29 अगस्त 2026
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लश्कर की धमकियों से कश्मीरी पंडित कर्मचारी दहशत में, बोले — '90 का दौर नहीं लौटने देंगे'

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लश्कर की धमकियों से कश्मीरी पंडित कर्मचारी दहशत में, बोले — '90 का दौर नहीं लौटने देंगे'

सारांश

लश्कर-ए-तैयबा के धमकी पत्रों में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की निजी जानकारी — नाम, फोन, तस्वीरें तक। अगस्त में तीन बार मिली धमकियों ने 1990 के पलायन की यादें ताज़ा कर दी हैं। समुदाय का संकल्प है — '90 का दौर नहीं लौटने देंगे।'

मुख्य बातें

लश्कर-ए-तैयबा ने प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीर घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकी भरे पत्र भेजे।
अगस्त में तीन बार धमकियाँ मिलीं — पहले सप्ताह में, फिर 23 अगस्त और 25 अगस्त को।
पत्रों में कर्मचारियों के नाम, मोबाइल नंबर, तस्वीरें और वाहन विवरण होने की बात सामने आई है।
समुदाय ने कर्मचारियों पर RSS व BJP एजेंडे के आरोपों को नकारा; कहा — रोज़गार के लिए गए हैं, राजनीति के लिए नहीं।
कॉमेडियन समय रैना के शो में शेरोन वर्मा की कश्मीरी पंडित विस्थापन पर कथित टिप्पणी पर भी समुदाय ने आपत्ति जताई।
समुदाय ने माँग की कि सरकार पर्याप्त सुरक्षा दे, अन्यथा घाटी में व्यापक पुनर्वास की संभावना प्रभावित होगी।

कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की ओर से धमकी भरे पत्र मिलने की खबरों ने सुरक्षा एजेंसियों और समुदाय दोनों की चिंता बढ़ा दी है। 29 अगस्त को सामने आई इन रिपोर्टों के अनुसार धमकी पत्रों में कर्मचारियों के नाम, मोबाइल नंबर, तस्वीरें और वाहनों का रंग व नंबर तक दर्ज होने की बात कही जा रही है — जो सुरक्षा चूक की ओर इशारा करता है।

एक महीने में तीन बार मिली धमकियाँ

कश्मीरी पंडित समुदाय के एक व्यक्ति ने बताया कि यह कोई पहली घटना नहीं है। अगस्त के पहले सप्ताह में एक धमकी सामने आई, इसके बाद 23 अगस्त को और फिर 25 अगस्त को भी धमकी पत्र मिले। उन्होंने कहा, 'एक ही महीने में बार-बार इस तरह के पत्र सामने आना गंभीर चिंता का विषय है।' उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि इतनी व्यक्तिगत जानकारी धमकी देने वालों तक कैसे पहुँची — यह पता लगाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती है।

1990 के दशक की यादें और वर्तमान डर

1990 के दशक में आतंक और हिंसा के माहौल के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। उस दौर की यादें आज भी समुदाय के मन में ताज़ा हैं। समुदाय के प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि घाटी में काम करने गए कर्मचारी किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि रोज़गार और परिवार के भरण-पोषण के लिए वहाँ हैं। उन्होंने कहा, 'देश के प्रति हमारा विश्वास और भारतीय होने का गर्व किसी राजनीतिक संगठन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।'

सरकार पर सुरक्षा का दबाव

समुदाय के प्रतिनिधि ने चेतावनी दी कि यदि सरकार प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पाती, तो भविष्य में घाटी में समुदाय की व्यापक वापसी और पुनर्वास पर भी सवाल खड़े होंगे। धमकी पत्रों में कर्मचारियों पर आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एजेंडे पर काम करने का आरोप लगाया गया है, जिसे समुदाय ने सिरे से नकारा है। उनके अनुसार, 'यह राजनीतिक या वैचारिक ठप्पा लगाना भी डर पैदा करने की रणनीति का हिस्सा है।'

