कश्मीरी पंडितों को धमकी पर BJP-कांग्रेस आमने-सामने, राम मंदिर CEO नियुक्ति पर भी सियासत
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को कथित तौर पर आतंकियों की ओर से मिल रही धमकियों और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला के स्टेटहुड संबंधी बयान पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। 3 सितंबर को जम्मू में दोनों दलों के नेताओं ने अलग-अलग मोर्चों पर एक-दूसरे के रुख को चुनौती दी।
कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा और स्टेटहुड — दो अलग मुद्दे
BJP नेता रविंदर रैना ने फारूक अब्दुल्ला के बयान को 'गैर-जिम्मेदाराना' करार दिया। रैना ने स्पष्ट किया कि कश्मीरी पंडितों को कथित तौर पर आतंकियों की ओर से धमकी भरे पत्र और संदेश मिले हैं, जो एक गंभीर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का मामला है। उन्होंने कहा कि इसे जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि स्टेटहुड पर चर्चा का उचित मंच संसद है।
रैना ने 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की त्रासदी को याद दिलाते हुए कहा कि घाटी में उनकी सम्मानजनक वापसी के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, उन्हें धमकियों से कमज़ोर नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस की चिंता — राजनीतिकरण पर सवाल
जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को 'बेहद महत्वपूर्ण' बताया और माना कि सरकार को पार्टी द्वारा विधानसभा में दिए गए सुझावों पर अभी तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। कर्रा ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर में जब भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील घटनाएं होती हैं, तो उनके समय और परिस्थितियों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने आरोप लगाया कि अलग-अलग पक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
राम मंदिर CEO नियुक्ति — समर्थन और सवाल
राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किए जाने पर रविंदर रैना ने पूरा समर्थन जताया। रैना ने कहा कि ट्रस्ट ने विधिवत प्रक्रिया के बाद यह नियुक्ति की है और मिश्रा ने भारतीय वायुसेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ संभाली हैं। उन्होंने इस नियुक्ति पर राजनीतिक बयानबाजी को अनुचित बताया।
कर्रा ने कहा कि उन्होंने जितेंद्र मिश्रा का नाम पहली बार सुना है और उनके पेशेवर अनुभव पर उन्हें कोई संदेह नहीं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनकी विश्वसनीयता और संभावित राजनीतिक संबंधों को लेकर स्पष्टता ज़रूरी है। कर्रा ने यह भी सवाल उठाया कि धार्मिक संस्था के प्रबंधन के लिए इतने वरिष्ठ सैन्य अधिकारी को लाना कितना उपयुक्त है।
कर्रा ने राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के पुराने आरोपों का भी उल्लेख किया और जवाबदेही की माँग की। उन्होंने कहा कि केवल अधिकारियों को बदलने से पुराने मामलों की जिम्मेदारी तय नहीं होती — निष्पक्ष जाँच और दोषियों की पहचान आवश्यक है।
यासीन मलिक और सिंधु जल संधि पर भी तीखे बोल
यासीन मलिक की ओर से सरला भट्ट मामले में मुकदमे से अलग किए जाने और मृत्युदंड की माँग संबंधी बयान पर रैना ने कहा कि यह मामला पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत चलेगा। उन्होंने कहा कि मलिक ने पूर्व में आतंकवादी गतिविधियों और सरला भट्ट की हत्या से जुड़े होने की बात स्वीकार की है और किसी की व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया नहीं बदली जा सकती।
सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की बातचीत की अपील को रैना ने सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जो देश एक तरफ भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोपों का सामना कर रहा हो, वह दूसरी तरफ पानी के बँटवारे की बात नहीं कर सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का रास्ता नहीं छोड़ता, तब तक द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत के गंभीर सवाल बने रहेंगे।
गौरतलब है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी और उनकी सुरक्षा का मुद्दा वर्षों से राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है, और 3 सितंबर की यह बयानबाजी इस संवेदनशील विषय पर दोनों प्रमुख दलों के बीच गहरे मतभेद को एक बार फिर उजागर करती है।