाही परिवार का विरोध
मैसूर के शाही परिवार के सदस्य और BJP सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार ने उच्चस्तरीय समिति की बैठक में ही इस प्रस्ताव का विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा, "दशहरा की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है, जबकि कंबाला एक अलग परंपरा है। मैसूर के लोगों की भावनाएं भी यही कहती हैं। दशहरा के दौरान कंबाला का आयोजन उनकी इच्छा के खिलाफ होगा।"
यदुवीर ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध कंबाला खेल के प्रति नहीं, बल्कि उसे दशहरा के मंच पर लाने की कोशिश के प्रति है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने बार-बार जनता की भावनाओं को नजरअंदाज किया है। कांग्रेस विधायक अशोक राय द्वारा इस प्रस्ताव का समर्थन किए जाने की खबरों पर वाडियार ने कहा कि विधायक ने इस विषय पर उनसे कोई चर्चा नहीं की।
BJP नेताओं की प्रतिक्रिया
BJP के पूर्व सांसद प्रताप सिम्हा ने भी सरकार को आगाह किया कि मैसूर के शाही परिवार की भावनाओं के विरुद्ध कोई निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दशहरा एक पारंपरिक और सांस्कृतिक पर्व है, इसलिए इसकी परंपराओं और रीति-रिवाजों का सम्मान अनिवार्य है।
पास सिस्टम पर भी उठे सवाल
यदुवीर ने कंबाला विवाद के साथ-साथ सरकार से दशहरा कार्यक्रमों की 'पास व्यवस्था' समाप्त करने की भी अपील की। उनका कहना था, "लोग समारोह का आनंद लेने से ज्यादा पास हासिल करने में लग जाते हैं। दशहरा को सिर्फ भव्य नहीं, बल्कि उसकी परंपराओं और उद्देश्य के अनुरूप मनाया जाना चाहिए।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसानों और आम जनता को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री का रुख
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इस विवाद पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि सरकार सभी सुझावों पर गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने कहा, "हम राज्य की सभी परंपराओं और रीति-रिवाजों को ध्यान में रखकर फैसला करेंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर के गायकों के कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं और हिंदू परंपराओं के अनुसार उत्सव मनाने जैसे सुझाव भी मिले हैं। यह फैसला अकेले डीके शिवकुमार नहीं लेंगे।" यह ऐसे समय में आया है जब मैसूर दशहरा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने की कोशिशें चल रही हैं, जिससे इसकी पारंपरिक शुद्धता का सवाल और संवेदनशील हो जाता है।