समय रैना के शो पर विवाद और समुदाय की प्रतिक्रिया

इसी बीच, कॉमेडियन समय रैना के शो 'इंडियाज गॉट लेटेंट 2' के एक एपिसोड में कश्मीरी पंडितों को लेकर कथित तौर पर की गई टिप्पणी ने भी समुदाय को आहत किया है। एपिसोड में शेरोन वर्मा ने समय रैना के बिहारी पृष्ठभूमि वाले मज़ाक के जवाब में कहा, 'कम से कम, मैंने अपनी मर्जी से अपना राज्य छोड़ा।' इस टिप्पणी पर समुदाय के प्रतिनिधि ने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपना घर छोड़ा हो, उसके दर्द को बाहर से समझना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर किसी ने आपत्तिजनक टिप्पणी की है तो उसे अपने शब्दों पर विचार करना चाहिए और माफी माँगनी चाहिए।

संघर्ष और पुनर्निर्माण की गाथा

समुदाय के प्रतिनिधि ने याद दिलाया कि 1990 के दशक में घाटी छोड़ने वाले परिवारों के पास न स्थायी छत थी, न पर्याप्त आर्थिक साधन। फिर भी उन्होंने विभिन्न राज्यों में कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। आज उन्हीं परिवारों की अगली पीढ़ी डॉक्टर, इंजीनियर और बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर है। उन्होंने कहा, 'अगर एक चिड़िया का घोंसला भी टूट जाए तो वह बेचैन हो जाती है — कश्मीरी पंडितों ने अपने घर, संपत्ति और जड़ों से दूर होने का दर्द झेला है।' समुदाय ने स्पष्ट किया है कि केवल धमकियों के कारण वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

फोन, तस्वीरें, वाहन विवरण — यह महज आतंकी प्रचार नहीं, बल्कि सूचना-रिसाव की गंभीर संभावना की ओर इशारा करता है जिसकी जाँच ज़रूरी है। प्रधानमंत्री पैकेज की मूल भावना कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी और पुनर्वास थी, लेकिन बार-बार मिलती धमकियाँ और अपर्याप्त सुरक्षा उस वादे को खोखला करती हैं। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूकती है, वह यह है कि इन कर्मचारियों की सुरक्षा विफलता केवल एक समुदाय का नहीं, बल्कि सरकार की कश्मीर नीति की विश्वसनीयता का सवाल है।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को किसने और कैसी धमकियाँ दी हैं?
आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की ओर से धमकी भरे पत्र भेजे गए हैं जिनमें कर्मचारियों के नाम, मोबाइल नंबर, तस्वीरें और वाहन विवरण होने की बात कही जा रही है। अगस्त में तीन अलग-अलग मौकों पर — पहले सप्ताह, 23 अगस्त और 25 अगस्त को — ये पत्र सामने आए।
प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीरी पंडित कर्मचारी क्यों घाटी में हैं?
प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कश्मीरी पंडितों को घाटी में सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं ताकि उनकी क्रमिक वापसी और पुनर्वास हो सके। ये कर्मचारी रोज़गार और परिवार के भरण-पोषण के लिए वहाँ गए हैं, न कि किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
धमकी पत्रों में दर्ज व्यक्तिगत जानकारी — नाम, फोन नंबर, तस्वीरें और वाहन विवरण — इतनी विस्तृत है कि यह पता लगाना ज़रूरी हो गया है कि यह जानकारी धमकी देने वालों तक कैसे पहुँची। यह सूचना-रिसाव की संभावना की जाँच सुरक्षा एजेंसियों की प्राथमिकता होनी चाहिए।
समय रैना के शो 'इंडियाज गॉट लेटेंट 2' का कश्मीरी पंडितों से क्या संबंध है?
शो के एक एपिसोड में शेरोन वर्मा ने कथित तौर पर कहा, 'कम से कम, मैंने अपनी मर्जी से अपना राज्य छोड़ा' — जिसे कश्मीरी पंडित समुदाय ने अपने दर्दनाक विस्थापन का मज़ाक उड़ाने के रूप में लिया। समुदाय ने माँग की है कि टिप्पणी करने वाले माफी माँगें।
इन धमकियों का कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर क्या असर पड़ सकता है?
समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि सरकार पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पाई, तो भविष्य में घाटी में व्यापक पुनर्वास की संभावना पर सवाल खड़े होंगे। हालाँकि समुदाय ने स्पष्ट किया है कि वे केवल धमकियों के कारण पीछे नहीं हटेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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