कश्मीरी पंडितों को धमकी पर सियासत गरम: पीडीपी ने मांगी आरोपियों की पहचान, कांग्रेस-सीपीआई ने उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने 3 सितंबर को केंद्र सरकार से माँग की कि कश्मीरी पंडितों को हाल ही में मिली धमकियों के पीछे जो लोग या एजेंसियाँ हैं, उनकी तत्काल पहचान की जाए। यह माँग उन दो पत्रों के कुछ दिन बाद आई है जो कथित तौर पर यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूसीएल) ने जारी किए थे और जिनमें कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाते हुए उनकी निजी जानकारी उजागर की गई थी। वहीं, कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने इन धमकियों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए और आशंका जताई कि इनका इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए किया जा सकता है।
पीडीपी की माँग और रुख
पीडीपी प्रवक्ता मोहम्मद इकबाल ट्रैम्बू ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग, राजनीतिक दल और नेता सभी कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास चाहते हैं। उन्होंने कहा, 'अगर इसमें कोई बाधा है, तो उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमें यह पता लगाना होगा कि वे कौन लोग या एजेंसियाँ हैं जो उनकी वापसी को रोक रही हैं, क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर के लिए खतरनाक है।' पीडीपी का यह बयान घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के कई दशकों बाद आया है और पुनर्वास की राह में आ रही बाधाओं को उजागर करता है।
कांग्रेस और सीपीआई के सवाल
सीपीआई सांसद पी. संतोष कुमार ने कहा कि सबसे पहले यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि ये धमकियाँ असली हैं या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया, 'अगर ये धमकियाँ असली हैं, तो हम कश्मीरी पंडितों और कश्मीर के हर नागरिक के साथ हैं। कश्मीरी भी पूरी तरह से भारतीय हैं। लेकिन इसकी ठीक से जाँच होनी चाहिए।'
कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा ने आरोप लगाया कि ऐसी धमकियों के ज़रिए एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है जिससे केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस न दे सके। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर संघीय ढाँचे पर हमला करने का भी आरोप लगाया। कांग्रेस सांसद मनोज कुमार ने कहा कि इस मुद्दे को बार-बार राजनीतिक फायदे के लिए उठाया जाता है, जो 'बहुत दुर्भाग्यपूर्ण' है।
भाजपा का पलटवार
जम्मू-कश्मीर भाजपा के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का रुख 'नरम अलगाववाद' वाला है और वे 'किसी न किसी तरह पाकिस्तान को क्लीन चिट दे रहे हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीरी पंडितों को चौथी बार मिल रही धमकियाँ बेहद गंभीर मामला हैं और यह एजेंसियों तथा समुदाय, दोनों के लिए चिंता का विषय है। गौरतलब है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने पहले यह सवाल उठाया था कि कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकी भरे पत्र क्यों मिल रहे हैं, जबकि घाटी में तैनात वरिष्ठ हिंदू अधिकारियों को ऐसे पत्र नहीं मिले।
समुदाय की पीड़ा
कश्मीरी पंडित भूषण लाल ने समुदाय के साथ हो रहे व्यवहार पर गहरी पीड़ा जताई। उन्होंने कहा, 'ऐसा लगता है जैसे हमें एक तरफ से दूसरी तरफ लात मारी जा सकती है — हमारे साथ फुटबॉल जैसा बर्ताव हो रहा है।' उन्होंने सवाल किया, 'हम इसी जगह के रहने वाले हैं। हमें हर रोज़ यहाँ से चले जाने के नोटिस क्यों मिलते हैं? क्या कश्मीरी पंडित होना ही हमारी एकमात्र गलती है?' भूषण लाल ने यह भी कहा कि अपनी ही ज़मीन से विस्थापित हुए उन्हें 36 साल बीत चुके हैं।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग ज़ोर पकड़ रही है और कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है। कथित धमकी पत्रों की जाँच और उनके पीछे के तत्वों की पहचान अब सभी दलों की साझा माँग बनती दिख रही है, भले ही उनके राजनीतिक निहितार्थों पर मतभेद बने हुए हों। यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन इस मामले में क्या ठोस कार्रवाई करते हैं।