18 अगस्त 2026
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दिल्ली हाई कोर्ट का केजरीवाल, सिसोदिया समेत 6 AAP नेताओं को अवमानना नोटिस, 4 अगस्त को अगली सुनवाई

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दिल्ली हाई कोर्ट का केजरीवाल, सिसोदिया समेत 6 AAP नेताओं को अवमानना नोटिस, 4 अगस्त को अगली सुनवाई

सारांश

दिल्ली हाई कोर्ट ने आबकारी नीति से जुड़े अवमानना मामले में केजरीवाल, सिसोदिया समेत 6 AAP नेताओं को नोटिस थमाया। अदालत का आरोप है कि न्यायपालिका को बदनाम करने का सुनियोजित अभियान चलाया गया। अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।

मुख्य बातें

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 19 मई 2026 को आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल , मनीष सिसोदिया , संजय सिंह , सौरभ भारद्वाज , विनय मिश्रा और दुर्गेश पाठक को अवमानना नोटिस जारी किया।
सभी नेताओं को चार सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करना होगा; अगली सुनवाई 4 अगस्त को।
सुनवाई के दौरान कोई भी नेता अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।
अदालत ने रजिस्ट्री को सोशल मीडिया रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और उन्हें कोर्ट रिकॉर्ड में शामिल करने का निर्देश दिया।
14 मई को आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू हुई थी; न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने बाद में मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया।
न्यायालय ने इस मामले में एक एमिकस क्यूरी नियुक्त करने का निर्णय लिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 19 मई 2026 को आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, सांसद संजय सिंह, पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज, विनय मिश्रा और दुर्गेश पाठक को आपराधिक अवमानना के मामले में औपचारिक नोटिस जारी किया। अदालत ने सभी छह नेताओं को चार सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित की है।

मुख्य घटनाक्रम

मंगलवार की सुनवाई के दौरान इनमें से कोई भी नेता अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने रजिस्ट्री को स्पष्ट निर्देश दिया कि इस मामले से जुड़े सोशल मीडिया के सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं और उन्हें कोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए। साथ ही, न्यायालय ने इस जटिल मामले में सहायता के लिए एक एमिकस क्यूरी नियुक्त करने का भी निर्णय लिया।

अवमानना कार्यवाही की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 14 मई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन नेताओं के विरुद्ध आपराधिक अवमानना की कार्यवाही आरंभ की थी। न्यायालय ने माना कि आबकारी नीति मामले की सुनवाई के संदर्भ में न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया गया था।

न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने अपने विस्तृत आदेश में कहा था कि जब उन्होंने इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करने से इनकार किया, तो उनके विरुद्ध सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और सार्वजनिक बयानों की बाढ़ आ गई — जो न्यायालय के अनुसार निष्पक्ष आलोचना और आपराधिक अवमानना के बीच की सीमा को स्पष्ट रूप से लाँघ गए।

न्यायालय की टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति शर्मा ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि संबंधित पक्षों के पास सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का विकल्प उपलब्ध था। इसके बजाय, उन्होंने सार्वजनिक रूप से पत्र और वीडियो प्रसारित किए जिनमें राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगाए गए और यह संदेश दिया गया कि इस अदालत से न्याय की अपेक्षा नहीं की जा सकती। दिल्ली उच्च न्यायालय के अनुसार, यह आचरण न्यायपालिका के प्रति जनता में अविश्वास उत्पन्न करने का प्रयास था और यदि इसे अनियंत्रित छोड़ा गया तो यह अराजकता का कारण बन सकता है।

न्यायमूर्ति शर्मा का मामले से अलगाव

अवमानना कार्यवाही आरंभ होने के पश्चात न्यायमूर्ति शर्मा ने आबकारी नीति मामले की आगे की सुनवाई से भी स्वयं को अलग कर लिया। यह कदम न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया।

आगे की राह

अब सभी छह नेताओं को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखना होगा। 4 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि क्या अदालत इस मामले को आगे बढ़ाती है या कोई अंतरिम राहत दी जाती है। यह मामला भारतीय न्यायपालिका और राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमाओं के बीच के संतुलन की एक अहम परीक्षा बन गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

किंतु न्यायमूर्ति शर्मा के आदेश में जो विवरण है, वह दर्शाता है कि अदालत ने इसे व्यवस्थित दबाव की रणनीति के रूप में देखा। यह ऐसे समय में आया है जब राजनीतिक दलों और न्यायपालिका के बीच तनाव पूरे देश में एक व्यापक बहस का विषय बना हुआ है। असली सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर राजनीतिक अभिव्यक्ति और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के बीच संतुलन बनाने के लिए भारत की अदालतें स्पष्ट और सुसंगत मानक स्थापित कर पाएंगी।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल और सिसोदिया को अवमानना नोटिस क्यों जारी किया?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका को बदनाम करने के कथित सुनियोजित अभियान के चलते यह नोटिस जारी किया। अदालत के अनुसार, न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा के मामले से अलग होने से इनकार के बाद सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और सार्वजनिक बयानों के ज़रिए राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगाए गए, जो आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आते हैं।
इस अवमानना मामले में किन-किन नेताओं को नोटिस मिला है?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, सांसद संजय सिंह, पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज, विनय मिश्रा और दुर्गेश पाठक — कुल छह AAP नेताओं — को नोटिस जारी किया है। सभी को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करना होगा।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस अवमानना मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित की है। तब तक सभी नेताओं को अपना लिखित जवाब दाखिल करना होगा।
न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने मामले से खुद को अलग क्यों किया?
अवमानना कार्यवाही शुरू होने के बाद न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने आबकारी नीति मामले की आगे की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया। उन्होंने पहले मामले से अलग होने से इनकार किया था, जिसके बाद उनके विरुद्ध सोशल मीडिया पर सामग्री प्रसारित की गई थी।
अदालत ने सोशल मीडिया रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश क्यों दिया?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले से जुड़े सोशल मीडिया के सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं और उन्हें कोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए, ताकि अवमानना के आरोपों की जाँच के लिए साक्ष्य संरक्षित रहें। यह रिकॉर्ड आगे की कार्यवाही में अहम भूमिका निभाएंगे।
राष्ट्र प्रेस
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